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हम जानवर हैं, वहशी जानवर

Posted On: 1 Nov, 2011 Others में

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“Man is a social animal”, मनुष्य  एक  सामाजिक  प्राणी  है . बहुत  पहले  ये  पढ़ा  था , शायद  अरस्तू  का  कहा  हुआ  ये  सेंटेंस सही  है , पर  जहाँ  तक  मुझे  लगता   है  की  एनिमल  को  जंतु  या  प्राणी  कहने  के  बजाये  जानवर  कहें  तो  कुछ  ज्यादा  ही  सही  बैठता  है  और  सुनने  में  भी  ……… ,

 

चलिए  हम  अपने  दिल  को  बहलाने  के  लिए  सोशल  या  सामाजिक  शब्द  का  प्रयोग   कर  लेते  हैं  पर  सच  में  तो  हम  हैं  जानवर  ही  ना ?

 

हम  तरह – तरह  के  सुन्दर  शब्दों  का  प्रयोग   कर  के  अपने  आपको  कुछ  भी   कहें – सभी , शालीन , सुशिक्षित , सुसंस्कृत  आदि  आदि   पर  क्या  हम  इस  बात  से  इंकार  कर  सकते  हैं  की  इन  शब्दों  के  पीछे  हम  हैं  तो  जानवर .

 

कहते  हैं  की  व्यक्ति  अपने  सवभाव   को , कभी  बदल  नहीं  सकता ,वो  अपने  अन्दर  जो  बदलाव  लता  है  वो  उसकी  प्रवृति  को  कुछ  हद  तक  दबा  तो  ज़रूर  देता  है , उसमे  थोडा  बदलाव  तो  ला  सकता   है  पर  पूरी  तरह  से  नहीं   समाप्त  कर   पाता , उसके  अन्दर  उसकी  असली  प्रवृति   ढकी  छुपी  बैठी  रहती  है  और  जैसे  ही  उसे  अवसर  मिलता  है  वो  फिर  से  एक  बार  अपने  असली  रूप  में  …………

 

आप  सोच  रहे  होंगे  की  ये  आज  मुझे  क्या  हो  गया  है  जो  इश्वर  की  सबसे  उत्तम  कृति  को  आज   जानवर  कहने  पर  तुला  हूँ ? दर  असल  पिछले  दिनों  गद्दाफी  का  अंत  देखा , सड़क  पर , लोगों  के  बीच , पिटते  हुए , मार  खाते  हुए , और  फिर  एक  युवक  के  हाथों  गोली  खा  कर  मरते  हुए . उसका  अंतिम  संस्कार  करने  के  लिए  भी  …………., अब  आप  सोच  रहे  होंगे  की  मै  गद्दाफी  का  समर्थन  कबसे  करने  लगा ? ऐसा  कुछ  नहीं  है , ना  मै  उसका  समर्थक  हूँ  और  ना  ही  उसके  लिए  मेरे  मन  में  किसी  भी  तरह  की  सदभावना   है , मै  तो  केवल  उस  भीढ़  की  मानसिकता की  बात  कर  रह  हूँ  जो  उसे  मार  रही  थी , और  ख़ुशी  से  झूम  रही  थी , और  कहीं  na कहीं  उस  भीड़  के  हर  व्यक्ति  के  बीच  छिपा  हुआ  जानवर  ………………….,

 

ये  केवल  वहीँ  की  बात  नहीं  है , बल्कि  हर  जगह  की  बात  है , हमारे  अन्दर  का छिपा  हुआ  जानवर , समय  समय  पर  बाहर  निकलता  रहता  है , कहीं  सड़क  पर  पुलिस   के  हाथों  बुरी  तरह  पिट ता   हुआ  आदमी , तो  कभी  डंडो  के  बीच  हाथ  पैर  से  लटका  हुआ , कहीं  सड़क  पर  चलती  लड़की  पर  तेजाब  फेकता  तो  कभी   1984 के  दंगो  में  ना  जाने  कितने  मासूमो  को ……….., तो  कभी  गोधरा  की  ट्रेन  के  मासूम  यात्रियों  को  जलाते   हुए , कभी  गुजरात  के  बाकी  शहरो  में  औरतो  और  बच्चो …………………………, उसे  मौक़ा  मिलना  चाहिए  की   कैसे  वो  बाहर  निकले  और  इंसान  होने  के  ढकोसोलो  को  चीर  कर  अपनी  असली  प्रवृति  को  सबके  सामने ………………………..,

 

कहते  हैं  की  धर्म  ही  केवल  वो  मार्ग  है  जिसको  अपना  कर  हम  अपने  आपको  …………… पर  हमारे  अन्दर  का  छिपा  हुआ  जानवर  तो  इसका  भी  लाभ  उठाकर …………………………., और  इसी  का  माध्यम  बना  कर  शिकार  करता  है ,

 

पता  नहीं  मुझे  ऐसा  क्यों  लगता  है  की  हम  सब  केवल  नाम  के  ही  …………………. पर  हम  सब  हैं  अन्दर  से  जानवर , वहशी  जानवर .

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95 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aatish के द्वारा
April 10, 2012

आपने सही लिखा पर शायद ” जानवर ही होता ग़र तो राहत-ए-जिगर रहता, ज़ात-ए-आदम होने कहाँ फक्र करें ! “

D33P के द्वारा
January 28, 2012

सच है हर नकाब के पीछे एक और चेहरा है और इंसान के दिल पर जानवर का पहरा है कोई झांक न सके हर दरवाजे पे पहरा है क्या से क्या कर जाये ये राज़ बड़ा ही गहरा है

    abodhbaalak के द्वारा
    January 29, 2012

    :) खूबसूरत शायरी के साथ आपने अपनी बात कही है. दीप्ति जी आपकी ग़ज़लें पढ़े हुए अरसा बीत गया है, उम्मीद है की जल्दी ही आप फिर से …… http://abodhbaalak.jagranjunction.com

Timsy Mehta के द्वारा
November 16, 2011

कोई शक नहीं, जानवर ही तो हैं हम सब.. पर एक बात है..! ‘विवेक’..! ये ही हमें जंगलियों से अलग कर सकता है. और सोये हुए विवेक को जगाने के लिए कभी मुर्गा बन कर बांग देनी पड़ती है, कभी शेर बनकर दहाड़ना पड़ता है. सवाल है, की कौन बनेगा मुर्गा-शेर-….! … “जो घर फूंके आपना, चले हमारे साथ!”

    abodhbaalak के द्वारा
    January 29, 2012

    सही प्रश्न है टिम्सी जी, कौन बनेगा मुर्गा शेर ? समस्या ये है की यही विवेक कभी क्रोध में तो कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाती के नाम पर…… और फिर हम वही बन जाते हैं, जानवर, वहशी जानवर…… आभारी हूँ आपका की आपने ……… http://abodhbaalak.jagranjunction.com

manoranjanthakur के द्वारा
November 14, 2011

देर से ही सही मुज जैसे अनिमल का भी बधाई स्वीकार करे

    abodhbaalak के द्वारा
    November 15, 2011

    हुज़ूर आप एनिमल नहीं अनमोल; हो, आपकी प्रातिक्रिया के लिए धन्यवाद, आभार ……… http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

pramod kumar Yadav के द्वारा
November 11, 2011

abhodh ji bahut achcha lekh apne diya hai uske liye apko dhanyabad

    abodhbaalak के द्वारा
    November 11, 2011

    प्रमोद जी आपकी प्रतिक्रिया सदा ही मिलती रहती हैं, अछ्छा लगता है, आपके स्नेह और सराहना के लिए आभार http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

neerajtomer के द्वारा
November 10, 2011

नमस्ते अबोध जी …………….. आपकी बहुत सारी शिकायते प्राप्त हुई ……………….. क्षमा चाहूंगी ……….. मैंने आपकी प्रतिक्रिया के उत्तर दिए थे परन्तु शायद वे आपको प्राप्त नहीं हुए……………. कारन यह भी हो सकता है की मैअभी इस ब्लॉग के सारे features से अवगत नहीं हु ……………….. आपकी प्रतिक्रियाव के लिए एक बार भी बहुत बहुत धनयवाद (इससे पूर्व के धन्यवाद मैं अपने ब्लॉग पर आपको देती रहती हु ……………..)

