mere vichar

Just another weblog

46 Posts

2162 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 2730 postid : 261

ऐसा क्यों होता है?

Posted On: 23 Dec, 2011 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

कुछ समय पहले मेरी अपने एक मित्र से बात हो रही थी और बात ही बात में किसी के बारे में कुछ ऐसी बात पता चली कि मन अशांत हो गया.
 
हुआ ये की एक युवक और युवती में प्रेम हुआ, जो काफी समय समय तक चलता रहा, प्रेम के गीत गए गए, साथ जीवन बिताने के ढेर सारे वादे, भविष्य के सुनहरे ख्वाब………………, समस्या ये थी को दोनों ही अलग अलग धर्म को मानने वाले थे. पर प्रेम में पड़ने के बाद लोग कहा इन  बातों  को सोचते हैं? उनकी तो दुनिया ही अलग होती है. यहाँ ये भी बताता चलूँ की ये बात एक छोटे शहर की है, किसी मेट्रो सिटी की नहीं, जहाँ लोग अपने अपने घर के बाहर कम ही झाकते हैं,
 
कुछ समय के बाद लड़की के घर में इस बात की भनक लग गयी, और उसके घर से बाहर आने जाने पर रोक टोक लगने लगी, और तब इस प्रेमी युगल ने घर से बाहर भागने का प्लान बनाया,  और एक दिन दोनों  भाग भी निकले,  लड़की के घर वालो ने पुलिस में शिकायत  की, और पुलिस ने उन दोनों को पकड भी लिया, लड़की के घर वालो ने क्योंकि लड़के पर लड़की को भगाने का आरोप लगाया था इस लिए उसे पुलिस ने उसे गिरफ्तार का उसपर केस बनाया, इसी बीच एक खास पार्टी के लोग इस मामले में  जुड़ गए, मोर्चे निकलने लगे, जो बात प्रेम कि थी, वो धर्म कि  रक्षा में, धर्म संकट में है में  बदल गयी और लड़के पर सख्त से सख्त कदम उठाने के मांग ……, इधर  लड़की पर तरह तरह से घर वालो के प्रेशर पड़ रहे थे, और अंततः लड़की ने बयान दिया के ये लड़का मुझे ज़बरदस्ती ………………
 
लड़के के पास लड़की के कुछ पत्र थे जो की उसने दिखाए और फिर उसके मोबाइल पर लड़की की मोबाइल से आई हुई काल्स से ये तो साबित हो गया की लड़के और लड़की अजनबी नहीं थे और उनमे प्रेम था और इसलिए केस में थोडा …………
 
इस लेख को लिखने का मेरा  अभिप्राय ये  है की इस तरह के रिश्ते अक्सर ही ऐसे अंजाम को पाते हैं, मै लड़की को  दोष  नहीं दे  रहा, जब माँ बाप अपने खून का /दूध का वास्ता दें, बाकी बहनों के रिश्ते की बात करें, समाज में कटने वाली नाक का हवाला, और ना जाने इस तरह के कितने इमोशनल ……………., तो लड़की का उस समय अपने बात पर खड़ा रहना आसान  नहीं होता है, और ये लड़के के बारे में भी कहा जा सकता है ( ऐसा ही उनके साथ भी होता है) पर इस तरह की घटना से प्रेम जैसी बात से विश्वास उठने लगता है. या तो प्रेम  ही जात, धर्म, सम्प्रदाय देख कर करना चाहिए, पर वो प्रेम कहाँ हुआ, वो तो एक तरह का ……………., 
 
हालांकि आजकल प्रेम, टीवी और फिल्मो में जिस तरह से परोसा जा रहा है वो प्रेम के बजाये कुछ और ही बन गया है, अपरिपक्व नौ जवानो की जिस तरह का वातावरण मिल रहा है वहां प्रेम केवल शारीरिक आकर्षण बन कर रहा गया है, पर फिर भी प्रेम, प्रेम है, वो प्रेम जो हीर रांझा का था, सोहनी महिवाल का, लैला मजनू का, जहाँ दिल को बात होती थी.
 
 ऊपर वर्णित घटना मन में प्रश्न खड़े कर देती है की क्या दो धर्म/ जात को मानने वाले एक दुसरे के साथ प्रेम नहीं कर सकते, क्या वो एक साथ जीवन नहीं बिता सकते, क्या उन्हें इसका हक नहीं है?
 
या  ये, के इस पूरे प्रकरण से क्या निष्कर्ष निकालूँ, क्या उन दोनों का प्यार प्यार ना हो होकर केवल एक बचपना था, या ये कि अगर दोनों एक धर्म के होते तो शायद ऐसा ना होता, या ये कि लड़की अगर हिम्मत दिखाती तो इसका अंत सुखद भी हो सकता था, या ये के प्रेम करने के पहले ही हमें उससे जुड़े हर पक्ष पर गौर भी करना चाहिए ( पर ये प्रेम कहाँ रहा , प्रेम तो एक सव्भाविक प्रतिक्रिया हैं जो सोच विचार करके नहीं किया जाता ), या ये कि ……………., बहुत सारे प्रश्न है जिनका उत्तर मै ढूंढ नहीं पर रहा.
 
क्या आपके पास है इनके उत्तर ?

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (9 votes, average: 4.78 out of 5)
Loading ... Loading ...

76 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

D33P के द्वारा
January 28, 2012

अबोध जी आपने सही कहा समय बदल गया पर लोगो की सोच अभी भी जात पांत की परिधि से बाहर नहीं आ रही है ,अगर प्रेम करने वाले अपने अभिभावकों से रजामंदी की अपेक्षा कर ते है तो उनके प्रेम का तिरस्कार किया जाता है ,अगर बगावत करते है अपने जनम ,पालनहार होने अपने स्नेह का वास्ता दिया जाता है ,आत्महत्या तक करने की धमकी दी जाती है पर उनकी शादी की सहमति नहीं दी जाती लेकिन वही अगर प्रेम करने वाले लड़के और लड़की द्वारा ये समाज कभी उन्हें एक नहीं होने देगा ये सोचकर आत्महत्या कर ली जाती है ,तो माता पिता रोते हुए यही कहते हुए मिलेंगे कि कम से कम एक बार हमसे कहते तो …हम उन्हें ख़ुशी ख़ुशी सहमति देते

    abodhbaalak के द्वारा
    January 29, 2012

    दीप्ति जी आपने इस पूरे लेख के मर्म का बड़ी ही अच्छी तरह से समझा है. समाज बदल कर भी नहीं बदला, हम अभी भी ………. क्या समय के साथ हमारी सोच कभी नहीं बदलेगी? http://abodhbaalak.jagranjunction.com

rahulpriyadarshi के द्वारा
January 20, 2012

अबोध बालक जी,समाज आजकल कलुषित हो गया है,अगर सिर्फ हिन्दू धर्म की भी बात करें तो आठ प्रकार के विवाहों की व्यवस्था की गयी है,किन्तु लोग एक ही विधि को अपनी संस्कृति मानकर बाकी विधियों की उपेक्षा करते हैं,एवं अन्य विधियों को निकृष्ट बताकर एक तरह से हमारी संस्कृति को ही अपमानित करते हैं,आज सोच विकृत हो गयी है,जिसकी वजह से हमारी मानसिकता निम्न स्तर पर पहुच गयी है…प्रेम सीमाओं में नहीं बंधता,आपने बहुत ही उचित मुद्दा लेखन के लिए चुना है,आपका आलेख सोचने पर मजबूर करता है.

