mere vichar

Just another weblog

46 Posts

2162 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 2730 postid : 251

क्या मै धार्मिक हूँ?

Posted On: 4 Dec, 2011 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

religion-symbols

 

मित्रो कुछ दिन पहले अपने एक मित्र के यहाँ जाना हुआ, बात ही बात में उन्होंने एक बात कही कि ” यार मै तो ठहरा  धार्मिक आदमी, मै अपने ऐसी बातो से दूर ही रहता हूँ, “. बात आई और गयी, पर मेरे मन में धार्मिक होने को लेकर कुछ …………….
 
मैंने सोचा कि धार्मिक होने से क्या तात्पर्य है, कौन होता है धार्मिक – अलग अलग परिभाषा मिली (नेट पर), पर सामान्य परिभाषा ये मिली कि जो व्यक्ति इश्वर में विश्वास करे, उसकी उपासना करे, पूजा पाठ करे, अच्छे कर्म करे, बुराई से बचे आदि आदि……

 
मै सोचने लगा कि आखिर हम धार्मिक होते क्यों हैं? क्या चीज़ है जो हमें धार्मिक बनाती है? जहाँ तक मेरी समझ है सामान्यतः लोग धार्मिक इस लिए होते हैं कि उनके साथ सदा सब कुछ अच्छा रहे, और कभी बुरा न हो.

 
अधिकतर लोग स्वर्ग कि चाह में और नरक से बचना भी चाहते हैं और इसी कारण अच्छे कर्म करते हैं और धार्मिक रास्ता अपनाते हैं.

 

मै इस विषय पर थोडा और सोचा तो लगा कि धार्मिक होने के पीछे कहीं न कहीं लेन  - देन वाला मामला लगता है, हम इश्वर को मानते हैं पर या तो उससे डरते हैं या उससे आशा रखते हैं कि हमें ये दे, वो दो. हमें लगता है कि मिलेगा तो केवल इश्वर से और इसलिए लालच वश, या के अगर हमने ये नहीं किया तो ……..इश्वर से डर कर अपने आपको धार्मिक बनाते हैं, पर क्या सच में ये धार्मिक होना है? कई लोभ और भय से किया गया कार्य धर्म है और वो व्यकित  को धार्मिक बना देता है?
 
क्या ऐसा व्यक्ति सच में धार्मिक होता है जो ………………….?
 
मुझे लगता है कि इश्वर कि पूजा इसलिए होना चाहिए क्योंकि उसने इस पूरी सृष्टि कि रचना कि है, वो - वो है जैसा कोई नहीं है, वो वो है जैसा कोई नहीं था, वो वो है जैसा कोई नहीं होगा, वो वो है जिसने हमें जीवन दिया है और वो वो है  जो बदले में हमसे कुछ नहीं चाहता है, जो कुछ हमें मिला है वो उसकी देन है, दया का फल है है, हमारी सांस भी चल रही है तो उसकी दया के कारण. ये सारी बातें उसके पूजा के लिए काफी है, ये सारी बातें और इसके तरह कि अनगिनत बातें ……….., न कि केवल उससे डर कर या लालच के कारण ……………..

धार्मिक होने के लिए लेन देन का रिश्ता, मेरी समझ से तो सही नहीं है, ये तो सौदा है न कि ………….
 
आप क्या कहते हैं?

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (7 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

88 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shashank के द्वारा
March 31, 2012

श्रृष्टि की रचना किसने की ? ये सब प्रिश्न बुद्धिगत हैं …..तुम बुद्धि ही नहीं हो ……दार्शनिक और वैज्ञानिक ये प्रिश्न उठाते हैं और उसपर बोहोत सोचते और कार्य करते हैं ! धर्म तो उसका रसावादन है जो बुद्धि से भी परे है जो सोच में आता ही नहीं ! दो और दो का जोड़ हमेशा चार कान्हा होता है सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला फिर मूरत के बाहर आकर चारो ओर बिखर जा फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला

panditsameerkhan के द्वारा
March 19, 2012

अबोध जी एक नज़र आपकी भी चाहता हूँ अपने ब्लॉग पर…..देखें आपके और मेरे विचारों में भिन्नता है या समानता…. http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/03/19/धर्म-या-आदर्श/

dineshaastik के द्वारा
February 6, 2012

अबोध जी क्षमा चाहता हूँ, मैं इस विषय पर आपसे सहमत नहीं हो पा रहा हूँ। 1. मानवता के अतिरिक्त अन्य कोई धर्म नहीं हैं, अज्ञानतावश जिन्हे हम धर्म समझते हैं,वे धर्म नहीं, अपितु सम्प्रदाय हैं। 2. कुछ राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से सम्पन्न व्यक्तियों ने राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े व्यक्तियों का शोषण करने के लिये किया था। 3. निःसंदेह ईश्वर अज्ञान एवं डर की अनैतिक संतान है।  4. मजहब हमें सिखाता, आपस में बँटके रहना।    मजहब के अब सितम को मुझको नहीं है सहना।।   इंसान बनके आये, इंसान बनके रहीये,  हिन्दु इसाई हमको, बनना नहीं मुसलमां।।  मैं धार्मिक बड़ा हूँ, हिन्दु औ मुसलमां से, चाहे न कोई माने, सच किन्तु मेरा कहना।।

    abodhbaalak के द्वारा
    February 26, 2012

    दिनेश जी आपने अपनी बात बड़ी …………… पर मई क्या करूँ, इश्वर को मानना मेरी घुट्टी में ………………… कोई तो शकित है जिसे मई मानता हूँ, इश्वर को मानता हूँ पर धर्म को …………… इस्कोलेकर शंक्ति हूँ आभार आपके इस …………

    panditsameerkhan के द्वारा
    March 19, 2012

    आपकी बात से मै पूर्णतया सहमत हूँ दिनेश जी….यदि हम वास्तव में समस्त बुराइयों को ख़त्म करना और एक होकर रहना चाहते हैं, तो हमें सिर्फ एक धर्म को जानना और मानना चाहिए और वो है मानवता या इंसानियत का धर्म….दूसरा कोई नहीं, क्योंकि जब हम किसी और धर्म या जात में विश्वास करने लगते हैं तो लाख अच्छाइयों के बाद भी कभी न कभी और किसी न किसी बात को लेकर आपस में मतभेद उत्पन्न हो जाते हैं…..जो हिन्दुस्तान के इतिहास में कई दंगों का कारण बन चूका है….