    abodhbaalak के द्वारा
    November 11, 2011

    नीरजा जी सबसे पहले तो आपका आभार, की आपने पहली बार ……….. शिकायत तो नहीं है, बस सोचा करता था की आप अपने पोस्ट पर किये गए कमेंट्स के उत्तर तक नहीं देती हैं, और आपके पोस्ट पर किये गए किसी भी कमेंट्स का उत्तर मेरे विचार से किसी को नहीं मिला है, :) चलें आपको ये भी बता देते हैं की किसी भी कमेन्ट का उत्तर देने के लिए कुछ खास नहीं करना पड़ता, केवल आपके पोस्ट पर जो कमेन्ट हैं उसके नीचे रेपली आप्शन हैं, उसे क्लीक कर के हिंगलिश आप्शन को क्लीक करें और अपने कमेन्ट को कमेन्ट बॉक्स में लिख डालें , उसके बाद नीचे दर्शाए गये शब्द को आपने उसके नीचे दिए गए बॉक्स में टाइप करन होगा और फिर सुब्मित पर क्लिक कर दें बस हो गे. :) एक बार फिर से आपका धय्न्वाद, आगे भी ल……….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
November 10, 2011

प्रिय अबोध जी गुरु पर्व की लख लख बधाइयाँ..प्रभु हम सब ke मन को निर्मल करें …जग रोशन हो .. भ्रमर ५

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
November 10, 2011

प्रिय अबोध जी गुरु पर्व की लख लख बधाइयाँ..प्रभु हम सब में मन को निर्मल करें …जग रोशन हो .. भ्रमर ५

alkargupta1 के द्वारा
November 10, 2011

अबोध जी , कभी-कभी अच्छी रचनाएँ दृष्टि से ओझल हो जाती हैं मैं भी इस रचना को पढने से कहीं न कहीं चूक गयी.आज सामने ही यह रचना देखी तो पढ़ा….. कभी-कभी ऐसा ही हो जाता है जिसके लिए खेद है…….. बहुत सही लिखा है आपने…..बस अवसर की तलाश रहती है और अपना तथाकथित रूप प्रदर्शित कर देते हैं……..अति उत्तम रचना के लिए बधाई

    abodhbaalak के द्वारा
    November 10, 2011

    आदरणीय अलका जी आप सब का स्नेह है जो की आप मेरी रचनाओं को पढने लायक समझती हैं, और उन्हें खोज कर …… रही बात इस रचना की, तो जो मुझे लगता है वो मई मंच पर आप सब के साथ शेयर करता हूँ, भले ही वो औरो की सोच से भिन्न ही क्यों न हो. आभारी हूँ आपका …. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

suman dubey के द्वारा
November 7, 2011

अबोध जी नमस्कार, न जाने आपकी यह रचना कैसे देख नही पायी चलिये देर से सही पढा मैने आपका कथन सत्य है आज इन्सान जानवर से बुरा है समाज मे घट्ते घटनाक्रम को देख कर कम से कम तो यही लगता है।

    abodhbaalak के द्वारा
    November 9, 2011

    सुमन जी आभार की आपने अपना वक्तत्व रखा, देर से ही सही, :) हमारे गिरते हुए नैतिक स्तर से मुझे कुछ ऐसा ही लगा जोकि अपने लेखनी से ….. आपके कमेंट्स का सदा ही इंतज़ार रहता है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 7, 2011

ये अवसरवादिता का एक उदहारण है की हम तब ही नियम और कानून की बात करते हैं जब हम कोई लाभ चाह रहे हों….. पर जब बात दूसरे की होती है तो हम सारे नियम भुला देते हैं ॥ भीड़ पर लाठी भांजना तभी तक गलत है जब तक हम उस भीड़ मे हैं….. नहीं तो हम खुद ही मानते हैं की भीड़ का तो इलाज़ ही लाठी है… ये दोगलापन हमें इंसान तो दूर पशुओं मे भी शामिल होने से वंचित करता है……. क्योकि पशुओं के नियम हर दशा मे एक ही है॥ अच्छे लेख के लिए बधाई….

    abodhbaalak के द्वारा
    November 9, 2011

    प्रिय पियूष जी सबसे पहले तो वेलकम बैक, बहुत समय के बाद आपके कदम इस अबोध के…………. और अब ऐसे ही अपने लेखनी के रंग से मंच को एक बार फिर से रंग दे………. आज हमारी नैतिकता के स्तर के रंग बिरंगे उदहारण आप खुद भी देख रहे होंगे, अब तो जानवर भी हमारी हरकतें देख कर ……………… दुःख भी होता है और शर्म भी …….. आशा है की आपका मार्गदर्शन सदा बना रहेगे http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

abhishek singh के द्वारा
November 5, 2011

शानदार

    abodhbaalak के द्वारा
    November 9, 2011

    धन्यवाद अभिषेक जी, इस लेख को पढने और उस पर अपने विचार रखने केलिए मेरे विचार से आपका ये पहला कमेन्ट है मेरे किसी पोस्ट पर ……… :) http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

manoj के द्वारा
November 3, 2011

अबोध जी मनुष्य योनी में जन्म लेना हमारे पिछले जन्म के अच्छे कर्म का फल होता है पर हम अपने बुरे कर्म के कारण पशुओं से भी बुरे बनते जा रहे हैं सार्थक लेख के लिए बंधाई

    abodhbaalak के द्वारा
    November 3, 2011

    मनोज जी मुझे नहीं पता की मैंने अपने पिछले जन्म में क्या अच्छे कर्म किये थे जो इस जन्म में मनुष्य…………., पर इस जन्म के कर्म तो मई अछि तरह से जान रहा हूँ, और दूसरों के देख भी रहा हूँ, आभार आपके कमेंट्स ….. आगे भी अपने विचार से अवगत कराते रहें http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

manoj के द्वारा
November 3, 2011

अबोध बालक जी मनुशु योनी में होना अपने आप में बड़ी बात है, ये हमारे अच्छे कर्म का फल होता है, पर आजके युग में हमारे कर्म हमें पशु से भी बुरा बनाते जा रहे हैं सार्थक लेख के लिए बधाई

    abodhbaalak के द्वारा
    November 3, 2011

    ?????????????? लगता है की आपने गलती से दो बार …

राही अंजान के द्वारा
November 2, 2011

आदरणीय अबोध जी, सादर प्रणाम ! आपकी हर बात बिल्कुल ठीक है…..बस हमें मौका मिलने भर की देर है । और जब मिलता है तो फिर अपनी “कथित” इंसानियत का असली रूप सबके सामने ला छोडते हैं । अच्छी पोस्ट पर हार्दिक साधुवाद !! :)

    abodhbaalak के द्वारा
    November 3, 2011

    धन्यववाद संदीप जी आपके समर्थन और प्रोत्साहन के लिए, अब तो जैसा की रौशनी जी ने कहा की हम जानवर से इंसान की तुलना कर के उसे ………………. आभार …… http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

rita singh 'sarjana' के द्वारा
November 2, 2011

अबोध जी , प्राणिश्रेष्ठ मानव होते हुए भी कभी-कभार हमारे अन्दर छुपे जंगली गुस्सा हमें उकसाते हैं और जो उस गुस्से को पहचान नहीं पाते वह ऐसे हरकत कर बैठते हैं जो हैवान करते हैं लेकिन अबोध जी ,मुझे जहाँ तक पता हैं जानवरों की भी भावनाए होती हैं ,स्नेह ,प्रेम नाराजगी वह भी खूब समझते हैं ,हाँ ,शायद इंसान की तरह कभी-कभी उनमे भी हैवानियत हावी होती होगी l इसका मतलब यह हुआ इंसान जानवर नहीं वल्कि उनमे शैतान हावी होता हैं l जिसके कारण परिणाम बुरा होता हैं l

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    रीता जी मुझे तो लगता है की कभी कभी हम जानवर के अन्दर का असल जानवर बाहर आ जाता है, चाहे उसका कारण क्चुह्ह भी हो, अब तो बेचारे जानवर को भी इंसान कहना………………… आभार आपके विचारों के लिए……….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
November 2, 2011

प्रिय अबोध जी अभिवादन बहुत सही कहा आप ने हमारे अन्दर का शैतान तो जागता है ये सच है अच्छा हुआ की आप ने जो देखा केवल उसी का समर्थन नहीं किया क्योंकि उनके अन्दर का शैतान न जाने कितना जागा और कितने जुल्म ढाए..सुन्दर लेख सच को दर्शाता हुआ ….पहले जानवर बन जाने वाले काश जागें हमारे अन्दर का छिपा हुआ जानवर , समय समय पर बाहर निकलता रहता है , कहीं सड़क पर पुलिस के हाथों बुरी तरह पिट ता हुआ आदमी , तो कभी डंडो के बीच हाथ पैर से लटका हुआ , कहीं सड़क पर चलती लड़की पर तेजाब फेकता तो कभी 1984 के दंगो में ना जाने कितने मासूमो को ……….., तो कभी गोधरा की ट्रेन के मासूम यात्रियों को जलाते हुए , कभी गुजरात के बाकी शहरो में औरतो और बच्चो .. शुक्ल भ्रमर ५