    abodhbaalak के द्वारा
    January 25, 2012

    राहुल जी आज कल समाज सच में कौषीत हो के रह गया है, प्रेम, प्रेम न हो कर पता नहीं क्या हो गया है, और सच्चा प्रेम तो अब विरले ही …. काश की हम ……….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Sumit के द्वारा
January 19, 2012

बहुत अच्छा लेख ,,प्रेम का बहुत सुंदर वर्णन ………… http://sumitnaithani23.jagranjunction.com/2012/01/19/नारी-और-बेचारा-पुरुष-पति-द/

    abodhbaalak के द्वारा
    January 25, 2012

    sumit ji aabhari hoon aapka ki aapne sada ki bhanti is baar bhi meri रचनाओ को पढने लायक समजा और प्रोस्ताहन ……….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Roshan Dhar Dubey के द्वारा
January 19, 2012

अबोध जी मैंने आपकि लिखि बातो को कयी बार पढा और फिर सोचा कि प्यार क्या  है……! मै अभी 22 साल का हु और मुझे भी किसि से प्यार  है…और मुझे पता है कि प्यार अक्सर दूरियो से होता है ] आप जिससे प्यार करो तो जरुरि नहि कि जिन्दगी भी आपकि उसी के साथ बिते..और  प्यार का सहि मतलब ये है कि आप किसि कि भावनाओ को बहुत अच्छी तरह से समझते हो और आप उस  सख्स कि हर मजबुरियो का आदर करते हो..! और प्यार का ना तो कोई धर्म देख कर होता है और ना ही जाति…..प्यार तो केवल विचारों से होता है..! मै आपकी कहि एक बात को सहि ठहराउंगा की आजकल के युवा मुवी देख कर विचलित हो रहे है और प्यार का अर्थ वो कामुकता से जोड रहे है..! मगर मै अभी भी उनमे से कुछ लोगो मे प्यार के सार्थक पहलु को समझा पाया हु..और मेरी आप लोगो से यहि विनति है कि आप भी युवावो को प्यार का सही मतलब समझाने कि क्रिपा करे..! मै किसि भी मां बाप को गलत नहि कहुंगा क्युंकि हर लडकी और लडके के मां बाप अपने बच्चों की खुशियां चाहते हैं मगर उनकि अपनी मजबुरियां होती है और वो है समाज..! “”मेरा आप सभी से यही अनुरोध है कि अगर आपको आपका प्यार ना मिले तो कभी भुल कर भी ना सोचना कि उसको आपसे प्यार नहि था”"

    abodhbaalak के द्वारा
    January 29, 2012

    रोशन जी शायद आपने इस लेख में भी पढ़ा हो की मई उसे ब्लेम नहीं कर रहा, पर क्या कहें भाई मेरे, ये दिल है की मानता नहीं …………. खैर, जाने दीजिये, इस बीच में दरिया में बहुत सारा पानी बह गया है, ( बहुत सी नयी नयी बातें) आभार आपके समर्थन, स्नेही और प्रोत्साहन का http://abodhbaalak.jagranjunction.com

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
January 7, 2012

पर ये प्रेम कहाँ रहा , प्रेम तो एक सव्भाविक प्रतिक्रिया हैं जो सोच विचार करके नहीं किया जाता.. जब माँ बाप अपने खून का /दूध का वास्ता दें, बाकी बहनों के रिश्ते की बात करें, समाज में कटने वाली नाक का हवाला, और ना जाने इस तरह के कितने इमोशनल ……………., तो लड़की का उस समय अपने बात पर खड़ा रहना आसान नहीं होता .. प्रिय अबोध जी प्रश्न के साथ साथ सारे असमंजस ..हालात का भी आप ने झरोखा दिखा दिया है तो ..भ्रमर का झरोखा अब क्या करे ?,,,, ऐसा ही होता है लेकिन चूंकि हमारा समाज अभी पूरी तरह पाश्चात्य सभ्यता को नहीं पचा सकता है इसलिए लड़के लड़किओं को आगे बढ़ने से पहले अपने मन को समझा ले रास्ता चुन लेना चाहिए या तो पर्वत से अडिग रहने का प्रेम पर फ़िदा होने का या माँ बाप समाज घर की इज्जत का …दो नावों पर पैर रखना इतना सहज नहीं ..हाँ पैर बहुत मजबूत हों उतने आधुनिक हों तो बात जुदा है ..कुत्ते भौंके हाथी चलता रहे मस्त .. आनर किल्लिंग से कोर्ट भी त्रस्त है आज ..आप ने देखा होगा जिस बच्चे को इतने प्यार से त्याग से लोग पालते हैं पढ़ते हैं वो सम्मान आन बान में दाग लगा दे तो ?? इस लिए प्रेम प्रेम रत्ना आसान है निभाना बहुत मुश्किल …जय श्री राधे भ्रमर ५

    abodhbaalak के द्वारा
    January 8, 2012

    भ्रमर जी सच पूछें तो बड़ी देर से आपका इंतज़ार हो रहा था की आप इस बार ………….. और ये भी सच है की जो आपने कहा है की प्रेम का मार्ग आसान नहीं है, बड़े मज़बूत इरादे वाले हो तो प्रेम करें वरना ………… आभार आपके इस प्रेम का …. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Rajkamal Sharma के द्वारा
January 5, 2012

आदरणीय abodh बालक जी आपकी इस कहानी से मुझे यह शिक्षा मिली है की आपकी होने वाली भाभी के सभी सबूत मुझे अच्छी तरह से संभाल कर रख लेने चाहिए हा हा हा हा हा नया (पांच दिन पुराना ) साल मुबारक

    abodhbaalak के द्वारा
    January 7, 2012

    प्यारे गुरु जी तो क्या आप एक बार फिर से ठान चुके हैं की …………….? क्यों बार बार आग में कूद रहे हो भय्या, और ऐसा रिस्क ही क्यों लो की …………….? वैसे मज़ा नहीं आया, आपके कमेन्ट के स्टाइल ऐसा तो नहीं था! खैर लगता है की बिजी है, जाने दें. आपको भी नया साल मुबारक हो, वैसे आपको sms और मेल के द्वारा को विश कर ही चूका हूँ. :) http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Tufail A. Siddequi के द्वारा
January 5, 2012

