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वो तो हमारे ………

Posted On: 26 Sep, 2011 Others में

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 कुछ  दिनों  पहले  एक  मित्र  के  साथ  वार्ताप्लाप  चल  रहा  था , मेरे  अच्छे  मित्रो  में  से  हैं  वो, और  मेरे  मित्र  हैं  इस  लिए  उनका  अच्छा  होना  ज़रूरी  है , वरना  मै  ………………….

:)

 

उनमे  एक  आदत  बड़ी  विचित्र  है , पर  ऐसी  आदत  हम  में  से  अक्सर  लोगों  में  भी  पायी  जाती  है . वो  आदत  है  लोगो  से  उनकी  रिश्तेदारी  को  जोड़ना , आप  किसी  की  भी  बात  करें , वो  ढूंढ  कर , कहीं  से  भी  घुमा  फिरा  कर  उससे  अपना  रिश्ता  जोड़  देते  हैं , पर  यहाँ  पर  एक  कंडीशन  लागू  होती  है , उस  व्यक्ति  का  प्रसिद्ध  या  धनी  होना  या  किसी  ऊँचे  पद  पर  होना . आपने  अगर  किसी  मंत्री  का  नाम  लिया  तो  कहीं  ना  कहीं  से  वो  उनको  परिचित  या  संभंधि  निकाल  ही आएगा , किसी  खिलाडी , फिल्म  स्टार , उच्च  अधिकारी  ….……,. आप  किसी  का  भी  नाम  लें , उनका  सम्बन्ध  कहीं  ना  कहीं  से  उनसे  बन  ही  जाता  है.

 

आपने  ये  कहावत  तो  सुनी  ही  होगी  की  (SUCCESS HAS MANY FATHER BUT FAILURE IS AN ORPHAN) यानि  जीत  के  हिस्सेदार  तो  सभी  होते  हैं  पर  हार  को …………, वही  हाल  जीवन  में  भी  है , अगर  हमारे  कोई  संभंधि  किसी  ऊँचे  पद  पर  या  धनी  या  प्रसिद्ध  होते  हैं  तो  हम  उनके  साथ  अपनी  दू…………………र की भी  रिश्तेदारी  को  ऐसा  बताते  हैं  जैसे  की  वो  हमारे  बिलकुल  ही  निकट  के  रिश्तेदार , बल्कि  घर  के  ही  मेम्बर  हों , और  अगर  कोई  गरीब  संबंधी   हो  तो  उसकी  अपने  साथ  नजदीकी  रिश्तेदारी   को  भी  स्वीकारने  में  हिचकते  हैं . हमारी  मानसिकता  अक्सर  उगते / चमकते  sooraj  ko  प्रणाम  करने  के  जैसी  ही  होती  है , जिसे  केवल  उगता  सूरज  ही  …………..…

 

जीवन  में  हम  इन  बातों  को  इतना  महत्व  क्यों  देते  हैं , अक्सर  ये  प्रश्न  मेरे  मन  में  उठता  है ? क्या  गरीब  रिश्तेदार  होने  से  हमारी  इज्ज़त  पर  बट्टा  लगता  है ? क्या  केवल  धन  ही , या  प्रसिद्धि  ही  या  ऊँचे  पद  पर  होना  ही  …………..सबसे  बढ़  कर  है ? क्या  निर्धन  की  कोई  इज्ज़त , कोई  अहमियत , कोई  मान  नहीं  है ?क्या  केवल  धन  na होने  से  या  समाज  में  नाम  / पद  ना  होने  से  वो  नीच , या  हीन  हो  जाते  हैं ? अगर  हमारे  साथ  भी  ऐसा  हो , यानि  कोई  हमसे  अधिक  धनी  या  प्रसिद्ध  व्यक्ति  हमें  पहचानने  से , या  महत्व  देने  से  इनकार  कर  दे  तो  हमारे   दिल  पर  क्या  गुजरेगी , काश  ये  हम   दूसरों  के  साथ  करने  से  पहले  सोचते .