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    भ्रमर जी आप जैसा कुशल लेखक नहीं हूँ और न ही शब्दों का धनि,केवल जो फील करता हूँ उसे शब्द देने का प्रयास कर ता हूँ, आभार आपके, की आप न केवल इसे पढ़ते हैं वरन इसपर अपने वक्तत्व भी …….. सदा मार्गदर्शन का अनुरोध है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    surendr shukl bhramar5 के द्वारा
    November 3, 2011

    यही तो है अबोध रूपी नगीना जो महसूस किया दिल का लिख डाला …सच्चाई उजागर …बेबाक ऐसे ही अन्ना के आंधी के दौर में भी ….अच्छा लगता है …हम तो आप सब से सीख लेने ….. भ्रमर ५

aditya के द्वारा
November 2, 2011

अबोध जी नमस्कार ! आप केवल नाम के अबोध हैं, लिखते समय तो बहुत ही भावुक हो जाते हैं और कर देते हैं……. ये सही हैं के गद्दाफी के साथ जो हुआ वो गलत है. किन्तु इसी गद्दाफी ने हजारों लोगों को इससे भी ज्यादा बेरहमी से क़त्ल किया और परेशान किया. उन युवतियों के बारे में सोचिये, जिनके साथ इस गंदे आदमी ने गलत काम किया और फिर उन्हें अपने पुत्रों और अपने सैन्य अधिकारियों की जिस्मानी भूख मिटने के लिए उनके सामने दल दिया…. क्या वे रोई, गिडगिड़ायी नहीं होंगी….. जरुर उन्होंने अपनी इज्जत की भीख मांगी होंगी,,, फिर उस राक्षस ने अट्टहास किया होगा और उनको मरने के लिए छोड़ दिया होगा……. इस प्रकार के आततायी को कष्ट उठाते देख कर अगर कोई कम अत्याचारी होगा तो मेरा कम से कम ये मानना है कि ठीक ही हुआ….. क्योंकि वो कोई शरीफ व्यक्ति नही था……. आदित्य http://www.aditya.jagranjunction.com

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    आदित्य जी संभवता आप का कहना सही है की मई भावुकता में …………, मेरा टोपिक गद्दाफी नहीं बल्कि आदमी के अन्दर छिपा जानवर है, जो की अपने असल रूप को अक्सर ही उजागर करता रहता है रही बात गद्दाफी की, तो मैंने आदरणीय शाही जी के मेल के उत्तर में कुछ तथ्य रखे हैं जिनपर कुछ और ब्लोगर ने अपनी राय राखी है , कृपा कर के उसे देख लें. आभार आपके कमेन्ट और प्रोत्साहन का http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

roshni के द्वारा
November 2, 2011

अबोध जी अच्छा लेख मगर इंसान की तुलना जानवर से न करिए क्युकी जानवर इस तरह की कोई हरकत करता ही नहीं … मेरे ख्याल से हर इंसान के अंदर एक राक्षस है … बाहर से तो इंसान ही लगता है मगर बीतर बैठा ये राक्षस मौका मिलने पर बाहर आ जाता है … और वोह सब करता है जो बेचार जानवर सोच बी नहीं सकता … जानवर तो बेजुबान प्राणी है … और इंसान …………. आभार सहित

    manoj के द्वारा
    November 3, 2011

    रौशनी जी आप ने तो मेरे दिल की बात कर डाली, सच में जानवर भी बेचारा हमारी हरकतें देख का शर्म से पानी पानी ….. आपका आभार की आपने …………… http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

sdvajpayee के द्वारा
November 2, 2011

 बिल्‍कुल सही कहा अबोध  जी। इंसान के रूप में जानवर वाले व्‍यवहार प्राय: हमें देखने सुनने को मिलते हैं। दरअस्‍ल, सभ्‍यता-संस्‍कार ही हमारे इस ”जानवर” को कमजोर करते हैं। एक शेर है-  परत दर परत हर चेहरा है, प्‍याज के मानिंद  बहुत दिनों से कोई आदमी नहीं देखा।

    abodhbaalak के द्वारा
    November 3, 2011

    बहुत खूसूरत शेर के साथ आपने अपनी बात राखी है बाजपेई जी, आपका आबार की आपने अपने विचार इस पोस्ट पर रखें, जो की ………….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

ashvini kumar के द्वारा
November 2, 2011

अबोध जी सुप्रभात ,,उक्त वाक्य /विचार अरस्तू ही नही कांट स्पिनोजा आदि तमाम दार्शनिकों के थे ,,लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है की इन तमाम दार्शनिकों / दार्शनिक विचारों का उद्भव पन्द्रहवी शताब्दी के बाद ही कैथोलिक धर्माचार्य पॉप के पाखंडों के विरुद्ध हुआ तो इसमें सत्य का इन लोगों ने कितना अन्वेषण किया और विरोधी विचारों को कितना व्यक्त किया यह विचार करने वाली बात है और यह तमाम बुद्धिजीवी पलायन करके इटली में एकत्रित होकर अपने विचारों को व्यक्त कर सके (है न आश्चर्य वाली बात स्वछन्द दर्शन का पलायनी विश्लेषण :) ) तो यह तो क्रिया की प्रतिक्रया हुई न की स्त्युदबोधन यहाँ बुद्धिजीवी के शांत क्रोध का ही प्रस्फुटन हुआ और उस समय भी कोइ नवीन बात नही हुई ध्यान दें श्रीमद भागवत गीता के कुछ बिंदु (यो माँ पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति ,तस्याहं न प्रणस्यामि सच में न प्रणश्यति ,,मत्त परतरः नान्यतिक चिदसति धनन्जय , मयि सर्व मिदं प्रोक्तं सूत्रे मणि गणा इव,, सुवर्णाज्जाय मानस्य सुवर्णत्वं हि निश्चितं ,ब्राह्मणों जायमानस्य ब्रह्मणतव्म च विनिश्चितम ,, इसी तरह के तमाम विचार ईश्वरवादी दृष्टीकोणों के थे तो मुझे तो इसमें कुछ नवीन स्त्योद्घाटन नजर नही आता ,,और जहां तक रही बात पशुवत आचरण की तो आप पशुओं के प्रति पाश्चात्य दृष्टिकोण और भारतीय सोच को देखिए चलिए आम जन की प्रिय रामायण को ही देखिए और इसके आलोक में पशुवों की व्याख्या करिये कहीं भी पशु निंदनीय नही है ,,मानव तो दो ही श्रेणियों में है एक असुर और दूसरा मनुष्य जिसके देवत्व /श्रेष्ठत्व की तरफ अग्रषर होने की भारतीय दर्शन में कामना की गयी है /विचारों के व्यक्त किया गया है /अपनाने के लिए आग्रह किया गया है परन्तु हठ नही :) हाँ तो पन्द्रहवी शताब्दी में भारतीय संस्कृति भी संक्रमण के दौर से गुजर चुकी थी और गुजर भी रही थी तो इसके दर्शन में भी छेड़ छाड़ का प्रयाश किया गया परन्तु आप शरीर को विकृत कर सकते हैं आत्मा को नही और यही आत्मा का अछूतापन अनेक वैदेशिक संस्कृतियों का पोषक भी बना जो की आक्रान्ताओं से अनजाने में हुई भूल जो की उनके लिए वरदान साबित हुई लेकिन यहीं से भारतीय संस्कृति भी दूषित होने लगी ,, और जहां तक बात आचरण की तो विषय विशेष में सुप्त क्रोध का असुरवृत्ति में प्रकट होना कोइ नवीन बात (भारत के सन्दर्भ में ) नही धरती माता भी जिसकी उष्णता सदा जीवन का संचार करती है अति होने पर अपने अंतर से ज्वालामुखी उत्त्पन्न करके सब कुछ भस्मीभूत कर देती है (परन्तु वैदेशिक जीवन पद्धति का अलग ही दृष्टिकोण है ) वहां जीवन पद्धति के हर एक बिन्दुवों पर विचार करिये हर जगह हिसा की झलक मिलेगी ( आसुरी वृति और मानव में तो सदैव बैर ही रहा है जो की स्न्क्रमनीय संस्कृति के कारण और भी अधिक बदता ही जा रहा है (उक्त आचरण निंदनीय तो है ही परन्तु कहीं कहीं शठे शाठ्यम समाचरेत की भी आवश्यकता होती है जिसका की भारतीय संस्कृति ने कम ही अनुकरण किया है :) )………………………जय भारत