भाई साहब अभिवादन, आपके लेख यूं ही हिट सुपरहिट होते रहे. सुन्दर लेख पर बधाई. http://siddequi.jagranjunction.com

    abodhbaalak के द्वारा
    January 7, 2012

    तुफैल भाई, आपके मुंह में घी शक्कर, :) बस आप सब की मोहब्बत है, जो लोग पढ़ लेते हैं, वरना लेख के स्तर कैसे होते हैं ये आप भी वाकिफ हैं, और शायद यही कारण है की कभी आज तक ब्लोगर ऑफ़ दी वीक बनना नसीब नहीं हुआ, (रीज़न शायद लेख के स्तर ही हों) शुक्रगुज़ार हूँ आपका, अपने करम को, मोहब्बत को बनाए रखे http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Tufail A. Siddequi के द्वारा
    January 7, 2012

    कर्मण्ये वाधिकारस्ते म फलेषु कदाचना You have a right to perform your prescribed duty, but you are not entitled to the fruits of action। आपको याद तो होगा ही. http://siddequi.jagranjunction.com

    abodhbaalak के द्वारा
    January 7, 2012

    तुफैल भाई मेरी हिंदी ही अच्छी नहीं है तो फिर संस्कृत…………. वैसे आपने ट्रांसलेशन करके मेरी मुश्किल आसान कर दी, शुक्रिया, आपकी बात का मतलब समझ में इसी वजह से आ गया :)

niyazahamadansari के द्वारा
January 5, 2012

अबोध जी , नव वर्ष की शुभ कामनाएं , आप का लेख बहुत बढ़िया लगा , आप के स्वतंत्र विचारो से समाज और देश का काफी भला होगा ऐसे ही लिखते रहे .

    abodhbaalak के द्वारा
    January 7, 2012

    नियाज़ जी खुश आमदीद! ,मेरी पोस्ट पर आपका पहले कम्नेट पर. बड़ी बात कही है अपने, मेरे जैसे लोग देश का क्या भला करेंगे, हम सब ही खुद का भला कर लें ये ही बड़ी बात है . वैसे आपके हौसला अफजाई के लिए शुक्रगुज़ार हूँ और उम्मीद करता हूँ की आगे भी आपसे ऐसे ही ……. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Abdul Rashid के द्वारा
January 4, 2012

प्रिय अबोध प्रेम है तो धर्म है धर्म है तो प्रेम है धर्म से प्रेम प्रेम से धर्म, धर्म का पुजारी प्रेम का भी पुजारी कौन कहता है दोनों एक नहीं है ………….. मुर्ख कहता है मानवता कहता प्रेम करो मानवता कहता है धर्म करो बाकि उलझन पैदा कौन करता है …………………. भगवान से प्रेम करो और भगवान की पूजा करना ही धर्म है तो धर्म और प्रेम का दुश्मन कौन …………………………… सप्रेम अब्दुल रशीद

    abodhbaalak के द्वारा
    January 7, 2012

    रशीद भाई, बड़ी ही गूढ़ प्रतिक्रिया ………. चक्कर खा कर रह जा रहा हूँ, :) :) :) वैसे दीप में देखे तो सही है की प्रेम इश्वर ही है, पर धर्म ………….. इश्वर से प्रेम तो धर्म है पर क्या करे अगर यही प्रेम अलग अलग धर्म के मानने वालो के बीच में हो जाये तो वो ………….. आभारी हूँ आपके इस प्रेम का, की आपने सदा की तरह इस बार भी …… :) http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Charchit Chittransh के द्वारा
January 4, 2012

अवोध जी ; सार्थक लेखन पर वधाई ! विगत वर्ष एक लेख “दब्बू दबंग और दौलतमंद दिलवाले ” के शुरुआती दो पेराग्राफ में उदाहरण ‘ खान ‘ साहब के संभ्रांत परिवार का देने की भूल के कारण लेख पूरे वर्ष प्रतिक्रिया विहीन रहा, इस वर्ष संपादित कर ‘खान’ साहब को ‘सिंह’ साहब बनाने पर वही लेख अन्य मंचों पर भी चर्चा में ….. एक अन्य अति महत्वपूर्ण विषय ईश्वर पर लिखे लेख “वो वेनाम सर्व शक्तिमान ” को पांच-पाँच बार पुनर्प्रस्तुत करने पर भी हमारे मंच पर ‘फीचर ‘ होना नसीब नहीं हुआ !!! कारण शुरूआती पेराग्राफ में ईसाई धर्म के अधिक प्रचलन का तार्किक कारण देने की भूल…..हालाकि अन्य मंचों पर अच्छा प्रतिसाद भी …,, इसमें स्वयं मैं भी सम्मिलित हूँ ! आखिर “सम्मान हत्या ” में सन्दर्भ नामों में परिवर्तन कर मैंने भी नापुन्शाकता का प्रदर्शन किया ही,,,,, यदि इस या इस जैसे मंच के बुद्धिवादी ब्लोगर ही इतने एकपक्षीय हैं तो आम आदमी को क्या दोष दें ,,,,, इसीलिये जिस तरह १९८८ में मुद्रण माध्यम से दूर हुआ उसी तरह चुपचाप समूह लेखन से भी ,,,, जय हिंद !!!

    abodhbaalak के द्वारा
    January 4, 2012

    ह्म्म्मम्म चित्रांश जी क्या कहूँ आपके इस प्रितिक्रिया पर, पर ऐसा हो रहा है और होता आ रहा है. इसे बदलने की आवश्यकता है, आशा है की samay के साथ बदलाव अवश्य होगा. आभार आपका, की आपने अपने अमूल्य विचार से अवगत कराया, और आगे भी आपसे ……. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Jagdeesh के द्वारा
January 1, 2012