 

अपने , अपने  ही  होते  हैं . यदपि  aaj हर  तरफ  बाप  बड़ा  ना  भय्या  सबसे  बड़ा  रुप्प्या  के  नारे  लग  रहे  हैं  फिर  भी , जीवन  में  रिश्तों  का  जो  महत्व  है , वो  अभी  भी  बाकी  है . समाज  में  भले  ही  अब  ऐसे  उदहारण  दिखाई   देते  हैं  जहाँ  भाई  - भाई  को , माँ  - बेटे   को , पाती  पत्नी  को  ………. ऐसे  रिश्तो  की  हत्या  हो  रही  है , उनके  साथ  विश्वासघात  हो  रहा  है  पर  फिर  भी  मेरा   माना  है  की  हमारे  बीच  ऐसे  उदहारण  अपवाद  में  ही है , अब  भी  हम  पूरी  तरह  से …….………….

 

आप  सब  से  अनुरोध  है  की  जीवन  में  रिश्तों  को , भले  ही  वो   करीबी  हो  या  दूर  के , धन  दौलत , प्रसिद्धि  या  पद  के  आधार  पर  ना  तुले  बल्कि  ………………

 

रिश्ते  अनमोल  होते  हैं  उनका  मोल  इन  बातों  से  ना  लगाएं . आप  सब  ही  मेरे  इस  विचार  से  सहमत  होंगे , है  ना ?

 

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61 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Triawsagrip के द्वारा
October 26, 2011

धन्यवादnounधन्यवाद”]],interjectionधन्यवादधन्यवादthanksthanksधन्यवादशुक्रिया

Sushma के द्वारा
October 11, 2011

Ji haa mai bhi sehmat hu…. rishte money, power ya position se nahi bante……… rishte pyar se judte h bante or unhe nibhaya jata h……. chahe naya daur kitna hi advance kyu na ho gaya ho……. par rishto se koi bachkar nahi ja sakta……

    abodhbaalak के द्वारा
    October 12, 2011

    सुषमा जी यही तो दुःख है की समय के साथ अब रिश्तो को धन और पद से जोड़ा जाने लगा है, और इसमें भी लें दें ……….. आपके प्रोत्साहन और विचार के लिए आभार http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

nishamittal के द्वारा
October 9, 2011

रिश्ते वास्तव में अनमोल हैं,परन्तु भौतिकता के युग में सब बिकाऊ है.

    abodhbaalak के द्वारा
    October 10, 2011

    निशा जी इस पतन का अंत कहीं तो होगा, जहाँ पर जाकर हम समझेंगे की भौतिकता ही सब कुछ….. आभारी हूँ आपका की आपने …………. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

anamika के द्वारा
October 6, 2011

मई आपके विचार से पूर्णरूपेण सहमत हूँ …..रिश्तों की मर्यादा को हम भूलते जा रहे है……रिश्ते में पैसो की कोई जगह नही है….रिश्ते अनमोल होते है|

    abodhbaalak के द्वारा
    October 7, 2011

    अनामिका जी आभारी हूँ आपका की आपने आज, समय निकल कर इस रचना को न केवल पढ़ा बल्कि आपने उसे अपने विचार रखने के लायक भी समझा आगे भी आपसे ……… http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
October 2, 2011