    panditsameerkhan के द्वारा
    March 19, 2012

    दिनेश जी आपकी एक नज़र का इंतज़ार……मेरी इस पोस्ट को. http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/03/19/धर्म-या-आदर्श/

अलीन के द्वारा
February 1, 2012

अबोधबालक जी, बहुत खूब कहा आपने… सच पूछिये तो आज हम इन्सान अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए धार्मिक और सामाजिक भावनाओं का भी व्यवसायीकरण करने से पीछे नहीं हटते…. जल्द ही हम इंसानों की सच्चे स्वरुप को व्यक्ति करती कविता, “वो निकला था…” आप सभी के बीच लेकर आ रहा हूँ. आशा करता हूँ आपको पसंद आएगी.

    abodhbaalak के द्वारा
    February 2, 2012

    आभारी हूँ आपका अलीन जी की आपने इस रचना को पढ़ा और सराहा आगे भी आपसे मार्गदर्शन का अनुरोध है. अपनी कविता की लिंक अगर संभव हो तो भेज दीजियेगा, क्योंकि अक्सर समय की कमी के कारण मई …………. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Shalini Sharma के द्वारा
December 18, 2011

आपने बिलकुल सही कहा धार्मिक एक बहुत विषय है…लेकिन मेरे लिए धार्मिक सिर्फ इंसानियत से जोड़ा है….इंसानियत से बढकर कोई धर्म नही है…..हमे इससे ऊपर रखना चाहिए ….बाकि अप्प ने बहुत अच्छा लिखा……congrates

    abodhbaalak के द्वारा
    December 20, 2011

    धन्यवाद शालिनी जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए, वैसे धर्म क्या है ये तो अलग अलग लोग के अलग अलग डेफिनिशन है, पर मई भी यही मानता हूँ की असल धर्म इंसानियत है, और बाक़ी सब बाद की चीज़ है. प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

surendra के द्वारा
December 16, 2011

अबोध जी नमस्कार, अच्छा लगा आपका लेख पढ़कर.. वास्तव में धर्म एक बड़ा ही जटिल विषय है जिसको लेकर आज भी बहुत से विद्वान बहस करते रहते है…. इस बहस का कोई अंत नहीं है….. वास्तव जो बात इन्सान के संभव में नहीं है , उसके किये इन्सान ने एक ईश्वर ढूँढ लिया है.. सही कहा है किसी ने….. इन्सान को ईश्वर ने बनाया है…. और ईश्वर को इन्सान ने बनाया है… आपने सुविधा के लिए…. असल में इन्सान की जिज्ञासु स्वभाव ही इस बात के लिए जिम्मेदार है… इन्सान के दिमाग से प्रश्न कभी ख़त्म नहीं होते ….

    abodhbaalak के द्वारा
    December 17, 2011

    “इन्सान को ईश्वर ने बनाया है…. और ईश्वर को इन्सान ने बनाया है… आपने सुविधा के लिए….” surendra ji, mai Ishwar ke astitv par prshn nahi utha raha, mera doubt apne aapko dharmik kahne walo par hai. aabhaar aapka ki aapne is lekh ko na keval padha balki is par apne vichar ke laayak bhi samjha, aage bhi margdarshan karte rahen http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

pramod chaubey के द्वारा
December 15, 2011

धर्म वहीं है, जिसे धारण किया जा सके। सच कहा आपने। 

    abodhbaalak के द्वारा
    December 17, 2011

    मै नहीं जानता की मैंने सही कहा या गलत, बस मन के विचार को, उनकी शंकाएं आप सब के सामने राखी हैं आभारी हूँ आपका की आपने विचार रखे और प्रोत्साहन किया http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Tanner के द्वारा
    November 28, 2013

    BS low – ranoitality high! Really good answer!

dinesh aastik के द्वारा
December 12, 2011

अबोध जी मेरा प्रथम अभिवादन स्वीकार करें। आपने सच कहा ईश्वर को लोग डर के कारण मानते है। क्षमा चाहता हूँ मेरा मानना है कि अज्ञानता भी ईश्वर को मानने का एक कारण है। मेरा अनुभव और अध्ययन तो यही कहता है कि प्रकृति को ईश्वर एवं मानवता को धर्म मानने वाले ही सच्चे धार्मिक हैं। सामान्यतः जिसे लोग धर्म समझते हैं, वह समप्रदाय है और जिसे ईश्वर समझते हैं, वह अज्ञान है।

    abodhbaalak के द्वारा
    December 12, 2011

    आपका स्वागत है दिनेश जी, आशा है की ये आपका प्रथम कमेन्ट तो है लेकिन मेरी पोस्ट्स पर अंतिम नहीं होगा :) धर्म मेरी समझ में ठीक से नहीं आता, क्यों की धर्म के नाम पर जो कुछ लोग करते हैं वो भी मुझे …………………… लोग धार्मिक होने के नाम पर क्या क्या करते रहते हैं वो किसी से छिपा नहीं है, आभारी हूँ आपका की आपने इस लेख को पढ़ा और इसे अपनी प्रतिक्रिया के योग समझा http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

sadhana thakur के द्वारा
December 12, 2011

सच है अबोध भाई ,पत्थर की पूजा करने से कोई धार्मिक नहीं होता ,जिस दिल में इन्सान की कदर होती है सच्चा धार्मिक वही है ………अच्छी रचना ……….