ऐसा क्यूँ होता है?,क्योंकि हम सभी सामान्य रूप से बेईमान है और बनावटी जिन्दगी जीते हैं । हम सभी जानते हैं कि जिस धर्म की बात हम सभी करते हैं वह मानव-निर्मित धर्म है अर्थात् प्राकृतिक धर्म नहीं है ।मानव -निर्मित धर्म होने के कारण और इस दिखावटी धर्म को वास्तविकता से अधिक मूल्य देने के कारण ऐसी असमन्जसपूर्ण स्थिति उत्पन्न होती है । समाज में ऐसी जो घटनाएँ कभी कभी घटती है,पूर्व में भी एसा होता रहा है और आगे भी एेसा होता रहेगा,आपत्तियाँ तब भी होती थी और कदाचितत आगे भी होती रहें, शायद न भी हों ।मेरे विचार से आने वाले दिनों में ऐसी घटनाओं पर विरोध स्वतः समाप्त हो जाएगा ।जैसे-जैसे पढ़ाई का स्तर बढ़ता जाएगा, ऐसी समस्याएं समाप्त हो जाएगी ,तब तक के लिए, विशेषकर माँ-बाप एवं अभिभावकों को थोड़ा सचेत,जागरूक और खुले दिमाग का होने की आवश्यकता है ।ऐसा होने पर बच्चों को उचित-अनुचित,सही-ग़लत की जानकारी उम्र के साथ-साथ अपने आप मिलती रहेगी ।आशापूर्वक प्रयास ही हम सभी के हाथ में है और इसे ही करने की सोचनी चााहिए । सही दिशा में सोचने और करने वाले की सहायता ईश्वर भी करते हैं ।

    abodhbaalak के द्वारा
    January 2, 2012

    जगदीश जी पहली बार आपका मेरे ब्लॉग पर कदम पड़ा है, उसके लिए आपका आभार आपने जो कहा है काफी हद तक सही भी है, देखते हैं की भविष्य में आगे चल कर कुछ बदलाव आता है या ऐसे ही ………… आगे भी आपसे मार्गदर्शन का अनुरोध है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

manoj के द्वारा
December 28, 2011

अबोध जी आज भी हम जितना भी अपने आपको विकसित कह लें पर धर्म को लेकर आज भी समाज अपनी पुराणी स्तिथि में है, आज भी हम उस रेखा को पार करने के पहले बहुत बार सोचते हैं. समय के साथ इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है. सुन्दर रचना के लिए बंधाई

    abodhbaalak के द्वारा
    December 30, 2011

    मनोज जी संभवतः आप सही कह रहे हैं की हम आज भी ………….. आपके विचार और प्रोत्साहन के लिए आपका आभारी हूँ, आगे भी मार्गदर्शन करते…….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

tejwani girdhar के द्वारा
December 28, 2011

एक अनछुए पहलु पर बहुत अच्छा लिखा है आपने, साधुवाद

    abodhbaalak के द्वारा
    December 28, 2011

    गिरधर जी प्रश्न फिर भी अनुत्तरित रह गए हैं जिन्हें मैंने उठाये हैं . आभार आपका की आपने इस रचना को पढ़ा और सराहा, आगे भी आपसे मार्गदशन का अनुरोध अहि http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Syeds के द्वारा
December 27, 2011

अबोध जी, बहुत ही गंभीर विषय उठाया है आपने…क्या वास्तव में वोह प्यार था… या कुछ और… यह बात भी आपने सही कही की टी वी सिनेमा ने भी समाज को दूषित किया है और प्रेम की परिभाषा ही बदल दी है…..अच्छा लेख… http://syeds.jagranjunction.com

    abodhbaalak के द्वारा
    December 28, 2011

    सय्यद जी आपका आभारी हूँ, की आपने इस रचना ko समय दिया और अपने विचार से अवगत कराया, पता नहीं ये सच में प्रेम था भी या नहीं, क्योंकि अगर प्रेम होता तो कम से कम प्रेमी पर आरोप तो न लगते. आगे भी अपने प्रितिक्रिया से अवगत कराते रहने का अनुरोध है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

gopesh के द्वारा
December 26, 2011

आपने बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है , अबोध बालक जी! ऐसे मामले बहुत ही जटिल होते हैं क्यूंकि कभी कभी लड़के लड़कियों को सच्चे प्यार के नाम पर बस अपने निजी स्वार्थों को साधते हैं ! एक सुंदर आलेख के लिए आपका आभार! अतः बुध्हिमान वही है जो विवाह पूर्व ऐसी बातों में न पड़े! संस्कारों पर ही आधारित हमर नवीन लेख पढ़ें http://gopesh.jagranjunction.com/2011/12/26/जिम्मेदारी-किसकी/

    abodhbaalak के द्वारा
    December 27, 2011

    धन्यवाद जोसेफ जी, समाज में हो रहे उथल पुथल पर जो समझ में आता है वही लिखने का प्रयास करता रहता हूँ, जहाँ इश्क की, प्रेम की बात आती है श्रीमान तो अच्छे अच्छे विद्वान् भी ………… :) आभार आपके विचार के लिए http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
December 26, 2011

बहुत सही लिखा है आपने,अधिकांश मामलों में लड़के को ही दोषी ठहराकर जेल में डाल दिया जाता है.इस तरह के मामलों में विवेकपूर्ण निर्णय लेने की आवश्यकता है.

    abodhbaalak के द्वारा
    December 27, 2011

    धन्यवाद आपका राजीव जी, सही कहा है आपने, ये हमारी मानसिकता है की बदलते समय के बावजूद भी, अभी तक अधिकतर दोषी लड़की को ही माना जात है, समय बदल गया है और अब लड़कियां हर वो काम करने में ……….. विवेक और प्रेम में दोस्ती नहीं होती है भाई मेरे, विवेक मस्तिष्क से और प्रेम दिल से होता है . http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

dineshaastik के द्वारा
December 26, 2011

प्रेम, साहित्य में, कल्पनाओं में बहुत ही सुन्दर एवं भव्य दिखता है। किन्तु सत्य के धरातल पर इसका कोई उच्च स्थान नहीं है। मनुष्य स्वभाव से मतलब परस्त है। निःसंदेह यह गुण प्रकृतिजन्य है। हमारा सामाजिक ढाँचा इस तरह का बना कि हम जाति एवं धर्म के संकीर्ण दायरे से नहीं निकल सकते। हमारे राजनैतिक शोषण का यह एक प्रमुख कारण है। प्रेम का पाठ पढ़ाने वाला धर्म कैसे प्रेम का हत्यारा बन जाता, यह समय समय पर देखने को मिलता रहता है। http://dineshaastik.jagranjunction.com/

    abodhbaalak के द्वारा
    December 26, 2011

    दिनेश जी बहुत ही विवेक्पूड प्रतिक्रिया, सच में प्रेम का पाठ पढ़ाने वाला धर्म ही ……………. आभारी हूँ आपके इस प्रतिक्रिया के लिए और आगे भी आपसे सदा मार्गदर्शन का अनुरोध है. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

vinitashukla के द्वारा
December 26, 2011

सोचने पर मजबूर करने वाली रचना. सार्थक पोस्ट के लिए बधाई अबोध जी.