    abodhbaalak के द्वारा
    November 3, 2011

    अश्विन भाई आपके इस बहुत ही ज्ञानवर्धक कमेन्ट के लिए आभारी हूँ, आपके बताये हुए कई बिन्दुओं से मई अनभिग्य था, और इसी लिए अपने कम ज्ञान पर मई अपने आपको ……….. मैंने पहले भी कहाँ की मै कम जानकारी रखता हूँ और इतिहास और धर्म में तो और भी, शायद ये नयी पश्चिमी सभ्यता और शिक्षा का ………….. बहर हाल आपका आभार की आपने न केवल इस पोस्ट को पढ़ा बल्कि अपने बहुमूल्य विचार से भी ………. आगे भी आपसे सदा इसी तरह के मार्गदर्शन का अनुरोध है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Abdul Rashid के द्वारा
November 2, 2011

प्रिय अबोध जी सच तो सच होता है चाहे करेला का स्वाद हो या मिस्ठी दही का आपने जो लिखा वह २४कैरेट का सोना है. लेकिन यदि मानव रुपी जानवर भारतीय सभ्यता व संस्कृति के दाएरे में रह कर जीवन यापन करे तो वह अपने को जानवर से अलग पहचान बनाने में कामयाब हो सकता है. बहुत जल्द मै अपनी यात्रा पूर्ण कर घर लौटूंगा तब आप लोग के रु बा रु होकर हाले यात्रा बयां करूंगा सप्रेम अब्दुल रशीद

    abodhbaalak के द्वारा
    November 3, 2011

    अब्दुल राशिद भाई पहले तो आको बकरीद की मुबारकबाद, फिर आपको आपकी यात्र के लिए शुभकामनाएं बड़े मज़ेदार शब्द में आपने अपने कमेन्ट को ……………..” करेले के स्वाग और ………” :) इश्वर से प्रार्थना है की आप जल्द वापस आएं और मच पर अपने ……. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

vinitashukla के द्वारा
November 2, 2011

काश कि इंसान अपने वहशीपन से उबार पाता! अच्छी पोस्ट के लिए बधाई.

mparveen के द्वारा
November 2, 2011

अबोध जी नमस्कार, भगवान ने सबसे सुंदर रचना मनुष्य के रूप में की …. उसको जानने , समझने , सोचने , महसूस करने की शक्ति दी … जानवरों में भी समझने की शक्ति है पर वो बोल नहीं सकते .. और इंसान के पास सब शक्तियां हैं . भगवान् ने उसको सम्पूरण शक्ति दी है पर वो स्वार्थी बन गया है उसका दिमाग ही उसकी बुरे बन गया है . दिमाग दिया था की अछे बुरे में भेद कर सके . पर अब इंसान अछे – बुरे में नहीं अपनी सुख सुविधाओं की तरफ झुकने लगा है जिसके कारन वो सब कर बेठता है जिससे दुसरो को नुक्सान होता है …

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    parveen ji insaan shabd hi arbic word nasiyaan se bana hai ( mere ek arab dost ke saujanya se) jiska matlab hota hai bhoolna, aapne wo bhi wahi kaha ki insaan wo sab bhool baitha jiski usse aasha tha, aur ab to wo jaanvaro ko bhi sharminda kar raha hai abhaar aapke ek bahut sundar kament ke liye http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

priyasingh के द्वारा
November 2, 2011

………..क्योंकि आप और हम संवेदनशील है इसलिए टी वी पर ऐसी मौत देख कर दिल दहल जाता है …….पर कुछ लोग ऐसी मौत के ही काबिल होते है ताकि दुसरो को सबक मिले की आप को एक दिन अपने पापो का फल मिलता है चाहे जितनी देर लगे ……………

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    डीयर सिस्टर, काश ऐसा हमारे देश के नेताओं के साथ भी होता……………, न जाने कितने ऐसे नेता है जिन्होंने हत्या , लूट , रैप और न जाने किनते…………………., पर अभी भी वो मज़े से घूम रहे हैं. शायद मै सच में ज्यादा संवेदनशील ………… आभार आपका की आपने अपने विचार से …….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

आर.एन. शाही के द्वारा
November 2, 2011

आपका कथन अपने आशय के हिसाब से बिल्कुल सटीक है अबोध जी । भीड़तंत्र में आदमी कभी-कभी जानवर से भी अधिक मूढ़ बना दिखाई देता है । परन्तु गद्दाफ़ी वाले मामले में आपका आकलन सटीक नहीं है । वह भीड़ नहीं थी, विक्षुब्धों का वह समूह था, जिसने तिल-तिल कर उस मनहूस तानाशाह के हाथों एक आम नागरिक का सामान्य अधिकार तक छीन-छीन कर, तड़पा-तड़पा कर दशकों तक अपनी ऐयाशी के लिये शाही खज़ाना भरते देखा था । किसी दिन अपने देश के काले अंग्रेज़ जब इसी तरह जनता के हाथों पिटते रहम की भीख मांग रहे होंगे, खुद आपका दिल भी ज़रा भी नहीं पसीजेगा, बल्कि आपका जूता खुद बखुद पैर से निकल कर आपके हाथों में होगा, और आप उस समूह का हिस्सा बनकर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे होंगे । आभार !

    malkeet singh jeet के द्वारा
    November 2, 2011

    आदरनीय ,अबोध जी व् शाही जी प्रणाम ,शाही जी सही है पापी को अपने पापों की सजा यही मिलनी चाहिए तां की बाकी लोगो को (जो ऐसे कु कृत्य करते हैं ) होश आ सके

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    आदरणीय शाही जी , इन्टरनेट पर एक मेल काफी circulate हो रही है, जिसका सोर्स मुझे कन्फर्म नहीं हो पा रहा है, उसके अनुसार ये तथ्य गद्दाफी और लीबिया के baare में मिलते है: Lesser known facts about Libya and Gaddafi : 1. There is no electricity bill in… Libya; electricity is free for all its citizens. 2. There is no interest on loans, banks in Libya are state-owned and loans given to all its citizens at 0% interest by law. 3. Home considered a human right in Libya – Gaddafi vowed that his parents would not get a house until everyone in Libya had a home. Gaddafi’s father has died while him, his wife and his mother are still living in a tent. 4. All newlyweds in Libya receive $60,000 Dinar (US$ 50,000 ) by the government to buy their first apartment so to help start up the family. 5. Education and medical treatments are free in Libya. Before Gaddafi only 25% of Libyans are literate. Today the figure is 83%. 6. Should Libyans want to take up farming career, they would receive farming land, a farming house, equipments, seeds and Livestock to kick- start their farms – all for free. 7. If Libyans cannot find the education or medical facilities they need in Libya, the government funds them to go abroad for it – onnot only free but they get US $2, 300/month accommodation and car allowance. 8. In Libyan, if a Libyan buys a car, the government subsidized 50% of the price. 9. The price of petrol in Libya is $0. 14 per liter. 10. Libya has no external debt and its reserves amount to $150 billion – now frozen globally. 11. If a Libyan is unable to get employment after graduation the state would pay the average salary of the profession as if he or she is employed until employment is found. 12. A portion of Libyan oil sale is, credited directly to the bank accounts of all Libyan citizens. 13. A mother who gave birth to a child receive US $5 ,000 14. 40 loaves of bread in Libya costs $ 0.15 15. 25% of Libyans have a university degree 16. Gaddafi carried out the world’s largest irrigation project, known as the Great Man-Made River project, to make water readily available throughout the desert country. अगर ये तथ्य सच है तो हमें इसे क्या समझे, क्या केवल अमेरिया और वेस्टर्न देश के पैसे और सामर्थ्य के बल पर उसे हटाया गया है, ऐसे किसी भी देश के साथ हो सकता है. बहरहाल, मेरा भी भी गद्दाफी से कोई lagaav नहीं है, बात केवल मनुष्य की पाशविकता के बारे में हो रही है, आपके विचार सदा ही मेरे लिए बहुमूल्य होते हैं, और आप हैं कहाँ? काफी समय से आपकी कोई पोस्ट ………. आशा है की शीघ्र ही आप हमें……. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    मलकीत भाई, मैंने इस विषय पर जो कहना था वो शाही जी के कमेन्ट के उत्तर में दे दिया है, आपका आभार की आपने इस पोस्ट को पढ़ा और इसपर अपने विचार रखे आभार http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    bharodiya के द्वारा
    November 2, 2011