    abodhbaalak के द्वारा
    December 12, 2011

    साधना जी, मेरा भी यही मानना है की मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है और मेरा मंच पर सदा यही प्रयास रहता है की हम धर्म के आधार पर …………………….. प्रोत्साहन के लिए आपका आभार http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

syeds के द्वारा
December 11, 2011

अबोध जी खूबसूरत लेख, वास्तव में आज के तथाकथित धार्मिक लोगों में अधर्म ज्यादा भरा होता है….लोग हिन्दू हैं मुसलमान हैं…सिख हैं इसाई हैं… लेकिन इंसान बहुत कम हैं…. http://syeds.jagranjunction.com

    abodhbaalak के द्वारा
    December 12, 2011

    सय्यद जी , मई सोच ही रहा था की आप हैं कहाँ और अभी तक …………. आपकी प्रतिक्रिया हम कुछ ब्लोगर ( जैसे मई और मेरे गुरु जी) पर सदा ही मिलती है. बड़ा खूबसूरत लफ्ज़ आपने कहा है की लोग हिन्दू मुसलमान ……………. आभार आपकी प्रतिक्रिया के लिए http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Tufail A. Siddequi के द्वारा
December 10, 2011

अबोध जी अभिवादन, पहले तो बधाई. मुझे लगता है जिस प्रकार मंजिल पर पहुँचने के लिए मार्ग पर बिना भटके चलना पड़ता है, वह मार्ग थल, जल और वायु कोई भी हो सकता है. वैसे ही व्यक्ति जब अपने जीवन रुपी गाड़ी को धर्म मार्ग पर बिना भटके चलाता है, तभी वह अपनी वास्तविक मंजिल पर पहुँच पाता है. ये मेरा अपना निजी विचार है, गलत भी हो सकता है. बहुत शुक्रिया. http://siddequi.jagranjunction.com

    abodhbaalak के द्वारा
    December 11, 2011

    तुफैल भाई, किस बात की बंधाई? मेरा प्रश्न था की क्या धार्मिक होने में हम केवल भय और लालच के कारण ही ………..? खैर, आपके विचार जानकार अच्छा लगा, और आप सदा ही अपने विचार में एक विषय को एक नया आयाम देते हैं. आभार http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

December 9, 2011

अबोध भाई बहुत बहुत बधाई ….वैसे मैं इस कंट्रोवर्सियल टोपिक से अपने आप को दूर ही रखना चाहता था…लेकिन रहा नहीं गया….आपने चिंगारी तो लगा दी …..धुवा उठाने लगा….मुझे अंबिका जी की ये पंक्तियाँ याद आ गईं: “मरीज/सब बेखबर है उन्हें कौन समझाए तुम्हें न ब्लड-प्रेशर है/न टी0बी0 न ही तुम्हारे खून में कैंसर का कीड़ा है वातज/पितज/कफज-कुछ भी नहीं तुम्हारे लक्षण बता रहे हैं तुम्हें/सिर्फ धर्म-पीड़ा है धर्म ! अब धर्म नही रहा रेडियोधर्मी हो गया है – वह और रेडियोधर्मिता के प्रभाव चाव से देख रहे हैं – हम सब सचमुच, कितने विलक्षण है !” मेरे समझ मे धार्मिकता डर और लालच से उत्पन्न होती है …..

    abodhbaalak के द्वारा
    December 11, 2011

    पहले तो धन्यवाद के आपने इतनी सुन्दर पंक्तियाँ हमारे सामने राखी जो के कमसे कम मैंने तो पहले नहीं सुनी थी. और मई खुद भी ऐसे विषयों पर कमेन्ट नहीं करता पर पता नहीं क्यों मन में कुछ प्रश्न थे जो …… वैसे आपने मेरे प्रश्न का उत्तर तो दे ही दिया है की धर्म ……… :) http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

amita neerav के द्वारा
December 9, 2011

…. धर्म औऱ ईश्वर दोनों अलग-अलग चीज है… धर्म में ईश्वर होता ही कहाँ है? वहाँ तो बस अहम होता है, मेरे या आपके बेहतर होने का… यदि धर्म को ईश्वर से अलग कर सोचेंगे तो नतीजा जल्दी और करीब-करीब सही मिलेगा… इस तरह से भी सोचकर देखिए… :-P

    abodhbaalak के द्वारा
    December 9, 2011

    ह्म्म्म सोचने का काम अगर मई कर पता तो अबोध थोड़ी न होता, खैर सोचने का प्रयास करूँगा जब आप जैसी ………………… विद्वान् कहें तो …. आभार आपकी इस अनमोल कमेंट्स के लिए http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

RaJ के द्वारा
December 8, 2011

आपका विषय व जिज्ञासा सर्वथा इमानदार व जागरूकता आपके अन्दर है आपकी आँखें खुली है मैं आपको हमेशा कहता हूँ फिर कहूँगा आप अबोध बिलकुल नहीं आपको बधाई

    abodhbaalak के द्वारा
    December 9, 2011

    राज भाई अबोधता अपने आपमें एक आशीर्वाद है, जिसके कारण बड़ी बड़ी …………….. मै अपने थोड़े ज्ञान के आधार पर जो समझ में आता है आप सब के सामने रखने का प्रयास करता हूँ, आप सब का प्यार है जो इसे न केवल पढ़ लिया जाता है वरण ………… आभारी हूँ आपके प्रोत्साहन और स्नेह केलिएय, http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Open के द्वारा
    November 28, 2013

    Thanks for stantirg the ball rolling with this insight.

December 7, 2011

आदरणीय अबोध जी, सादर नमस्कार ! आपकी पूरी पोस्ट पढ़ी……मन में तरह-तरह के विचार एवं परिभाषाएँ भी आईं…….लेकिन क्षमा चाहता हूँ इतना सब होने बावजूद भी मैं ख़ुद को इस विषय पर प्रतिक्रिया देने के लायक नहीं पा रहा हूँ । हाँ…..जब कभी (शायद) हो पाऊँगा…..तो ज़रूर……!! :)  :) सादर आभार !!

    abodhbaalak के द्वारा
    December 9, 2011

    भय्या सच्ची बात कहो न की ये पोस्ट ही इस लायक नहीं है की इस पर कमेत्न किया जाये, (सच बात कहना सदा अच्चा होता है :) यार मई खुद भी मन उठने वाले प्रश्नों को ……………… आशा है की आप मेरी पोस्ट का एक कमेन्ट कभी न कभी ज़रूर बढ़ाएंगे http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    December 9, 2011