    abodhbaalak के द्वारा
    December 26, 2011

    प्रोत्साहन और विचार के लिए आपका आभारी हूँ विनीता जी, आगे भी आपसे मार्गदर्शन का अनुरोध है. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

bharodiya के द्वारा
December 26, 2011

प्रेम तो कुदरत की देन है, भाई । लेकिन कुदरत की ऐसी बहुत सी देन है, सबको फोलो नही कर सकते । अगर माना जाए की लोक शाही है तो आदमी अगर चाहता है की वो कुदरत की दी हुई हर व्रुत्ति को जीना चाहता है तो फीर से पाषाण्युग में जाना पड जाता है । वासना, आकर्षण या प्रेम सब एक ही है । क्षणिक या लंबा हो सकता है । ये तो हर सामान्य आदमी को हो जाता है । लेकिन वो बोलता या कोइ हरकत नही करता , वो जानता है ईस का कोइ मतलब नही । वो जानता है उसे समाज के बने टेंप्लेट में ही रहना है, बाहर गया तो फाईल करप्ट हो जाती है । मैने बात कही वो आम लोगों की कही आप सब बात कह रहे हो वो अपवाद की बातें है । नासमजी में, अनजाने में या विद्रोह की वजह से ऐसी घटनाये हो जाती है लेकिन पूरे समाज की तुलना मे बहुत ही कम संख्या मे होता है । आज आम समाज के लडके लडकियां समजदार हो गए हैं । अगर पेम करना हो तो भी केल्क्युलेटर ले के बैठ जाते हैं । सब गीना जाता है । अगर टोटल बराबर बैठता है तब ही आगे की बात होती है ।

    abodhbaalak के द्वारा
    December 26, 2011

    “आज आम समाज के लडके लडकियां समजदार हो गए हैं । अगर पेम करना हो तो भी केल्क्युलेटर ले के बैठ जाते हैं । सब गीना जाता है । अगर टोटल बराबर बैठता है तब ही आगे की बात होती है” भरोडिया जी, आपने प्रेम की नहीं, बिजनेस के बात की है जहाँ पर हानि लाभ को कल्कुलैत करने के बाद …………………., प्रेम की स्वाभिकता ही ख़त्म जो जाती है इससे, और इस तरह के कदम ( प्रेम में पड़ना या शादी करना) केवल ना समझ ही नहीं करते बल्कि व्यक्स्त, समझदार और समाज में अपना नाम रखने वाले भी करते हैं, अंतर ये है की अगर वो शक्ति शाली है तो वही समाज अपनी पूछ दबा कर बैठ जाता है और अगर निर्दन हो तो ………….. आभारी हूँ आपकी प्रतिक्रिया के लिए और आगे भी आपसे सदा अपने विचारो से अवगत कराते रहेने का अनुरोध है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Rajesh Dubey के द्वारा
December 25, 2011

प्रेम में व्यक्ति हृदय से जुड़ता है,पर कई बार वासना ही प्रेम के रूप में दीखता है. वासना वाली प्रेम टीकाउ नहीं होती. लड़का-लड़की यथार्थ के धरातल पर खड़े हो कर जब निर्णय लेते है, तब संबंध टिकाऊ होता है,वर्ना हवा का स्वप्न महल धरासाई होते देर नहीं लगाती.

    abodhbaalak के द्वारा
    December 26, 2011

    राजेश जी वासना और प्रेम में अंतर है, और आप्नसे सही कहा है की कई बार वासना ही प्रेम के रूप में दीखता है, पर फिर भी प्रेम अगर सच्चा हो तो उसमे सब बाधाओं को पार करने की शक्ति है, वैसे भी इश्क आसान नहीं है, शायद ग़ालिब ने कहा है की ये इश्क नहीं आसां इतना तो समझ लीजे, एक आग का दरिया है और डूब के जाना है, बिना आगे के दरिया के पार किये …….. आभार आपके विचार के लिए, और अनुरोध आगे के लिए भी http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Santosh Kumar के द्वारा
December 25, 2011

आदरणीय गुरुभाई ,.नमस्कार प्रश्न कठिन है ,..बहुत सारे लेकिन हो सकते हैं ,..सबसे बड़ा लेकिन है क्या यह हमारी जरूरत है ,…मुझे लगता है आज की पीढ़ी जरूरत के हिसाब से प्रेम कर रही है ,…अपवाद स्वरुप कहीं कहीं हीर रांझे भी मिल जाते हैं ,..उनका विरोध होता है …मैं तो कहता हूँ प्रेम करने वालों पर एक मीटर लगाया जाय जिससे पता चले की सच्चा है या नहीं ,…हा हा ..हा ..जाती धर्म की दीवार तो है ही ,..हमेशा रहेगी ,..लोग दीवार पार भी करेंगे,..करते रहेंगे ,..गिरते रहेंगे …

    abodhbaalak के द्वारा
    December 26, 2011

    गुरु भाई क्या आईडिया है, “प्रेम करने वालो पर एक मीटर लगाया जाए जिस से की पता चले की प्यार सच्चा है नहीं “, यहाँ प्रॉब्लम ये है की अगर ऐसा किया जायेगा तो बहुत सारी शादी शुदा जोड़े ………………., क्योंकि उनमे से अक्सर में ………… अंतिम पंक्ति में एक आशा है और निराशा भी छिपी है, देखते हैं, आगे चल कर हमारे इस “सभी” समाज में इस तरह के …………… आभार सदा की तरह, वैसे हमारे गुरूजी नज़र नहीं आ रहे हैं अभी तक, कहीं नए वर्ष के लिए तय्यारी तो नहीं कर रहे हैं? http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

pradeep kumar singh kushwaha के द्वारा
December 24, 2011

प्रणाम, ये तो यक्ष प्रश्न है. मैं तो अबोध से भी अबोध हूँ. आप का स्नेह मिलेगा .

    abodhbaalak के द्वारा
    December 25, 2011

    हम्म्म्मम्म्म्म, अबोध से भी अबोध :) चलें कोई तो है जो ………. प्रयास रहेगा की आपका …………… http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

December 24, 2011

अबोध भाई नमस्कार ! ज़ख़्मों को हरा क्यूँ कर हो भाई !ये प्यार मोहब्बत बड़ी अजीब चीज़ है …किसी शायर ने कहा है: अगर दर्दे-मुहब्बत से न इन्साँ आशना होता, न मरने का अलम होता, न जीने का मजा होता। प्यार मे मिलन हो तो अच्छा है और न हो तो भी अच्छा …पार मिलन और विछोह से परे है ! अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्बत की है, कौन कहता है कि सादिक न थे जज्बे उनके, लेकिन उनके लिए तश्हीर का सामान नहीं, क्योंकि ये लोग भी अपनी तरह मुफलिस थे। -साहिर लुधियानवी आपको बहुत बहुत मुबारकबाद !!