    आप के लिस्ट्वाली बातें सही है । लिबिया की प्रजा दुनिया में सब से भोली प्रजा है । शरिफ ईतनी है की वहां का क्राईम रेट झिरो है । लडाई के दौरान एक भी दुकान लूटने की घटना नही बनी है । वहा की मुस्लिम औरतें भारत की औरतों की तरह पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करती है । मुस्लिम कानून नही है । गद्दाफी के बाद अब सोचा जा रहा है की शरियत का कानून लगाया जाये । आम जनता को गद्दाफी से कोइ फरियाद नही थी । लेकिन जैसे हमारे यहां जातिवाद है वैसे वहां कबिलावाद है । गद्दाफीने अपने कबिले के लोगों को उच्च स्थान पर लगा दिया और खूद भी ऐयाशियां करने लगा । विरोधी कबिलेवाले ये सब सहन नही कर सके । जनता को भडकाने लगे, भोली जनता जल्दी भडक जाती है । बाकी बात सब के सामने है ।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    November 2, 2011

    अबोध जी, आप द्वारा उल्लेखित तथ्य यदि आधिकारिक और सत्य हैं, तो मुझे खेद है कि मैं बदनाम गद्दाफ़ी के बारे में शायद आजतक मुग़ालते में रहा हूं । आश्चर्य है कि रामराज्य के सिद्धान्तों से टक्कर लेते गद्दाफ़ी के लोकप्रिय साम्राज्य की चर्चा विश्व में आम क्यों नहीं रह पाई, जबकि पश्चिमी देशों के आकर्षक लगने वाले मामूली से नागरिक अधिकार व सुविधाएं न सिर्फ़ सारा संसार जानता है, बल्कि उन्हीं आकर्षणों की गिरफ़्त में पड़कर दुनिया से श्रम और मेधा का पलायन भी पाश्चात्य देशों की ओर ही होता रहा है । मैं दिग्भ्रमित हो गया हूं, अब पूरी जानकारियों के साथ ही इस विषय पर कोई चर्चा करूंगा । वैसे मेरी प्रतिक्रिया के विचारों को आप गद्दाफ़ी को रिप्लेस कर किसी अन्य आततायी व शोषक तानाशाह शासक के साथ जोड़ कर भी देख सकते हैं । धन्यवाद !

    Santosh Kumar के द्वारा
    November 2, 2011

    आदरणीय अबोध जी ,.सादर नमस्कार आदरणीय शाही जी ,.सादर प्रणाम .. ये आंकड़े यदि सच हैं तो मैं भी अभी तक मुगालते में ही था ,..लेकिन यह भी देखना होगा इन अच्छे कामों से पाप कम नहीं हो सकते ,..वो एक तानाशाह था ,..जिसने ना सिर्फ अपनी मनमर्जी की बल्कि महिलाओं का बलात शोषण सहित विरोधिओं की प्रताड़ना और दमन आदि सब कुछ किया ,…कबीलाई संस्कृति में उसके साथ जो हुआ वो मुझे कहीं से भी असामान्य नहीं लगा ,.. . रावण की प्रजा को क्या कष्ट था ?….लेकिन ताकत का अहंकार और इसके फलस्वरूप हुए अनेकों पापो ने उसका समूल नाश कर दिया ,… लीबिया की आम जनता पढ़ी लिखी है ,..संयम के साथ एक मजबूत लोकतंत्र विकसित हो यही अच्छा रहेगा ,……जो गया सो गया … बाकी इंसान तो जानवर ही है ,..जब उसे अपने या अपनों के अस्तित्व पर खतरा लगता है तो बिना वजह शैतान भी बन जाता है ,….राजनेताओं ने जनभावना का सदैव दोहन ही किया है ,…