आदरणीय भाई साहब सादर प्रणाम ! उत्साहवर्धन के लिए आभार | और आपकी याददास्त का राज मुझे चाहिए क्योंकि मेरे पास ऐसे मरीजों की संख्या अधिक रहती है जिनकी मेमोरी कमजोर हो गयी है |

    abodhbaalak के द्वारा
    October 3, 2011

    कैलाश भाई ऐसा कुछ नहीं है की मेरी यादाश्त कुछ खास है, बस अगर कोई लेख दिल को छू जाता है तो याद रह जाता है. और आपकी वो रचना भी इसी श्रेरनी में आती है … विचार दें के लिए आप आभारी हूँ http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

div81 के द्वारा
October 1, 2011

सच में रिश्ते अनमोल होते है जिनका की मोल नहीं लगाया जा सकता मगर मतलबी समाज में इस बात की उम्मीद करना बेमानी है यहाँ पैसो की बोली लगती है रिश्ते बिक जाते है | और जो नहीं बिकते वो अपमान और खून का घूंट पीते है | अच्छा लेख बधाई

    abodhbaalak के द्वारा
    October 1, 2011

    सच में दिव जी, अब तो रिश्ते मोल तोल के …. खून के रिश्ते भी अब कभी कभी … विचार के लिए आपका आभारी हूँ http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Abdul Rashid के द्वारा
September 29, 2011

क्षमा करे अबोध जी नजाने कैसे आपका यह बेहतरीन पोस्ट हमसे मिस हो गया रिश्ते अनमोल होते है अगर निभाए जाए सप्रेम अब्दुल रशीद

    abodhbaalak के द्वारा
    September 30, 2011

    रशीद भाई शुक्रिया, रिश्तो के निभाना भी आसान नहीं है, क्योंकि आज हमारा अहम् ….. हर धर्म में रिश्तो को सहेज कर रखने की बात कही गयी है लेकिन….. आभार … http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Lahar के द्वारा
September 28, 2011

प्रिय अबोध जी सप्रेम नमस्कार , आज मनुष्य इतना स्वार्थी हो गया है की वो हर किसी से बस अपने फायेदे के लिए ही मित्रता रखना चाहता था | रिश्तेदारी से लेकर दोस्ती तक सब धन दौलत पर आधारित हो गयी है | अगर आपके पास पैसा है तो आपके इतने ज्यदा रिश्तेदार निकल आएंगे की आपको खुद नहीं मालूम होगा का आप उनको जानते है की नहीं ! और ये बातें सिर्फ रिश्तेदारों या दोस्तों पर नहीं लागू होती है अपितु आज तो मानविय मूल्यों का इतना पतन हो गया है की घर के सदस्यों में भी स्वार्थ की बू आने लगी है ! जो भी ये हमारे नैतिक पतन का परिणाम है

    abodhbaalak के द्वारा
    September 29, 2011

    सही कह रहे हैं आप, की अब हम रिश्तो को भी स्वार्थ के कारण ही ….. कलयुग है, और अब रिश्तो का भी कल्युगीकरण हो चूका है……, जो रिश्ते हमें शक्ति देते थे अब उन पर ………… आपके सुन्दर विचार और प्रोत्साहन के लए आपका आभारी हूँ…. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

surendra shukl bhramar5 के द्वारा
September 27, 2011

प्रिय अबोध जी ये बड़ा प्रश्न काश कुछ सुधार लाये लोगों में तो जीवन ही सुधर जाए …भ्रष्टाचार भी कुछ हद तक दूर हो जाए ..अभी तो मुह फेर क्र चल देते हैं निर्धन देख …तो मन में आता है भ्रष्टाचारी बन जाओ रुतबा बना लो सब तलवे चाटें ….. सार्थक लेख भ्रमर ५ क्या गरीब रिश्तेदार होने से हमारी इज्ज़त पर बट्टा लगता है ? क्या केवल धन ही , या प्रसिद्धि ही या ऊँचे पद पर होना ही …………..सबसे बढ़ कर है ? क्या निर्धन की कोई इज्ज़त , कोई अहमियत , कोई मान नहीं है ?क्या केवल धन na होने से या समाज में नाम / पद ना होने से वो नीच , या हीन हो जाते हैं

    abodhbaalak के द्वारा
    September 28, 2011

    भ्रमर भाई, आज भौतिकवाद है, सब कुछ कुछ लाभ के कारण ही ….., और उसकी भेंट रिश्ते नाते भी …. आपका आभारी हूँ की आपने अपने अन्ब्मोल विचार से एक बार फिर अवगत कराया. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

vinitashukla के द्वारा
September 27, 2011

सही कहा आपने, रिश्तों की अहमियत भावना से होती है न कि पैसे और हैसियत से. सुन्दर आलेख के लिए बधाई अबोध जी.