    abodhbaalak के द्वारा
    December 24, 2011

    मुबारकबाद…………..? किस चीज़ की लिए भाई मेरे? वैसे मेरा इरादा आपके जख्मो को छेड़ने का कतई नहीं tha, ऐसी गुस्ताखी मई कैसे कर सकता हूँ? :) असल में इस पूरे प्रकरण से दिल में प्यार को लेकर, या ये कहें की धर्म को लेकर प्यार के ……. आभारी हूँ आपका, और आपके शेरो का, बस ऐसे ही अपने विचार ….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

div81 के द्वारा
December 24, 2011

प्यार में मिलन ही हो ये जरुरी तो नहीं | प्यार पा लेने का नाम नहीं होता | त्याग समर्पण और विश्वास मिल कर ही प्यार बनता है | अपने माँ बाप परिवार कि इज्जत ताक में रख कर प्यार को पाने का जो ये कदम है जिसे भाग जाना बोलते है मेरे हिसाब से तो सबसे गलत कदम है और फिर ये कैसा प्यार जिसमे अपनी, अपने परिवार कि इज्जत कि धज्जियाँ उड़ा दी फिर लड़के के ऊपर इल्जाम भी लगा दिया जाये ये कोरी भावनाये है जो लड़के के साथ है तो उसके लिए परिवार के साथ है तो उसके लिए अगर उस लड़की को सच में प्यार होता तो न तो वो अपने परिवार कि रुसवाई ही करती न अपने प्यार कि | प्यार सोच के नहीं किया जाता मगर प्यार हो जाने के बाद भी सोचा न जाये कि अपने प्यार कि रुसवाई किजाए है या समझ से प्यार को जीता जाये ये तो प्यार करने वालो के ऊपर है | मेरे साथ कॉलेज में एक लड़की थी जो किसी विजातीय लड़के से प्यार करती थी वो दोनों जानते थे कि घर वाले उनके प्यार को स्वीकार नहीं करेंगे मगर प्यार सोची समझी नीति तो है नहीं | मगर प्यार हो जाने के बाद दोनों ने ऐसा कुछ कदम नहीं उठाया बल्कि समझ से काम लिया लड़की आज नेशनल बैंक में पी ओ है और आज भी वो इस इंतजार में है कि घर वाले इस रिश्ते को काबुल करे कोई जल्दी नहीं प्यार है तो है बस उसी प्यार में एक ताकत के साथ खुशी के साथ जी रहे है |

    abodhbaalak के द्वारा
    December 24, 2011

    धन्यवाद आपकी प्रतिक्रिया के लिए दिवा जी. परिपक्व सोच है आपकी, और निसंदेह आपने जो कहा है वो काफी हद तक ठीक भी है, प्यार सोच के नहीं होता ये आपने भी माना है, और अगर मान ले की आपके घर वाले आपकी शादी करने के लिए तुल जाएँ की तुम्हे उसके साथ शादी करनी ही है और आप नहीं चाहते तो आपके पास दूसरा क्या रास्ता है? या ये के आप उनकी बात मान ले और उससे शादी कर लें, या अड़ जाएँ के नहीं करना, या ये के अपनी जान दे दें और या ये के भाग जाएँ, अब ये निर्भर करता है की प्यार का स्तर, प्यार करने वाली की सोच, उसकी इच्छा शक्ति और …………………. बहुत सरे लोगो ने कहा है की प्यार पाना ही नहीं है, और अगर विरह भी मिले तो ……….., पता नहीं अब क्या कहें, और क्या समझे,

shashibhushan1959 के द्वारा
December 24, 2011

आदरणीय अबोध जी, सादर ! मानव मन की आकांक्षाएं असीमित हैं, पर हम सभी को पूरा नहीं कर सकते. मनुष्य को अपनी शक्ति – सामर्थ्य और सीमा कभी नहीं भूलनी चाहिए. इनके अनुरूप ही अपने जीवन में कोई कदम उठाने चाहिए, वरना चाहत तो बहुत सी चीजों की होती है. अगर हम इनका ध्यान रखेंगे तो ऐसी परिस्थियां हमे कष्ट नहीं देंगी. और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा !!! धन्यवाद !

    abodhbaalak के द्वारा
    December 24, 2011

    :) बड़ी सुन्दर सीख दी हैं शशि जी आपने, इच्छाएं कभी समाप्त नहीं होती ये सत्य है पर क्या ….. प्रेम इश्वर का रूप कहा गया है और इसमें जाती धर्म का भेदभाव नहीं है पर हमारा समाज, क्या अभी भी इस तरह के रिश्ते को मान्यता देने के लिए राज़ी है? और यहाँ पर एक दोगलापन और भी है, अगर व्यक्ति धनि या शक्तिशाली या सामर्थवान है तो समाज चुप चाप …………. खैर आपकी बात भी सही है की और भी ……….. आभारी हूँ आपका http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

allrounder के द्वारा
December 24, 2011

अबोध भाई, कठिन सवाल है और इनमे से अधिकतर अभी भी अनुत्तरित हैं और शायद आगे भी रहेंगे ! बल्कि कुछ के जवाव तो ढूंढते रह जाओगे !

    abodhbaalak के द्वारा
    December 24, 2011

    हम्म्म्म शायद आप ठीक कह रहते हैं सचिन भाई, पर इनमे से कुछ के प्रश्न के उत्तर तो मिलने ही चाहिए. क्या सच में हम अभी भी वही हैं जो आजसे १०० साल पहले थे या हम में कुछ बदलाव आया है? ड्रेस में , रहन सहन में, और न जाने क्या क्या बदलाव तो जगजाहिर हैं पर ……….. आभार आपकी प्रतिक्रिया के लिए http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Amita Srivastava के द्वारा
December 24, 2011

अबोध जी आपने सही लिखा कि प्रेम एक स्वाभाविक प्रक्रिया है , जो सोच -विचार करके नही किया जाता . लेकिन हमारे बड़े लोगों की प्रतिक्रिया भी एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है क्योकि वो भी अपने दिल के टुकड़े को बरबाद होते नही देख सकते .मेरे विचार से तो अगर सब कुछ ठीक है तो धर्म आड़े नही आना चाहिए . क्योंकि सच्चा प्रेम तो ईश्वर स्वरुप है .