    bharodiya के द्वारा
    November 2, 2011

    अबोधभाई , शाही जी, सन्तोष्भाई हम सब नेगेटिव साईड ही जानते है । और हर तानाशाह की नेगेटिव साईड होती है । तानाशाह जबतक अच्छा होता है जनता सुखी होती है । जनता को और क्या चाहिये । ये परिस्थिती लोकशाही से भी अच्छी होती है । तनाशाह जनता को परेशान नही करता विरोधियों को मार देता है । यहां तक तो बच जाता लेकिन वो खूद ऐयाश बन जाता है, पैसे हजम करने लगता है तब मुश्किल मे पड जाता है । यही हुआ दग्गाफी के साथ । मैं यहां एक आएटिकल पेस्ट कर रहा हुं , जो उस की पोजिटिव साईड दिखाती है। लिबिया में लडाई के समय भारत की एक प्रोफेसर बहन थी वहां पर उसने लिखा है । मेरे पास लिन्क नही था आर्टिकल था । ————————————————————— पूरे लीबिया में फैले असंतोष और धमाकों के बीच कहीं कोई लूटपाट या अभद्रता नहीं हुई, आम लोगों के भरोसे पूरी तरह महफूज थे भारतीय। लीबिया से हाल ही में लौटी डॉ. अंजना तिवारी ने बताएं वहां के हालात। भोपाल। फरवरी 2011 में इजिप्ट में फैली बदलाव की आग से लीबिया में भी विद्रोह लपटें भड़क गईं। शुरु में जब मैंने अशांति की बातें सुनी तो इन्हें कोरी अफवाह समझा क्योंकि अब तक लीबिया में रहते-रहते मुझे 3 साल से अधिक हो चुके थे और मैंने वहां के लोगों को बेहद सुकून में रहते देखा था। फरवरी के आखिर तक मैंने बेंगाजी की सड़कों पर हजारों लोगों को हाथों में हथियार लिए विरोध के नारे बुलंद करते हुए देखा तो खुद को यह यकीन दिलाना पड़ा कि अब हालात पहले जैसे नहीं रहे। मार्च की शुरुआत तक तो भूमध्य सागर के किनारे बसा यह खूबसूरत देश पूरी तरह सुलग उठा। बदलाव की चिंगारी को दबाने के कर्नल गद्दाफी के प्रयासों ने इसे और ज्यादा भड़का दिया था और जब मैं वापस भारत लौट रही थी। मेरे मन में बस एक ही सवाल उठ रहा था इस बेहद खूबसूरत देश ऐसा कहर क्यों बरपा है। इस देश में जहां न खाने की दिक्कत है न रहने की कोई समस्या। जहां के लोग शायद दुनिया के सबसे भोले लोगों में से एक हैं। जहां आप रात में भी हजारों दीनार लेकर अकेले घर आ सकते हैं। जहां के लोग अपने मेहमान को बड़ा ऊंचा दर्जा देते हैं, आखिर उस देश में ऐसा क्यों हो रहा है? आप के लिए जान पर खेल जाएंगे हम … फरवरी के अंतिम सप्ताह में हमने लीबिया छोड़ने की तैयारी शुरु की। स्थानीय परिचित लोगों ने हमे रोकने का हरसंभव प्रयास किया। वो बार-बार यही कहते रहे कि आप लोगों को कोई खतरा नहीं होगा। हम अपने भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन अपनी जान पर खेलकर भी आपकी हिफाजत करेंगे। वो बार-बार कहते कि आपकी सरकार वापस बुला रही है तो चले जाइये लेकिन हम चाहते हैं कि आप लोग यहीं रहे। 28 फरवरी की शाम को जब हम लीबिया छोड़ रहे थे तो वहां के लोगों की आंखे नम थी। मेरे साथी स्थानीय प्रोफेसरों और शिक्षकों ने लीबिया में जो हुआ उसके लिए माफी मांगी और यह विश्वास जताया कि जल्द ही सबकुछ सामान्य हो जाएगा। लेकिन बेहद बेमन से अपने दोनों बच्चों के साथ उसी शाम मैं जितना हो सकता था सामान लेकर जहाज पर चढ़ी। जहाज पर हम सभी के पास अपनी कमाई थी, कीमती चीजों थीं लेकिन लूटमार तो दूर, किसी ने पूछा भी नहीं कि आप क्या ले जा रहे हैं। भारत सरकार ने वापसी के लिए अच्छा इंतजाम किया था। हम एक मार्च की सुबह बेंगाजी से इजिप्ट के एलेक्जेंड्रिया के लिए चले। ढाई दिन बाद एलेक्जेंड्रिया पहुंचे। चार मार्च को एयरइंडिया की फ्लाइट की हमें दिल्ली ले आई। मैं वापस हिंदुस्तान पहुंच चुकी थी। मैं उस खूबसूरत देश को जलता छोड़ आई थी जहां मेरे ढेर सारे छात्र भविष्य में चमकने की तैयारी कर रहे थे। लौटते वक्त मुझे उनकी चिंता थी। वहां के भोले-भाले लोगों की चिंता थी। जो शायद दुनियादारी के लिए जरूरी उतना कपट नहीं जानते। आज जब हिंदुस्तान में मैं लीबिया पर पश्चिमी सेनाओं के हमले के बारे में पढ़ती हूं तो बस यही ख्याल आता है कि वहां के लोग मानवाधिकारों के नाम पर किए जा रहे इन हमलों की अंतर्कथा को उसी शिद्दत से समझ पा रहे होंगे। बस यही दुआ है कि यह खूबसूरत देश बर्बाद न हो। लोगों में वही जिंदादिली बरकरार रहे। धमाके होते रहे पर कभी नहीं लगा डर… मैं बेंगाजी के पॉश इलाके में पांचवी मंजिल पर किराए के मकान में रहती थी। मैंने और मेरे दोनों बच्चों ने बेंगाजी की सड़कों पर गुजरते गद्दाफी की सेनाओं के टैंकों को अपनी बालकनी से देखा। हम पूरे दिन विरोध प्रदर्शन देखते रहे। हमने देखा कि गद्दाफी के सैनिक विद्रोहियों को प्यार से मनाने का प्रयास कर रहे थे। शुरू में उन्होंने समझाने की कोशिशें की लेकिन बाद में वो हिंसक हो गए। हमने गोलियों की गूंज सुनी। फिर धमाकों की आवाजें सुनी लेकिन कभी डर नहीं लगा। क्योंकि मेरी मकान मालकिन हमेशा यह विश्वास दिलाती थी कि वो अपनी जान की बाजी लगाकर भी हमें कुछ नहीं होने देंगी। संघर्ष के दिनों में स्थानीय लोग हमेशा मदद को तैयार थे। जब हवाई हमले हो रहे थे तब मुझसे बार-बार कहा जा रहा था कि मैं बच्चों के साथ नीचे वाले फ्लैट में शिफ्ट हो जाऊं। यह उनका भरोसा ही था कि गोलियों और धमाके के बीच भी मैं हम खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे थे। सिर्फ बदलाव के लिए विद्रोह… लीबिया में रहते हुए मैंने कभी भी गद्दाफी के विरोध में कुछ नहीं सुना। इसके दो बड़े कारण हैं एक तो यह कि गद्दाफी बेहद शक्तिशाली हैं और उन्होंने कभी अपने खिलाफ किसी आवाज को उठने ही नहीं दिया और दूसरी यह कि वहां के लोगों की कोई भी ऐसी आवश्यकता नहीं है जिसे सरकार पूरा न करती हो। घर, खाना, पढ़ाई, स्वास्थ्य सेवाओं के साथ ही सरकार देश की आय का एक निश्चित हिस्सा लोगों में बांटती हैं। यहां के लोगों को किसी भी चीज की कमी नहीं थी। लेकिन जब विद्रोह हुआ तो उसके समर्थन में आवाजें उठने लगीं। लीबिया के लोगों ने कभी भी लोकतांत्रिक आजादी को महसूस नहीं किया था। वो खुलकर बोल नहीं सकते थे। गद्दाफी जो फैसला लेते वो सबको स्वीकार करना होता। मैंने बेंगाजी की दीवारों पर बदलाव के नारे लिखे देखे। विद्रोह और उसका समर्थन कर रहे लोगों ने विद्रोह की सिर्फ एक ही बड़ी वजह बताई और वो यह थी कि लोग अब बदलाव चाहते थे। वो सरकारी फैसलों में खुद को शामिल करना चाहते थे। वो गद्दाफी के फैसलों को मानने के बजाए अपनी बात भी रखना चाहते थे। वो अपने हुक्मरानों को चुनने का अधिकार चाहते थे। बदलाव की चाहत ही वहां के लोगों के विद्रोह की बड़ी वजह थी। जो लोग पहले खामोश थे उन्होंने भी विद्रोह की आवाज में सुर मिला लिया था। मेरी मकान मालिक की बेटी जिसे मैंने कभी भी गद्दाफी के खिलाफ बोलते नहीं सुना था वो भी अब विद्रोहियों के समर्थन में बातें कर रही थी। मॉडर्न मुस्लिम राष्ट्र है लीबिया… लगभग तीन बरस पहले जब मैं यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के लिए लीबिया जा रही थी तो मेरे मन में यही डर था कि यह एक रूढ़िवादी मुस्लिम देश होगा, जहां महिलाओं को घरों में कैद रखा जाता होगा। लेकिन जब में वहां पहुंची तो स्थिति को बिल्कुल ही अलग पाया। लीबिया में महिलाएं पुरुषों से समान आजाद हैं। बैंकों, अस्पतालों, क़ॉलेजों में काम करने वाले कर्मचारियों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से कहीं ज्यादा हैं। शायद ही कोई काम ऐसा होगा जिसमें महिलाएं सेवाएं न देती हों। बस इतना सा फर्क है कि वो जहां भी होती हैं पर्दे का ख्याल रखती हैं। वो बुर्के में बंद नहीं रहती, सिर पर स्कार्फ बांधती हैं। किसी भी अन्य मुस्लिम राष्ट्र की तरह यहां भी महिलाएं पुरुषों से दूरी बनाए रखती हैं। लेकिन वो घर में कैद नहीं रहती। वो देश को चलाने में बराबरी से योगदान देती हैं। कबीलों में बंटा हैं लीबिया… लीबिया का समाज कई कबीलों में बंटा है जिसमें सबसे ताकतवर कबीला गद्दाफी का है। 1969 में लीबिया के शासन पर कब्जे के बाद से ही गद्दाफी ने तमाम महत्वपूर्ण पदों पर अपने कबीलें के लोगों की भर्ती की। गद्दाफी का कबीला ताकतवर होता गया। गद्दाफी के कबीले की बढ़ती ताकत बाकी कबीलों में असंतोष पैदा करने लगी लेकिन गद्दाफी ने देश को इस तरह से शासित किया कि किसी ने भी उनके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश नहीं की। यहां तक कि गद्दाफी ने देश की सेना को भी कमजोर ही रखा और सुरक्षा की कमान अपने कबीले के लोगों के हाथ में दी। विद्रोह का मुख्य कारण अन्य कबीलों के लोगों में व्याप्त असंतोष ही है। बेहद खूबसूरत देश है लीबिया… आमतौर पर लीबिया को रेगिस्तान समझा जाता है। लीबिया का एक बड़ा इलाका रेगिस्तान ही है लेकिन ज्यादातर आबादी शहरों में रहती है। बेंगाजी और त्रिपोली में ही लगभग आधी आबादी रहती है। यहां का मौसम बेहद खुशनुमा है। सर्दियां जनवरी के दूसरे पखवाड़े में शुरु होती हैं और फरवरी का अंत आते-आते चली जाती हैं। गर्मी कभी भी इतनी नहीं पड़ती की पंखा चलाना पड़े। साल के 12 महिने रातों में हल्की सर्दी पड़ती है और आप बिना चादर ओढ़े नहीं सो सकते। लीबिया के शहरों को नए तरीके से बसाया गया है। सबकुछ बेहद व्यवस्थित है। लीबिया में आपको ऐसा नहीं लगता कि आप अफ्रीका में हैं। बिलकुल नहीं होते हैं अपराध… लीबिया के लोगों में एक चीज है जो समान रूप से पाई जाती हैं और वो हैं उनका भोलापन। आप कहीं भी जाइये आपको बेहद सच्चे, सीधे और सरल लोग मिलेंगे। वो कोई दिखावा नहीं करते हैं। पड़ोसी भी पड़ोसियों की बुराई नहीं करते। अपराध की दर वहां जीरो फीसदी से भी कम है। दो सालों में मैंने लूटमार की कोई वारदात नहीं सुनी। मैं अमेरिका, ब्रिटेन, मिस्त्र, जार्डन और दुनिया के अन्य कई मुल्कों में गई हूं लेकिन लीबिया जैसे सरल और भोले लोग मैंने कहीं नहीं देखे। भारतीयों का करते हैं बेहद सम्मान… लीबिया में भारत के लोगों को सम्मान की नजर से देखा जाता है। वहां अन्य मुल्कों के भी लोग हैं लेकिन जितना सम्मान भारत के डॉक्टरों और प्रोफेसरों को मिलता हैं उतना शायद कहीं के लोगों को भी नहीं मिलता। जैसे ही आप वहां के लोगों को बताते हैं कि आप भारत से हैं उनका व्यवहार बेहद सम्माननीय हो जाता है। वो मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। इंग्लिश कम ही लोग बोलते हैं लेकिन जो आपको समझते हैं वो हर संभव तरीके से आपकी मदद करते हैं। (डा. अंजना तिवारी, सर गैरयूनिस यूनिवर्सिटी बेंगाजी (लीबिया) में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