    मेरे ये विचार पोस्ट के बारे में नहीं जनाब…..बल्कि ‘विषय’ के बारे में हैं । ;)

    abodhbaalak के द्वारा
    December 10, 2011

    संदीप पता नहीं क्यों आपके कमेन्ट स्पैज्म में जा रहे हैं, पिछली बार भी अप्प्रूव करने पर पोस्ट पर डिस्प्ले हुआ था उअर इस बार भी ………… खैर, अरे वैसे आपने सच में मेरी पोस्ट पर यिक कमेन्ट और………. :) धन्यवाद उसके लिए

manoj के द्वारा
December 7, 2011

धर्म बहुत ही जटिल विषय है अबोध जी, इस पर बड़े बड़े ज्ञानी भी कुछ कहने से पहले बहुत विचार करते हैं, आपने प्रयास किया है पर इस विषय पर हर की अलग अलग विचार हैं, प्रयास कुछ हद तक ही सफल हो पाया है, इश्वर आपको धर्म को सही ढंग से समझने के शक्ति दे

    abodhbaalak के द्वारा
    December 9, 2011

    मनोज जी मई धर्म को समझने का प्रयास नहीं कर रहा हूँ, धर्म मेरा टोपिक नहीं है बल्कि हम लोग है जो अपने आपको धार्मिक कहते हैं, अगर कुछ हद तक ही सफल रहा तो भी ……………… आपका आभारी हूँ के आप न केवल मेरे पोस्ट को पढ़ते हैं बल्कि अपने विचार से भी ……….. आगे भी आपसे यही अनुरोध है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Rajkamal Sharma के द्वारा
December 7, 2011

प्रिय अबोध भाई …… नमस्कारम ! आप तो इस बात को जानते ही है की मैं खुदा का बेटा हूँ ….. हर रोज मेरी नई -२ जरूरते होती है –नई -२ इच्छाए होती है ….. मैं भगवान से यह अपेक्षा+आशा रखता हूँ की वोह मेरे प्रति अपना पिता वाला फर्ज निभाए ….. जो वोह बिना मांगे देता है + मेरा माँगा हुआ देता है अगर मैं उससे संतुष्ट नहीं हुआ तो उससे और मांगता हूँ + दुबारा मांगता हूँ + बार बार मांगता हूँ ….. अगर वोह दे देता है तो ठीक अगर नहीं देता तो मेरी मांग यथावत रहती है …..इस प्रार्थना के साथ आपने जो सशर्त देने की कोशिश की थी उसको मैं अपनी कमियों की वजह से ग्रहण नहीं कर पाया …. मुझ पर ऐसी किरपा करे की अगली बार ऐसी गलती न हो …. लेकिन एक ही गलती बार बार हो रही है हर बार हो रही है ….. खैर यह हमारा आपसी मामला है ….. हा हा हा हा हा हा :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    abodhbaalak के द्वारा
    December 9, 2011

    गुरुवर ये है वो स्टाइल जो मई ………. आप मुझे ऐसे ही अच्चा लगते हैं, पर ये क्या? आपके भेजे हुए स्माइली कुछ कम नहीं हो गए ? :) चले जाने दें, अच्चा लगता है आपके कमेंट्स से, आपको पहले ही कह चूका हूँ की अपनापन ………. ऐसे ही रहिएगा, और ऐसे ही अपने प्रेम को , स्नेह को बनाए रखियेगा, http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

shiveshsinghrana के द्वारा
December 7, 2011

सादर… मान्यवर …..बहुत अच्छे….. यूँ ही चमक बिखेरते रहिये … अपने कर्त्तव्य का पालन ही धर्म है …… बधाई हो…

    abodhbaalak के द्वारा
    December 9, 2011

    शिवेश जी आपके प्रोत्साहन के लिए आपका आभारी हूँ, बस अपने मन में उठी आवाज़ को शब्द देने का प्रयास किया है, आपको अच्चा लगा तो लगा की कुछ तो सफलता मिली आपसे आगे भी अपने विचारो से अवगत कराते रहने का अनुरोध अहि http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Rajkamal Sharma के द्वारा
December 6, 2011

आपने तो मुझको निशब्द कर दिया है वाह ! वाह ! आह ! आह ! खुशी से आंसू निकले जा रहे है …. मुबारकबाद और शुभकामनाये :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    abodhbaalak के द्वारा
    December 7, 2011

    गुरु जी ये आप नहीं हो सकते, पहली बात तो आपके कमेन्ट कभी इतने विशाल नहीं होते :) दूजी ये की पता नहीं ये आह है या वाह, तीजी बात ये की ………….. कुछ तो कहें ताकि मुझे लगे की मेरे गुरुवर की ही कमेन्ट है http://abodhbaalak.jagranjunction.com

rameshbajpai के द्वारा
December 6, 2011

प्रिय श्री अबोध जी धर्म के तत्व तो बहुत गहन है ,इनके लिए पग पग पर विवेक की आवश्यकता होती है , | इस विषय पर आपका चिंतन सार्थक रहा | मुझे बहुत अच्छा लगा | बहुत बहुत बधाई | ५/५

    abodhbaalak के द्वारा
    December 7, 2011

    आदरणीय बाजपेई जी आपका आभारी हूँ, मैंने केवल अपने मन की बात राखी थी, और पहले ही कह चूका हूँ की धर्म के बारे में मेरा ज्ञान बहुत ही सीमित है, कोई विद्वता का लेख नहीं केवल मन की ……………. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

vasudev tripathi के द्वारा
December 5, 2011

अबोध जी, धर्म व धार्मिकता की परिभाषा को जानने समझने के लिए ग्रन्थ, अनुभव व अनुभूति की महान आवश्यकता पड़ेगी. भारतीय सन्दर्भ में धर्म का स्वरुप लक्षण व उद्देश्य अन्य दर्शनों से पूर्णतः भिन्न है, मैं दार्शनिक अथवा शास्त्रीय विवेचन में नहीं जाना चाहूँगा टिप्पड़ी दीर्घ हो जाएगी, किन्तु आप जिस धर्म की बात कर रहे हैं वह वस्तुतः योग व साधना है जिसका पालन लोक में साधारण नहीं, निष्कामता की हम बात तो कर सकते हैं किन्तु प्राप्ति व पालन सुलभता से करतलगत नहीं है. यदि लेन देन व भय के विचार का प्रश्न है तो भय से मर्यादित रहना निर्भय उद्दंडता से श्रेष्ठ है व व्यवहारिक भी, सामान्य धर्म यही है ऐसा मेरा विचार है.