    abodhbaalak के द्वारा
    December 24, 2011

    अमिता जी, क्या ये ज़रूरी है की प्रेम विवाह करने वाले बर्बाद ही हो? ऐसा तो अरेंज विवाह के साथ भी हो सकता है. आज वातावरण ऐसा हो गया है की हर धर्म के लोग नहीं चाहते के उनके बेटे बेटी दुसरे धर्म में ….. आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका आभारी हूँ http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

minujha के द्वारा
December 24, 2011

अबोध जी नमस्कार आपके प्रश्न का सटीक उत्तर दे पाना बहुत कठिन है,पर मैं आदरणीय रक्ताले जी की बात से पुर्णतया सहमत हुं कहा भी गया है-विरह जीवन है मधुर प्रेम का मिलन अंत है आलेख अच्छा लगा

    abodhbaalak के द्वारा
    December 24, 2011

    मीनू जी आभारी हूँ आपका, आपक प्रोत्साहन का, विरह बड़ा ही दुखदायी है, समय के साथ शायद ही इस जख्म को भरा जा सकता है ( अगर प्रेम सच्चा हो तो ). वैसे देखा गया है की अगर इस तरह के प्रेमी मिल भी जाएँ तो बाद में भी उनकी समय्साय्ने कम नहीं होती है, पर कम से कम वो साथ थो होते हैं. सदा अआप से मर्दर्शन की आशा और अनुरोध है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

akraktale के द्वारा
December 24, 2011

अबोध जी नमस्कार, प्रेम कहीं भी किसी से भी होता है. हम बातें तो बड़ी बड़ी कर सकते हैं मगर हकीकत के सामने सब नतमस्तक नजर आते हैं. प्रेम जीवन का सुखद अनुभव है.इसकी परिणिति विवाह ही हो आवश्यक नहीं. समाज का अपना दायरा है. उसके बाहर जाने की अनुमति समाज देता नहीं है. जब तक हम में उस दायरे को तोड़ने का साहस और सामर्थ्य ना हो, प्रेम को वहीँ दफ़न कर दो जहां से ये शुरू हो. क्योंकि इसकी परिणिति कई बार बहुत घातक भी होती देखि है हमने.दो प्रेमियों के बिछड़ने का गम तो होता ही है.साधुवाद.

    abodhbaalak के द्वारा
    December 24, 2011

    समाज का अपना दायरा है. उसके बाहर जाने की अनुमति समाज देता नहीं है. जब तक हम में उस दायरे को तोड़ने का साहस और सामर्थ्य ना हो, प्रेम को वहीँ दफ़न कर दो जहां से ये शुरू हो. अशोक भाई, सही कहा है अपने, अक्सर देखा गया है की मैच्योर लोग भी जब दबाव पड़ता है तो अपने कदम पीछे हटा लेते हैं, और इस उदाहरण में भी ऐसा ही हुआ, पर ऐसा बड़ा दुखदायी है, प्रेम में कदम उठाने वाले को इतना हिम्मत तो राखी ही होगी वरना ………. आभारी हूँ आपके विचार के लिए, अपनी कृपादृष्टि बनाये रखें. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

jlsingh के द्वारा
December 23, 2011

अबोध जी, नमस्कार! आपने प्रेम और प्यार को परिभाषित करने की कोशिश की है, पर यह तो…… प्रेमचंद के प्रेम में शायद ही मिलन दिखाया गया है. प्रेम की पराकाष्ठा वियोग में ही है. आपने सही कहा है– प्रेम तो एक सव्भाविक प्रतिक्रिया हैं जो सोच विचार करके नहीं किया जाता यह होता आया है और होता रहेगा. बहुत परिवारों और समाज में धीरे धीरे सोच बदल रही है… पर परिवर्तन तो धीरे धीरे ही होता है. सामयिक और ज्वलंत मुद्दा उठाने के लिए आभार!

    abodhbaalak के द्वारा
    December 24, 2011

    जवाहर भाई, मैंने कोशिश तो की है पर कहाँ तक अपनी बात को रख पाया, पता नहीं. मैंने भी यही कहा है की प्रेम हीर राँझा. सोहनी महिवाल ……………….., जहाँ बिछड़ना ही ….. पर क्या प्रेम तभी सच्चा है जब उसमे विरह हो, त्याग हो, मिलना न हो? समाज की सोच बदल तो रही है पर अभी भी …………. आपकी पोस्ट पर भी इस विस्य्हय में आपके विचार पढ़े , आभार इसे महत्व देने और सराहने के लिए http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

naturecure के द्वारा
December 23, 2011

आदरणीय भाई साहब सादर प्रणाम ! आपने बहुत ही ज्वलंत मुद्दे पर प्रश्न किया है | समाज का बहुत बड़ा वर्ग अभी अंतर्जातीय विवाह को ही नहीं स्वीकार कर पाया है फिर यहाँ तो अलग-अलग धर्म की बात है | क्या संकीर्णताओं / रुढियों से निकलना इतना आसन या उचित है ???????????????????

    abodhbaalak के द्वारा
    December 24, 2011

    डाक्टर साहेब, हम आज अपने आपको विकसित और पढ़ा लिखा, और न जाने क्या क्या उपाधियाँ देते हैं पर हमारी मान्क्सिता अभी भी ……. सही कहा है आपने की हम अंतरजाती विवाह को ही नहीं स्वीकार ………. बहुत आभारी हूँ आपके विचार के लिए, आगे भी आपनी प्रेम दृष्टि बनाये रखियेगा … http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

sadhanathakur के द्वारा
December 23, 2011

अबोध भाई ,हालत के आगे भी कभी -लोग मजबूर हो जाते है ,दूसरी ओर हमारी मानसिकता बदलने में अभी और वक़्त लगेगा …………अच्छालेख …….

    abodhbaalak के द्वारा
    December 24, 2011

    कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता” कुछ ऐसा ही हाल होता है ऐसे प्रेम करने वालो का भी, हमारी मानसिकता इतनी जल्दी नहीं बदलने वाली, यहाँ पर एक बात और है, ऊँचे वर्ग में अब लोग इस तरह के कदम उठा रहे हैं और उनपर उतनी उँगलियाँ नहीं उठी पर अगर माध्यम वर्ग या गरीब ……………….. आभार आपका, सदा मार्गदर्शन का अनुरोध है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

mparveen के द्वारा
December 23, 2011

अबोध जी नमस्कार, प्यार कब कहाँ और किस्से हो जाये नहीं पता चलता वो तो बस हो जाता है , न वो धरम देखता है न जात न बिरादरी , न अच्छा न बुरा … और जो ये सब देख के किया जाये वो प्यार नहीं …. आपकी कहानी में भी वाही बात अटक जाती है लड़की को दबाव डाल कर बयां बाजी करवा देते हैं पर वो लोग ये क्यूँ नहीं समझते की sirf धरम के नाम पर इस तरह उनको अलग करना ठीक नहीं .. कब तक इस तरह की घटनाये होती रहेंगी किसके पास इनके जवाब हैं समाज के ठेकेदारों के पास ?? बहुत ही अछि रचना है जो इस बात को एक पल में चूर कर देती है की ” हम सब एक हैं ” यदि एक हैं तो फिर ये भेदभाव क्यूँ ?? ये धरम का ढोंग क्यूँ ??