    आर.एन. शाही के द्वारा
    November 2, 2011

    आर्टिकिल के माध्यम से मूल्यवान जानकारियां उपलब्ध कराने के लिये साधुवाद भाड़ोदिया जी ।

    abodhbaalak के द्वारा
    November 3, 2011

    आदरणीय शाही जी, संतोष जी, और भरोडिया जी आप सब का आभार, की आपने सबने इस विषय पर अपने अपने विचार को ………… मैंने पहले ही कहा की लेख का टोपिक गद्दाफी नहीं है बल्कि हमारा आचरण है जो की समय समय पर हम ……….. गद्दाफी achchha था या बुरा मुझे उस से कोई फर्क नहीं पड़ता, पर अगर ये तथ्य सच हैं तो यही कहा जा सकता है के “क्योंकि वेस्टर्न देश नहीं चाहते थे की वो शासन करे इस लिए ……” रही बात ये की वो बुरा था और उसने घोर पाप किये, मह्लियाओं पर अत्याचार किये…. और न जाने क्या क्या, ” तो मेरे भाई, जरा हामारे देश में भी देख लो, छोटे छोटे नेता के ऊपर कितने केसेस होते हैं, जिसे चाह उठा लिया, जिसे चाह ………………, क्या उनके साथ भी हमारे देश में भी ऐसा होना चाहिए…………… लोगो का पैसा खा खा कर नेता अरबपति हो रहे हिं………………. मत्रियुओं के साथ पुश्ते न भी कामये तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता, के या हमारे ऊपर ज़ुल्म नहीं है? क्या इसके लिए हम भी उन्हें दौड़ा दौड़ा कर ……………. आप सब के इस डिस्कशन से मुझे भी बहुत सारी बातें ऐसें पता चली जो की मई नहीं जानता था ………….. आभार आप सबका, http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    jlsingh के द्वारा
    November 6, 2011

    अबोध जी, शाही साहब, और भरोदिया जी, आपसबका हार्दिक अभिनन्दन जो इतनी सारी जानकारी को सबलोगों के सामने रक्खा. इसका श्री तो अबोध जी को ही जाता है. भरोदिया जी के माध्यम से डॉ. अंजना तिवारी का लेख अति सुन्दर लगा. आप सभी लेखकों बुद्धिजीवियों का आभार. – जवाहर.

rajeevdubey के द्वारा
November 1, 2011

अन्दर के पशु से जीतना ही तो मानव बनने की प्रक्रिया है… बाकी तो सब कुछ लगभग एक जैसा ही है …

    abodhbaalak के द्वारा
    November 3, 2011

    राजीव जी सच कहा आपने पर मुझे लगता है की उस पशु को कभी भी समाप्त नहीं किया जा सकता……….. वो केवल कुछ समय के लिए ……… आभार …… http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Amita Srivastava के द्वारा
November 1, 2011

अबोध जी अच्छा आलेख न बसंत बयार चले न कही खिले सुमन पतझड़ सी जिन्दगी मे ठूठ बन गया है आदमी धन्यवाद

    abodhbaalak के द्वारा
    November 3, 2011

    अमिता जी प्रोत्साहन के लिए आपका आभारी हूँ आपने किस संध्र्ब में ये पंक्तियाँ लिखी ठीक से समझ नहीं पाया, ठूंट तो फिर भी काम आजाटी है और किसी को …………., पर आदमी ………… http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Paarth Dixit के द्वारा
November 1, 2011

आदरणीय अबोध जी, नमस्कार..बिलकुल सही बात कही है आपने ..मै आपकी बात से पूरी तरह से सहमत हूँ..इंसान जानवर से भी ज्यादा गिर चुका है ..मैंने बीते दिनों इन्टरनेट पर एक तस्वीर देखी मै दंग रह गया एक कुत्ता अपने साथी कुत्ते की लाश को जो सड़क पर पड़ी हुई थी उसे घसीट कर किनारे लाकर उसे चाटने लगा उसे जीवित करने की कोशिश करने लगा..और वही मनुष्य जो सिर्फ नाम का ही…, एक बच्ची सड़क किनारे दर्द से तड़प रही थी वही से ”नाम के मनुष्य ” उसे नज़रंदाज़ करते हुए निकलते गए और बाद में उस बच्ची के ऊपर से ट्रक निकल गया और उसकी मौत हो गयी..बड़ा दुःख होता है जब कभी ऐसे दृश्य सामने आजाते है…सही कहा आपने “हम सब केवल नाम के ही …………………. पर हम सब हैं अन्दर से जानवर , वहशी जानवर .”… ..साधुवाद..

    abodhbaalak के द्वारा
    November 3, 2011

    पार्थ जी सही कहा है आपने, मुझे तो लगता है की मैंने इन मासूम जानवरों की बे इज्ज़ती कर दी है उनको मनुष्य के साथ ………….. हमारे अन्दर का जानवर कुछ इस तरह से हम पर हावी ………….. आपके प्रोत्साहन और विचार के लिए आपका आभारी हूँ http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

ziawaris के द्वारा
November 1, 2011

इन्सान जब अपने अन्दर जकना बंद कर देता है तब वो एक जानवर बन जाता है वह्रल आप अच्छा लिखते है अबोध भाई

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    शुक्रिया जिया साहब, बस लिखने का प्रयास करता रहता हूँ, अच्छा तो शायद …………. इंसान को धर्म में इश्वर की सबसे अच्छी रचना कहा गया है पर इंसान अब ……….. आगे भी आपसे अपने विचारो से अवगत कराने का अनुरोध है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

rajkamal के द्वारा
November 1, 2011

प्रिय abodh bhaai …..सादर प्रणाम ! भाई साहिब ! अब ज्यादा क्या कहूँ ? एक जानवर दूसरे की तारीफ करता हुआ वैसे भी अच्छा नहीं लगता है …..और अगर फिर भी कर दी तो आप हमेशा की ही तरह से कहोगे की मैं इस के काबिल नहीं हूँ ….. हा हा हा हा हा आपका मुबार्कबाद सहित आभार न्ये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की बधाई :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    आर.एन. शाही के द्वारा
    November 2, 2011

    लेकिन मुझे तो अच्छे लगे … (ये स्माइलीज) ।

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    प्रिय कहूँ या आदरणीय कहूँ, (ज्ञानी को, विद्वान को आदरणीय कहना गलत नहीं है ) राज कमल जी मै गलत तो कहता नहीं की मै कहाँ इस काबिल हूँ, कभी जब आप जैसे लेखक की श्रेर्णी में भी मेरा नाम डालता है तो मुझे हंसी आने लगती है, मंच पर ऐसे ऐसे एक्सपर्ट लेखक हैं की मुझे अपने स्तरीय होने का एहसास अक्सर ही होता रहता है, खैर, आपके कमेन्ट का तो मै पोस्ट करने के पहले से ही वेट करता रहता हूँ :) अछ्छा किया की आपने जल्दी से कमेन्ट कर दिय वरना मै ……… http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

akraktale के द्वारा
November 1, 2011

अबोध जी सादर नमस्कार, आपको नहीं लगता की आप आदमी को जानवर कह कर उस जानवर की बेइज्जती कर रहे हैं. जो अपने सारे काम निश्चित दिनचर्या के अनुसार ही करता है. प्रातः सूर्योदय के साथ ही जागना, भूख लगने पर ही शिकार करना, अपनी जान का ख़तरा होने पर ही विरोध करना, सभी छोटे बड़े, जाति परजाति के जानवरों के साथ रहना, बच्चों को पूरा समय देना समाज के कायदे क़ानून समझाना. क्या ये सब हम इंसानों में देख पा रहे हैं? इंसान एक अलग प्रकार का जीव है उसका इन उपरोक्त बातों से कोई सम्बन्ध नहीं है.मानव एक पर्दाधारी जीव है.क्योकि उसने हर जगह परदा डालना सीख लिया है. पहले तन पर,फिर मन पर और अब आँखों पर.ये इश्वर की नायाब और अंतिम कृति है, इसीलिए भगवान् ने अन्य जीव बनाने के बाद जो कुछ बचा सब इसमें डाल दिया, जो इसके पहले बनाए किसी जीव में डालने की हिम्मत खुद भगवान् भी ना कर सका. फिरभी आपने बहुत अच्छा लिखा है क्योंकि ये मानव भी कभी कभी जानवरों के दुर्गुण का प्रदर्शन भी करता है.साधुवाद.