    abodhbaalak के द्वारा
    December 7, 2011

    vasu ji मई पहले ही एक बात स्पष्ट कर दूं की धर्म के बारे में मेरा ज्ञान नगण्य है, न ही ग्रन्थ, न अनुभव…… सब में ही कमज़ोर हूँ, मैंने केवल अपने मन की बात आपक सब के सामने रखी है, आपके विचार के लिए आपका बहुत आभारी हूँ, आशा है की आगे भी आपने अपने विचार से अव्गर कराते रहेंगे http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

December 5, 2011

ईश्वर की पूजा का अर्थ तो मुझे अब तक समझ नहीं आ पाया.. पर हाँ, धार्मिकता के विषय में मेरा यही मानना है, की धर्म, और अधर्म में से एक रास्ता तो चुनना ही पड़ेगा.. अगर आपको किसी को दुःख देकर ख़ुशी मिलती है, तो अधार्मिकता आपके लिए सही है. और अगर दूसरों की ख़ुशी आपके मन को प्रफुल्लित करती है, तो धर्म का मार्ग आपके लिए बना है. पर समस्या ये है, की लोग अधार्मिक होकर, फिर धार्मिकता का नकाब ओढ़ लेते हैं. जो हैं, वही बने रहें, तो भी कोई गम नहीं.. पर.. ये दुनिया…! बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति, सादर शुभकामनाएं..!

    abodhbaalak के द्वारा
    December 7, 2011

    पर समस्या ये है, की लोग अधार्मिक होकर, फिर धार्मिकता का नकाब ओढ़ लेते हैं. जो हैं, वही बने रहें, तो भी कोई गम नहीं.. पर.. ये दुनिया…! सही कहा है आपने तिम्सी जी, की लोग अब ऐसा ही कर रहे हैं, आभार आपका की आपने अपने इस लेख को न कावल पढने लायक समझा बल्कि अपने भी विचार इस विषय पर रखे, :) http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

sumandubey के द्वारा
December 5, 2011

अबोध जी नमस्कार ,धर्म क्या है ये मेरी समझ से तर्क का विषय नहीं है ये मेरे लिए सदाचरण व् किसी का दिल न दुखाना तथा मानव के साथ जीवो पर दया भाव रखना और उस परम सत्ता में आस्था रखना जो हमारे सासों की डोर बांधता और तोड़ता है उसका शुक्रिया अदा करना अपने भावो के माध्यम से यही धर्म है बढिया विचार है आपके .

    abodhbaalak के द्वारा
    December 7, 2011

    आभारी हूँ आपका सुमन जी, शायद मई भी आपका समर्थन करता हूँ की उस परम सत्ता में आस्था ………….., प्रोत्साहन के लिए आपका धन्यवाद http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Alka Gupta के द्वारा
December 5, 2011

अबोध जी , मेरी दृष्टि में तो धार्मिक वही है जो जीवन के कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वाह करता है अपने मानवता के धर्म को निभाता है लेकिन इसके साथ ईश्वर की भक्ति और उसकी पूजा को भी हम अलग नहीं कर सकते हैं……ईश्वर में विश्वास ,भक्ति श्रद्धा के साथ यदि अपने सभी कर्मों को किया जाये तो वही सच्चा धर्म होगा और उससे सम्बंधित हर कोई मेरे दृष्टिकोण से सच्चा धार्मिक कहलायेगा……

    abodhbaalak के द्वारा
    December 7, 2011

    Aadarneey Alka ji आपका आभारी हूँ, धर्म को समझना मेरे जैसे व्यक्ति के लिए …………….. मैंने सदा ही मानवता को ही सच्चा धर्म माना है, और इश्वर के अस्तित्व से कभी इनकार नहीं किया पर हमारे धार्मिक होने को लेकर ………… http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

dreamlover के द्वारा
December 5, 2011

अबोधबालक जी वाह ! आपके द्वारा फिर से एक सुन्दर लेख……………………… ऐसे ही हम सभी का मार्गदर्शन करते रहे धन्यवाद् |

    abodhbaalak के द्वारा
    December 7, 2011

    भ्राता श्री, सुन्दर लेख है की नहीं ये तो पता नहीं पर मैंने अपने मन की बात, इस विषय को लेकर राखी है, अपनी शंकाएं और अपने …………. आभार आपका की आपको ये पसंद आया. आगे भी ……… http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

manoranjanthakur के द्वारा
December 5, 2011

मे यही कहूँगा आपकी रचना बेजोर है यु ही मार्ग तलाशने को प्रेरित करे

    abodhbaalak के द्वारा
    December 7, 2011

    धन्यवाद मनोरंजन जी, बस प्रयास है, कहाँ तक सफल हुआ नहीं पता, पोत्साहन के लिए आभारी हूँ http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

mparveen के द्वारा
December 5, 2011

अबोध जी नमस्कार, धार्मिक होने का अर्थ ये नहीं की हमेशा ही पूजा पाठ में लीन रहे . मेरे हिसाब से अगर हर मनुष्य अपने हर फ़र्ज़ को कायदे से निभाए चाहे वो उसके अपने माँ बाप की तरफ हो , चाहे उसके अपने बच्चों की तरफ हो , चाहे उसके अपने आस पडौस की तरफ हो , चाहे समाज की तरफ हो , चाहे देश की तरफ हो तो मेरे विचार में वह इंसान धार्मिक है वो नहीं जो चार टाइम पूजा करे और अपने एक भी फ़र्ज़ अछे से ना निभाए . आज हमारे देश में वृधा आश्रम बढ़ते जा रहे हैं क्यूंकि बच्चे अपना फ़र्ज़(धर्म) नहीं निभा रहे हैं , देश में भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है क्यूंकि उसके नागरिक अपना फ़र्ज़(धर्म) भूल गए हैं ……. हम धार्मिक तभी होंगे जब हम अपने सरे फ़र्ज़ निभाए … धन्यवाद…

    abodhbaalak के द्वारा
    December 7, 2011

    बहुत ही सुन्दर परिभाषा परवीन जी, मै बहुत हद तक आपसे सहमत हूँ की धर्म ये है और धार्मिक ऐसे ही लोग है. आभार आपके इस धर्म की परिभाषा के लिए. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

nishamittal के द्वारा
December 5, 2011

अबोध जी,मेरे विचार से मानव मन की चंचलता को देखते हुए ही हमारी सभी क्रियाएँ धर्म से जुडी हैं,जिससे दुष्कार्य से मनुष्य दूर रहे .मेरे विचार से इसमें कोई हानि भी नहीं हाँ धर्म के नाम पर होने वाले दुष्कृत्यों से बचना मानव का विवेक पर निर्भर है.