    abodhbaalak के द्वारा
    September 28, 2011

    विनीता जी ऐसा कहते तो अक्सर लोग है पर क्या वास्तव में ऐसा होता है, क्या वास्तव में वो इस कथनी को ….. आभार आपके विचार के लिए http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Amar Singh के द्वारा
September 27, 2011

अबोध जी बहुत सुन्दर विचार, आज के समय में प्रत्येक व्यक्ति औरो से मात्र लेने के इच्छा रखता है. वह कभी किसी को कुछ देना नहीं चाहता. इसीलिए वह सदा अमीर लोगो से सम्बन्ध जोड़ना चाहता है और गरीब सम्बंदियो से दूरी बनाए रखता है. क्योकि उसे कही न कही यह भय होता है की कही वह गरीब सम्बन्धी उससे कुछ धन न मांग ले.

    abodhbaalak के द्वारा
    September 28, 2011

    अमर जी क्या करें, अब सब कुछ लें दें पर जो ………… हर जहाँ ये देखा जाने लगा है की वहां से मिलेगा क्या? रिश्ते अब इन्ही बातों की भेंट चढ़ गए हिं …. आभारी हूँ आपका की आपने समय निकल कर इस पोस्ट को पढ़ा और अपने विचार …. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

roshni के द्वारा
September 27, 2011

अबोध जी नमस्कार आज के समय मे गरीब रिश्तेदार और अमीर रिश्तेदार का अंतर काफी दिल दुखाने वाली situations create करता है … गरीब अच्छे से अमीर की आवाभगत नहीं क्र पता और आमिर वोह तो गरीब को नीचा दिखने का कोई अवसर नहीं चुकता ……. इन सबसे ऊपर उठ कर ही असली रिश्ते निबये जाते है … धन तो आता जाता रहता है मगर एक बार रिश्ता ख़राब हो जाता है तो दुबारा आता नहीं .. सार्थक लेख आभार

    abodhbaalak के द्वारा
    September 28, 2011

    रौशनी जी, पहले तो आपका आभार की आपने अपने बहुमूल्य विचार से ………….. आज हम सब ही लें दें की भाषा को ही समझते हैं, जबकि रिश्ते सच में अनमोल हैं……. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

surendra rawat के द्वारा
September 27, 2011

आपका लिखा हुआ आर्टिकल बहुत ही लाजबाब है . जिस चीज को हम समझ नहीं रहे है उसे आपने बड़ी खुबशुरती से हम लोगो के सामने रखा है वो काबिले तारीफ है .

    abodhbaalak के द्वारा
    September 28, 2011

    रावत जी आभारी हूँ आपके प्रोत्साहन और विचार के लिए, बस आप जैसे लोग ही कभी कभी लिखने की प्रेरणा देते रहते हैं, आगे भी अपने मार्गदर्शन की छाया बनाए रखियेगा http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Paarth Dixit के द्वारा
September 27, 2011

आदरणीय अबोध जी,नमस्कार…बिलकुल सत्य बात कहता हुआ आपका लेख..और एक सही सन्देश भी देता हुआ की “रिश्तो को कभी धन दौलत से नहीं तौलना चाहिए”..एक अच्छे लेख के लिए आपको हार्दिक बधाई…

    abodhbaalak के द्वारा
    September 28, 2011

    पार्थ जी बहुत बहुत आभारी हूँ की आप जैसे लोग मेरे लेख को न केवल पढ़ते बल्कि उसको प्रतिक्रिया के लायक भी समझते हैं, आपके प्यार और प्रोत्साहन के लिए आपका आभारी हूँ आगे भी अपने विचार ….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Santosh Kumar के द्वारा
September 27, 2011