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    भाई आपने तो इस तरह से अपनी बात रखी है और इंसान की असली जात को सबके सामने रखा है की क्या कहूँ,……… जो बातें मई अपने लेख में नहीं कह पाया वो आपने केवल छोटे से कमेन्ट में कर दी है धन्यवाद आपका, आपके इतने सुन्दर कमेन्ट के लिए और इस पोस्ट पर अपने विचार ………. आभार http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

shashibhushan1959 के द्वारा
November 1, 2011

भगवन ने तो सबको था “जीव” ही बनाया, लेकिन विभिन्न नामों से हमने ही बुलाया. है फर्क जानवर में, इंसान में बस इतना, ट्रेनिंग ली सभ्यता की और सत्य को छुपाया.

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    क्या बात है शशि जी मई देख रहा था की आप अक्सर अपनी प्रतिक्रिया कविता के रूप में ही देते हैं, और अपनी बात को बड़ी ही सुन्दरता के साथ रखते हैं. आपके अन्दर एक बहुत ही कुशल कवी …………., आपका आभार की आपने इस रचना को न केवल पढ़ा बल्कि उसपर अपने विचार भी रखे, आप से आगे भी अपने विचारों से अवगत कराते रहने का अनुरोध अहि http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    shashibhushan1959 के द्वारा
    November 2, 2011

    लिखने में जो आलसी होते हैं उनमे में प्रायः यह लक्षण पाए जाते हैं. खेद सहित…… !

Lahar के द्वारा
November 1, 2011

प्रिय अबोध जी सप्रेम नमस्कार ऐसा नहीं है , आप सभी मनुष्यों को एक ही तराजू में तौल रहे है | समाज में दो तरह के इंसान होते है | कोई अच्छा कोई बुरा | समाज हमसे और आप से बनता है | अगर हम दोनों अच्छे बनाने की कोशिस करेंगे तो निश्चित रूप से समाज अच्छा बनेगा और इंसान ” इंसान ” ही बना रहेगा | http://lahar.jagranjunction.com/2011/10/23/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%85%E0%A4%AC%E0%A5%82%E0%A4%9D-%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A5%80/

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    लहर जी शायद मेरी सोच थोड़ी निराशावादी है, पर जब मै मनुष्य के कर्म देखता हूँ तो पाटा हूँ की इनसे तो जानवर ही ………….. आभार आपके समय निकाल कर इस पोस्ट को पढने और अपने विचार रखने के लिए http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

bharodiya के द्वारा
November 1, 2011

अबोधभाई नमस्कार क्या यार, पूंछ दिखानी पडेगी ? पूंछ होगी तब ही आदमी जानवर कहलयेगा ? मान लो आदमी जानवर ही है । कोशीश कर रहा है इन्सान बनने की ।

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    :) चलें, मान लेते हैं भाई की आदमी ……………………, और वो कोशिश कर रहा है की ……….. वैसे रीसर्च करने पड़ेगी की बिना पूंछ के …………………… :) आभार आपके ….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

sadhana thakur के द्वारा
November 1, 2011

अबोध भाई ,ये तो कटु सत्य है ,हर इन्सान के अन्दर एक दूसरा चेहरा तो छिपा होता ही है ,जो वक़्त के हिसाब से अपनी शक्ल बदलता है ,एक अच्चा आलेख ….

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    साधना जी, इस लेख के मर्म ही यही है की वास्तव में क्या हम इंसान हैं भी या असल में ………….. अपना चोला बदल लेते हैं पर हैं हम ……………. आभारी हूँ आपका…… क्रिपद्र्शिती बनाए रखें http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

vikasmehta के द्वारा
November 1, 2011

अबोध जी नमस्कार ……..अपने सही कहा हमरे अंदर के जानवर को निकलने का एक मोका चाहिए . ये कभी भी निकल सकता है किसी भी रूप में .सुंदर लेख कहते हैं की धर्म ही केवल वो मार्ग है जिसको अपना कर हम अपने आपको …………… पर हमारे अन्दर का छिपा हुआ जानवर तो इसका भी लाभ उठाकर …………………………., और इसी का माध्यम बना कर शिकार करता है ,……..भुत ही सुंदर

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    धन्यवाद विकास जी, आपने प्रोत्साहन और कमेंट्स दोनों के लिए, बस कभी कभी मन अपने अन्दर की ………………, एहसास होने लगता है की हम सच में क्या इन जानवरों से ………….. आभार http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Rajesh Dubey के द्वारा
November 1, 2011

मनुष्य तो जानवर ही है, पर सामाजिक. जब जानवर प्रवृति उफान पर होता है, तब मानव क्या-क्या करता है यह जग जाहिर है. आपने मनुष्य के औकात को बता दिया है. धन्यवाद्

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    राजेश जी आपके प्रोत्साहन और विचार दोनों के लिए आपका आभार. आगे भी अपने विचारो से अवगत कराते रहने का अनुरोध है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

nishamittal के द्वारा
November 1, 2011

मानव साधू और शैतान दोनों ही होता है.अबोध जी.

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    आदरणीय निशा जी, साधू में भी कहीं न कहीं शैतान नज़र आने लगता है ( आजकल इसके बुत सारे उदाहरण हैं, केवल न्यूज़ पपर उठा कर ……………) आपके कमेन्ट के लिए आभारी हूँ http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Syeds के द्वारा
November 1, 2011

अबोध जी, इंसान जब अपनी अच्छाइयों के चरम पर हो तो देवता तुल्य होता है…और जब गिर जाता है तो…राक्षस से भी गया गुज़रा होता है….सार्थक लेख के लिए बधाई… http://syeds.jagranjunction.com

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    सय्यद जी मेरा मानना है की इंसान कभी भी देवता तुली नहीं हो पाटा, वो केवल कुछ पल के लिए अपना रंग बदलता है और फिर अपने असली…………….. उसकी पाशविकता ढकी छुपी रहती है बस ये कहा जा सकता है ……… आभार ……………. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Santosh Kumar के द्वारा
November 1, 2011

आदरणीय अबोध जी ,.सादर अभिवादन बहुत सही पोस्ट ,..इंसान मूलतः जानवर ही है ,..सबसे खतरनाक जानवर …..बाकी जानवर अपना पेट भरने या अत्यंत आवश्यक हिंसा ही करते हैं ,.. ..एक बात और भी मेरी समझ में आती है ,प्रतिशोध की भावना राक्षस भी बना देती है ,…अच्छी पोस्ट के लिए हार्दिक आभार

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    गुरुभाई, सही कहा भाई, प्रतिशोध की भावना इंसान को न केवल जानवर वरन राक्षस ………… समर्थंक, प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ भय्या ………. बस अपना करम बनाए रखिये इस अबोध पर :) http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Santosh Kumar के द्वारा
    November 2, 2011

    बड़े भाई आप हैं ,..करम आपका चाहिए मुझ मूरख को

    abodhbaalak के द्वारा
    November 2, 2011

    aapke lekho ka star aur mere lekhon ka dekh len, antar samjh me aa jayega LOL aap, aap ho bhai mere, umr se kuchh nahi hota, vidvata se hota hai. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Santosh Kumar के द्वारा
    November 2, 2011

    हा हा हा ,..खा गए ना धोखा ,…भैय्या अबोध जी ,..मैं वास्तव में एक मूर्ख ही हूँ ,..इसके बहुत सारे उदहारण भी हैं ,..एक कहावत सुनी होगी आपने —अध जल गगरी छलकत जाय …. हम भाई हैं ,..तो एक दूसरे की ज्यादा तारीफ़ भी ठीक नहीं ,..बस कदम मिलकर चलना होगा ,..


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