    abodhbaalak के द्वारा
    December 24, 2011

    परवीन जी हम शायद कभी नहीं समझेंगे, आज समाज में अंतरजाती विवाह ही एक बड़ा अपराध है तो फिर अलग धर्म के मानने वाले के साथ …………….., प्रेम एक ऐसी शक्ति है जो अपने आपमें बहुत से अलगाव के तत्व को हटा देती है, पर यही बात आगे चल कर प्रेम करने वालो को बहुत समस्याएँ भी देती है. आप बहुत बहुत आभार की आपने इस रचना को पढ़ा और प्रोत्साहन …….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

roshni के द्वारा
December 23, 2011

अबोध जी नमस्कार ये कहानी आजकल हर किसी की प्रेम कहानी हो गयी है .. जाट पट की समस्या भी न हो तो भी जब दो प्यार करने वाले या यु खाइए की एक दुसरे के आकर्षण में पड़कर जब दो जन भाग जाते है तो अंत यही होता है … इन कहनियों में अक्सर ये भी देखने को मिलता है की इस तरह के केस में दोनों ज्यदा समझदार नहीं होते अभी पढ़ रहे होते है .. यु कहिये की जवानी का नया जोश फिल्मो का असर और वास्तविकता से बहुत दूर के सपने … काश के लोग समझे की प्यार क्या है ? सिर्फ पाना ही सब कुछ नहीं होता … घर से भाग कर प्यार को पाना और जो घर में सब बचपन से प्यार करते है उस प्यार का क्या … अंतहीन बाते है ये इनका कोई हल नहीं .. जानते हुए की भी कुछ गलत हो रहा है हम दिल के हाथों मजबूर होकर गलत कर देते है और बाद मे बदनामी , मौत या फिर सिर्फ पछतावा रह जाता है …खैर इस बारे मे जितना लिखा जाये कम है .. और यु भी प्रतिक्रिया लेख न बन जाये इसलिए यही अंत करती हूँ बहुत खूब लिखा अपने आभार

    abodhbaalak के द्वारा
    December 24, 2011

    रौशनी जी बड़ी ही विवेकपूर्ण प्रतिक्रिया, सच कहा है अपने की प्रेम में पड़ कर अक्सर ऐसे लोग, केवल अपने बारे में ही सोचते हैं और उस परिवार के बारे में नहीं जहाँ उन्होंने अपने जीवन के इतने साल बिताये हैं, पर यहाँ प्रश्न है की क्या उन्हें अपने जीवन साथी को खुद से चुनने का हक नहीं है? क्या उन्हें प्यार करने का, और जिसे प्यार करें उसके साथ जीवन बिताने का हक नहीं है? मई जिस उदहारण की बात कर रहा हूँ वो तो अवयस्क भी नहीं थे, पर उनके साथ ऐसा ……………….. बहुत आभारी हूँ आपके विचार और प्रोत्साहन के लिए, आगे भी आपसे अनुरोध है की …….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    roshni के द्वारा
    December 27, 2011

    अबोध जी सबको हक़ है प्यार करने का भी और अपना जीवन साथी चुनने का भी .. मगर एक बात है प्यार उन्ही को हांसिल होता है जिनमे होंसला हिम्मत होती है .. प्यार कभी भीख में नहीं मिलता उसे हांसिल करना पड़ता है और जो लोग डर के कारन अपने प्यार से मुकर जाते है उनका अंजाम यही होता है … किसी ने कहा भी है की प्रेम की गली वही जाये जिसे जान प्यारी न हो ….. आभार

    abodhbaalak के द्वारा
    December 28, 2011

    प्रेम की गली वह जाए जिसे प्यारी न हो……… सच कहा है रौशनी जी, शायद इसी लिए किसी शायर ने कहा भी था ” ये इश्क नहीं आसान इतना तो समझ लीजे, एक आग का दरिया है और डूब के जाना है” कोई शक नहीं की कमज़ोर इरादे वालो के प्यार का यही अंजाम होता है और दृढ इच्छा शक्ति रखने वाले अक्सर सफल …………. पर किया क्या जाए रौशनी जी, प्रेम चीज़ ही ऐसी है की हर कोई इस दरिया में उतरना ……….. :( आभार एक बार और आपका, http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Amar Singh के द्वारा
December 23, 2011

बहुत सुन्दर लेख. किसी को पाना किसी को खोना, कभी हसना कभी रोना, कभी जागना तो कभी सोना बस यही है इस जहाँ में प्रेम का कोना. प्रेम करने के काबिल यदि सही में कोई है तो वह जिसे कभी कोई हमसे छीन नहीं सकता, जो कभी न रुद्ता है और न ही जिसे मनाने की ही कोई आवशयकता है. जो सदा एक समान रूप से सब पर प्रेम की वर्षा करता रहता है, उस पर कभी समय और काल का असर नहीं पड़ता. मेरे अनुसार मात्र व्ही हमारे प्रेम के काबिल है. यदि औरो में भी हम उसके दर्शन कर उसे प्रेम कर सके तो कभी भी वह प्रेम हमें दुःख और कष्ट न दे सकेगा. अबोध जी यह सब मात्र फिलोसोफी नहीं है, यह सत्य है और इसे स्वयं आजमा कर महसूस किया जा सकता है. और यह प्रेम ही शास्वत सत्य है.

    abodhbaalak के द्वारा
    December 24, 2011

    ह्म्म्मम्म्म्म, अमर जी, मई जिस प्रेम की बात कर रहा हूँ वो कुछ और ही है, और आप जिस प्रेम की बात कर रहे हैं वो और………. आपका प्रेम अब विरले ही नज़र आएगा, पर जिस प्रेम की बात मई कर रहा हूँ ( अगर वो सच में प्रेम ही है) वो हर जगह ………. आभार आपके इस अपनेपन का, जो आपने इस लेख को पढ़ कर अपने विचार रकेह http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

manoranjanthakur के द्वारा
December 23, 2011

प्रेम कव कहा किससे हो जाये कहना मुश्किल सुंदर बढ़िया बधाई

    abodhbaalak के द्वारा
    December 24, 2011

    धन्यवाद मनोरंजन जी, प्रेम हो जाना ही सब कुछ नहीं है न भय्या मेरे, उसके बाद जो कुछ होता है उसको लेकर ….. मार्गदर्शन करते रहें http://abodhbaalak.jagranjunction.com/


topic of the week



अन्य ब्लॉग

  • No Posts Found

latest from jagran