आदरणीय अबोध जी ,.सादर प्रणाम हमेशा की तरह आपका बेहतरीन लेख ,..सच ही है ..आज जब हम रोज आने वाले कल को आज से अच्छा बनाना चाहते हैं ,..तो हर जगह फायदा भी देखते हैं ,..मुझे लगता है की अब रिश्ते बहुत ही कम रह गए हैं ,..सबका कलियुगीकरण हो गया है ,..और कलियुग में तो माया ही सबकुछ है ,……… मैं द्रढ़ता से यह कहूँगा की अपवाद हैं और हमेशा रहेंगे ,..गिनती कम ज्यादा होती रहती है ,.. शिक्षाप्रद सार्थक लेख के लिए हार्दिक बधाई

    abodhbaalak के द्वारा
    September 28, 2011

    गुरु भाई (आप भी राजकमल जी को और मई भी … ) सच कहा है आपने की रिश्तो का भी कल्युगीकरण हो कर रह गया है, हर कोई अब बस केवल …… आभारी हूँ आपका, सदा ही रहता हूँ, की आप जैसे लोगों का इतना प्रेम मुझे मिलता है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

manoranjanthakur के द्वारा
September 27, 2011

एक दम सहमत रिश्ते बनते नहीं बन जाते है बधाई

Ramesh Bajpai के द्वारा
September 27, 2011

प्रिय श्री अबोध जी इस रंग बदलती दुनिया के गिरगिट से भी ज्यादा रंग बदलते ये रिश्ते अब क्या कहू पर आपकी बात व सीख दोनों ग्रहणीय है “रिश्ते अनमोल होते हैं उनका मोल इन बातों से ना लगाएं . आप सब ही मेरे इस विचार से सहमत होंगे , है ना ? ” बिलकुल सहमत हू | इन अनमोल रिश्तो का माधुर्य ….. | जैसे हम लोगो के रिश्ते है ना मीठे |

    abodhbaalak के द्वारा
    September 29, 2011

    गर्व की बात है मेरे लिए आदरणीय बाजपेई जी की आपने मुझे अपना समझ कर इतना स्नेह देते हैं, निःसंदेह हमारे रिश्ते ………………… :) आपके प्रोत्साहन के लिए सदा की भांति आपका आभारी हूँ http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

jlsingh के द्वारा
September 27, 2011

अबोध जी, नमस्कार! समाज की सच्चाइयों से रूबरू कराता लेख! पर सभी एक से नहीं होते! अगर इस लेख को पढ़ने के बाद भी आपके मित्र जैसे लोगों में कुछ परिवर्तन आता है तो यह रचना सार्थक कही जायेगी! –जवाहर!

    abodhbaalak के द्वारा
    September 29, 2011

    जवाहर भाई मै भी तो यही कह रहा हूँ की सब एक से नहीं हैं, अपवाद में ही ऐसे….. आपके प्रोत्साहन और विचार के लिए आपका आभारी हूँ. आगे भी अपने विचारो से ….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

syeds के द्वारा
September 27, 2011

प्रिय अबोध जी, हमेशा की तरह बेहद खूबसूरत लेख.. वास्तव में आज का समाज ऐसा ही है… बड़े आदमी से तो सभी रिश्ता जोड़ने के लिए तैयार रहते हैं… गरीब आदमी का कोई नहीं होता….सार्थक लेख के लिए बधाइयां… http://syeds.jagranjunction.com

    abodhbaalak के द्वारा
    September 29, 2011

    सय्यद भाई, आपके विचार सदा ही प्रेरणा देते हैं और प्रोत्साहित करते हैं ….. शुक्र है की अभी तक ये बीमारी (रिश्तो की मोल भाव की ) हमारे समाज में पूरी तरह से ….. आगे भी आपसे ………. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