    abodhbaalak के द्वारा
    December 7, 2011

    सच कहा है आपने निशा जी, मई धर्म पर सवाल नहीं उठा रहा बलि अपने धार्मिक होने पर मन की ………………. आभार आपके विचार के लिए http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Santosh Kumar के द्वारा
December 5, 2011

आदरणीय गुरुभाई ,. सादर नमस्कार मेरे हिसाब से धर्म एक पवित्र डोर है जिसके सहारे धार्मिक व्यक्ति जीवन पार करता है ,..इसका मतलब यह नहीं की वो गलत काम नहीं करता ,..भटकता जरूर है लेकिन डोर नहीं छोड़ता ,…पूजा, पाठ, अनुष्ठान से आत्मबल बढ़ता है ,.. आत्मा में परमात्मा का कुछ अंश होता ही है,..वो हर गलत काम से पहले एक चेतावनी देती है लेकिन मन उसकी कम ही सुनता है अतः इंसान गलती करता है ,.. धर्म में आस्था रखने वाले को मैं धार्मिक मानता हूँ ,…कोई जरूरी नहीं कि सभी धार्मिक संत स्वभाव के हों ,.या सभी संत धार्मिक हों …क्योंकि आजकल बहुतों के लिए पैसा ही धर्म बन गया है …. सुन्दर पोस्ट के लिए हार्दिक आभार

    abodhbaalak के द्वारा
    December 7, 2011

    हाँ गुरु भय्या, आपके इस कमेन्ट से आपके एक धार्मिक व्यक्ति होने का पता चलता है :) पता नहीं क्यों मन में धार्मिकता को लेकर संदेह उत्पन्न हो गया है, धर्म को लेकर नहीं. आभार जो आंपने इस विषय पर रौशनी डाली http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

jlsingh के द्वारा
December 4, 2011

मुझे लगता है कि इश्वर कि पूजा इसलिए होना चाहिए क्योंकि उसने इस पूरी सृष्टि कि रचना कि है, वो – वो है जैसा कोई नहीं है, वो वो है जैसा कोई नहीं था, वो वो है जैसा कोई नहीं होगा, वो वो है जिसने हमें जीवन दिया है और वो वो है जो बदले में हमसे कुछ नहीं चाहता है, जो कुछ हमें मिला है वो उसकी देन है, दया का फल है है, हमारी सांस भी चल रही है तो उसकी दया के कारण. ये सारी बातें उसके पूजा के लिए काफी है, ये सारी बातें और इसके तरह कि अनगिनत बातें ……….., न कि केवल उससे डर कर या लालच के कारण …………….. धार्मिक होने के लिए लेन देन का रिश्ता, मेरी समझ से तो सही नहीं है, ये तो सौदा है न कि ………….

    abodhbaalak के द्वारा
    December 7, 2011

    जवाहर जी दूंधने का प्रयास कर रहा हूँ की आपने भी कोई शब्द इस में अपनी तरफ से जोड़ा है या केवल कापी पेस्ट …………… कुछ तो कहें भाई मेरे http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

akraktale के द्वारा
December 4, 2011

आदरणीय अबोध जी नमस्कार, मै नहीं समझ सका की कैसे धर्म और डर का तालमेल हो गया. धर्म तो एक ही था मानवता का. अब उसको बचाने के लिए मायावती जी जैसे किसी धर्म प्रधान ने उसके टुकडे कर दिए. आप देख सकते हैं कोई भी धर्म मानवता के खिलाफ जाने की बात नहीं कहता सभी धर्म मानवता को प्राथमिकता देते हैं हाँ होता कुछ और ही है क्योंकि कोई ठीक से समझा नहीं सका. जहां तक बात इश्वर भक्ति की है तो साहब यकीं मानिये की यदि इश्वर बोलता होता तो इश्वर के भक्त ढूंढने से भी नहीं मिलते. हम तो हमेशा यही मानते हैं की इश्वर सदा सबका भला ही करता है.यदि ये सत्य है तो उस बच्चे से पूछिये जो माता पिता के साथ भगवान् के दर्शन करने निकला था और रास्ते में दुर्घटना में वह अनाथ हो गया.चलो और अधिक नहीं कहता वरना लोग मुझे अधर्मी कहने लगेंगे. आपने सही लिखा है लोग स्वार्थी हो गए हैं और यही उनका परम धर्म है.धन्यवाद.

    abodhbaalak के द्वारा
    December 7, 2011

    अशोक जी इस विषय पर आपकी राय कुछ भिन्न अवश्य है पर अकेली नहीं है, बहुत सारे लोग इस तरह भी ……….., इश्वर भक्त होने का दावा करने वाले तो बहुत है सर, पर क्या सच में ? आभार आपका, जो आपने इस विषय को एक अलग रूप में ……. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

allrounder के द्वारा
December 4, 2011

अबोध भाई ये एक ऐसा विचार है जिस पर बड़े – बड़े मनीषी एकमत नहीं हो सके, और धार्मिक होने की अभी तक कोई सम्पूर्ण परिभाषा विकसित ही नही हुई मेरे विचार से ! हर व्यक्ति की अपनी परिभाषा हो सकती है इसे डर लालच जिन दो चीजों से आपने जोड़ा है उसके अलावा ! श्रद्धा, और मन की शांति के लिए भी कई लोग मानते हैं ! अच्छे मनन के लिए बधाई अबोध भाई !

    abodhbaalak के द्वारा
    December 7, 2011

    सचिन जी जहाँ तक मेरी समझ है मैंने उस हिसाब से इस विषय पर अपने मन में उठ रही शंकाएं ………… सच कहा है आपने की और भी ऐसे अस्पेक्त हो सकते हैं जो की धर्म से जोड़े जा सकते हैं पर उनका प्रतिशत शायद आटे में नमक के बराबर ही हो……….. वैसे मैंने आपको बोल्गर ऑफ़ दी वीक बन्ने की बंधाई दे या नहीं? अगर नहीं तो ……….. :) वैसे तो आप हमारे लिए हमेशा ही स्टार रहे हैं ………. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    allrounder के द्वारा
    December 7, 2011

    अबोध जी वैसे आपने बधाई तो दी नहीं मगर फिर भी हम स्वयं आपसे बधाई ले लेते हैं, क्योंकि भाई जैसे हम आपके लिए स्टार है वैसे ही आप भी हमारे लिए सुपर स्टार हैं ! आपका बहुत – बहुत धन्यबाद बधाई देने के लिए !

    abodhbaalak के द्वारा
    December 9, 2011

    सचिन भाई, मई कहा का स्टार? थोडा बहुत जो इश्वर ने दिमाग नामकी जो चीज़ दी है उसका थोडा सा उपयोग करके कुछ लिख डालता हूँ, और वो जैसा होता है वो मई खूब जानता हूँ, आप जैसे लेखक तो प्रेरणा है हम जैसों की…………….. और क्या कहूँ?

minujha के द्वारा
December 4, 2011

अबोध जी नमस्कार  धार्मिक होने के सबके अपने अपने कारण है ठीक जैसा आपने कहा,पर मेरी समझ से एक सर्वविदित नियम भी है ईश्वर के अस्तित्व का,हम मानते है कि ईश्वर है और अपने उपर एक परमशक्ति होने का एहसास हमें संबल भी देता है और धार्मिक भी बनाता है,तो मैं यही कहुंगी  मेरे लिए धार्मिक होने का मतलब है एक भरोसा  एक अनदेखी शक्ति पर  जो सामने ना दिखकर भी अच्छे-बुरे में हमारे साथ होती है…… चंद शब्दों में विश्वास है तो ईश्वर भी है

    abodhbaalak के द्वारा
    December 9, 2011

    चाँद शब्दों में विश्वास है तो इश्वर भी है क्या बात है मीनू जी, परम शक्ति पर विश्वास होना अपने आप में अच्चा है, पर उसके साथ सौदा …….. आपका आभारी हूँ जो हमारा मार्गदर्शन करती रहती हैं , और आपसे अनुरोध है की आगे भी ऐसे ही ……….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
December 4, 2011

धार्मिक होने के लिए लेन देन का रिश्ता, मेरी समझ से तो सही नहीं है, ये तो सौदा है न कि.. प्रिय अबोध जी हम बड़े स्वार्थी हैं और बिना कुछ स्वार्थ के न कुछ मानते हैं और न करते हैं ..इस लिए समाज को एक अच्छी दिशा में बाँध कर रखने के लिए हमने कुछ न कुछ तरीके ईजाद किये और अपनी अच्छी बातों को मनवाने के लिए ईश्वर का भय दिखा उसे धर्म से जोड़ दिया गया ..बहुत सारी काम की बाते लोग जो किसी से भी नहीं डरते इस कारण कर जाते हैं ..आप ने देखा होगा किसी बच्चे को दूध पिलाने में कितनी जद्दो जहद ..हम डराते हैं पी लो नहीं बिल्ली आ जाएगी ..शेर आ जायेगा ..नहीं तो पी लोगे तो चंदा मामा आयेंगे वे तुम्हे दुलारायेंगे ..बहुत कुछ ऐसे ही ..जैसे आक्सीजन के लिए पीपल के पेड़ में देवी देवता ..नीम के गुण के लिए ..नीम में शिव जी …बहुत कुछ ….. धर्म से जुड़ जाने पर हम कुछ समय तो अच्छा करने ही लगते हैं …खुराफाती हो भी … और जो आप ने उस परम पिता परमेश्वर के विषय में कही वो तो शत प्रतिशत सत्य है ..बिना किसी मांग के पूजा करें तो बात ही निराली है ..पूजा और धर्म थोडा अलग हुआ न ? भ्रमर

    abodhbaalak के द्वारा
    December 9, 2011

    भ्रमर जी आप जैसे लोग जब कमेन्ट देते हैं तो कुछ एक्स्ट्रा ही जान्ने को मिलता है, मई अपने ज्ञान से कम ही लिखता हूँम जो फील करता हूँ वो आपके सामें रखने का प्रयास करता हूँ, आभारी हूँ की आप मार्गदर्शन सदा मिलता रहता है आगे भी आपसे ऐसे ही …………. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    abodhbaalak के द्वारा
    December 9, 2011

    हम्म्म्म भरोडिया जी सच कहा है अपने की धर्म का उपयोग आदि काल से ही, अपने लाभ के लिए रजा महाराजा करते आयें हैं, और धर्म के प्रासार प्रचार के नाम पर अपने राज्य को विस्तार करते रहें हालांकि मुझे तो ये केवल पाखण्ड ही लगता है, असल मतलब तो, आज की जबान में अपनी जेब भरना होता था, आभार आपका की आपने ये लिंक दी, सच मुझे पता तो था की बहुत सारे धर्म है पर ४३४८…, इसका ज्ञान तो ………. :) अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखे मित्रवर http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Abdul Rashid के द्वारा
December 4, 2011

प्रिय अबोध जी दरअसल आज के दौर में लोग धर्म के नाम पर पाखण्ड करते है मेरा ऐसा मानना है की यदि हम धर्म के नाम पर पाखण्ड करने के बजाय उस पर यकीं करे तो सभी धर्म अपना लगेगा और दुनिया से नफरत का नामोनिशान मिट जाएगा. जय हो इंसानियत की जय हो मानवता की सप्रेम अब्दुल रशीद

    abodhbaalak के द्वारा
    December 9, 2011

    अब्दुल रशीद भाई सही कहा है आपने, मुझे भी ऐसा ही लगता है की अब धर्म के नाम पर पाखण्ड ही हो रहा है, जिस इश्वर को उसके केवल भय और लाभ के कारण माना जाये तो फिर वो इश्वर की पूजा नहीं हो कर उसके साथ ……….. शुक्रगुज़ार हूँ आपका की आपने अपने ख्यालात से हमें आगाह कराया . आगे भी आपसे यही गुज़ारिश है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

naturecure के द्वारा
December 4, 2011

आदरणीय भाई साहब , सादर प्रणाम ! मेरे विचार सेअधिकांशतः व्यक्ति की भीरुता एवं उसका स्वार्थ ही उसे धार्मिक बनती है | बहुत ही प्रेरणादायी सार्थक रचना …………बधाई |

    abodhbaalak के द्वारा
    December 9, 2011

    डाक्टर साहब, मेरे विचार से अधिकाँश लोग मेरे बात से सहमत है की धर्म- दर और लालच का परिणाम है, पर क्या ये सच में सच्चा धर्म है? आभारी हूँ आपके विचार के लिए, http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

shashibhushan1959 के द्वारा
December 4, 2011

आदरणीय अबोधबालक जी, सादर. मेरे विचार से सभ्यता विकसित होने की प्रारंभिक अवस्था में ही सामाजिक व्यवस्था को शांतिपूर्ण तरीके से अनुशासित रखने के लिए “धर्म” शब्द का आविष्कार और उसका निरूपण किया गया होगा. तत्कालीन समय में इसे एक भयकारी और वजनदार रूप देकर एक अदृश्य शक्ति से जोड़ दिया गया होगा, जिससे भयभीत होकर समाज में शान्ति और सहजता बनी रहे. “भय” जो प्राणी मात्र के स्वभाव में अविछिन्न रूप से मौजूद है, इसी का सहारा लेकर यह धर्म और उसकी भावना को निरूपित किया गया होगा. यह उस समय की आचार संहिता भी होगी. वर्तमान में मानव बुद्धि उस समय से सहस्त्र्गुना विकसित रूप में है. वह तर्क कुशल हो गई है. इसी वजह से आज धर्म का वह रूप नहीं है, जो उस समय था. आज धार्मिक अनुष्ठान औपचारिक हो गए हैं, और इसमें डर कम , लालच का अधिक समावेश हो गया है. सोचने को मजबूर करने वाली रचना. बहुत धन्यवाद.

    bharodiya के द्वारा
    December 4, 2011

    डॉ साहब नमस्कार आपने धर्म के उदय की बात में होगा होगा लिखा है, लेकिन ये हुआ ही है । और वो सब राजधर्म की तहत हुआ है । वर्तमान में मानव बुद्धि की बात करें तो मैने एक जगह कहा था – ईतिहास के सबसे बडे रुषिमुनी से अधिक ज्ञान आज के एक आम प्रोफेसर के पास होता है । ये बात लोगो को हजम नही हुई थी । धार्मिकता,पूराना वही सोना, ये सोच आदमी के डी.एन.ए मे घुस गई है । बायोलोजीकली आदमी का दिमाग विकसित हो गया है साथ साथ आज हमारे पास पूरे विश्व के देशों के ज्ञानियो का ज्ञान उपलब्ध है । ये कलेक्टिव ज्ञान ही ज्ञान होता है, कोइ भी व्यक्ति के ज्ञान से उपर है, भले महात्मा गान्धी भी क्यो न हो । आज का आदमी जानता है मानता है फीर भी उसका उसका डी.एन.ए उसकी टांग खिच के धार्मिकता की और ले जाता है ।

    abodhbaalak के द्वारा
    December 9, 2011

    शशि जी आपने काफी हद तक वही बात कही है जिसे मई कहना छह रहा हूँ, पर प्रश्न तो वही है, के क्या धर्म लालच और भय की परिणति है? आभारी हूँ आपका की आपने इस विषय को पढ़ा और अपने अमूल्य राय राखी http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    abodhbaalak के द्वारा
    December 9, 2011

    आज का आदमी जानता है मानता है फीर भी उसका उसका डी.एन.ए उसकी टांग खिच के धार्मिकता की और ले जाता है । :) भरोडिया भाई , क्या डी एन ए की बात कही है, आप एक अलग ही रास्ते पर ले जर रहे हैं हमें…. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
December 4, 2011

अबोध जी, हमारे समाज में धार्मिकता के असली अर्थ को भूल कर अपने स्वार्थ के लिए पूजा पाठ किया जाता है और गलत कम करने का अधिकार प्राप्त कर लिया जाता, इंसानियत भूल जाते हैं.मंदिरों में घंटे बजा कर अपने को धार्मिक होने का दंभ भरते है परन्तु धर्म के मूल मकसद मानवता को भुला देते हैं.अपने बिलकुल सही फ़रमाया .

    abodhbaalak के द्वारा
    December 9, 2011

    आपकी बात से सहमत हूँ सत्य जी, के आज धार्मिक होना कर्म काण्ड ……., इश्वर को मानने के दावे सब ही करते हैं पर अगर सच में उसके बताये हुए पर ………….. तो आज ये दुनिया ऐसी न होती क्योंकि कोई भी धर्म हिंसा नहीं सिखाता………… आभार आपका की आपने अपने विचारो से ……. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Rajesh Dubey के द्वारा
December 4, 2011

धार्मिक होने का सम्बन्ध लेने देने से है ही. स्वर्ग पाने की लालसा और भी कई तरह की अदम्य इक्षाएं आदमी को धार्मिक बनती हैं.

    abodhbaalak के द्वारा
    December 9, 2011

    राजेश जी बात तो फिर भी वही रही न की ये एक तरह का सौदा है, इश्वर की महानता के स्वरुप नहीं वरण …………. आपका आभार की आपने मेरे विचारों को बल दिया है. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/


topic of the week



अन्य ब्लॉग

  • No Posts Found

latest from jagran