akraktale के द्वारा
September 26, 2011

आदरणीय अबोध जी नमस्कार, आपने बिलकुल ही उन लोगों की असलियत सबके सामने रख दी है जो अपने को बड़ा बताने के लिए सफ़ेद झूठ बोलने से भी परहेज नहीं करते. एकदम सच कहा आपने सगे रिश्ते कुदरत ने बनाये हैं उनका सम्मान करना ही चाहिए, अमीरी गरीबी ,छोटा बड़ा, अच्छा बुरा सभी कुछ हो सकता है, मगर रिश्तों को सिर्फ दिखावे के लिए न पहचानना अपराध सामान है है. बहुत अच्छा विचार रखा है आपने. धन्यवाद.

    abodhbaalak के द्वारा
    September 29, 2011

    धन्यवाद भय्या मेरे, आजकल इतना ज्यादा हर तरफ लें दें की भाषा का परासर हो चूका है की रिश्ते भी इनकी चपेट में आ चुके हैं, ऊपर वाले से प्रार्थना है की ये अपवाद में ही रहें …… प्रोत्साहन और विचार के लिए आभार http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

संदीप कौशिक के द्वारा
September 26, 2011

आदरणीय अबोध जी, सादर प्रणाम ! बहुत ही खूबसूरत पोस्ट…..जीवन में रिश्तों के महत्व को दर्शाती हुई । लेकिन हक़ीक़त वही है जो आपने….

    abodhbaalak के द्वारा
    September 29, 2011

    संदीप जी आभारी हूँ आपके विचार और प्रोत्साहन के लिए रिश्ते ही हमारी शक्ति हैं और अगर इन पर ….. तो जीवन में क्या रह जायेगा? http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
September 26, 2011

आदरणीय भाई साहब सादर प्रणाम ! हर बार की तरह रिश्तों के महत्व को दर्शाती सुन्दर प्रस्तुति |बधाई !

    abodhbaalak के द्वारा
    September 29, 2011

    कैलाश जी आपके कमेंट्स सदा ही प्रोत्साहित करते हैं, और इसी लिए आपके कमेंट्स की प्रतीक्षा ….. अपने स्नेह / प्रेम बनाये रखे यही प्रार्थना है … http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

Amita Srivastava के द्वारा
September 26, 2011

अबोध जी , सही खा आपने रिश्ते अनमोल होते है | इनको धन के तराजू पर नही आंक सकते |

    abodhbaalak के द्वारा
    September 29, 2011

    अमिता जी हम सब यही कहते तो है, की रिश्ते अनमोल होते हैं पर आज कल कहनी और करनी में अंतर भी दिखाई देने लगा है…. आपके विचार के लिए आपका आभारी हूँ http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

rita singh 'sarjana' के द्वारा
September 26, 2011

अबोध जी , लीजिये आज आपके साईट में आ ही गयी l मेरे हिसाब से कोई भी रिश्ता न तो धन दौलत से या बड़े ओहदे से तोले जाते हैं l वल्कि रिश्ते तो दिल से बनते हैं जहाँ न उंच-नीच ना ही धर्म आड़े आते हैं l बड़े आदमी से रिश्ते जोड़कर क्षणिक अभिमान दिखाना बेवकूफी समझती हूँ l इसके बदले आप क्या हैं और क्या अच्छा कर सकते हैं ये ध्यान दिया जाये तो उत्तम रहेगा l बहरहाल आपने एक अच्छा विषय मंच पर रखकर हमें वार्ता करने का मौका दिया l उसके लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया

    abodhbaalak के द्वारा
    September 29, 2011

    आदरणीय रीता जी, सबसे पहले तो आपको वेलकम, आपको इस अबोध की याद तो आई ….. :) रिश्तो का बाजारीकरण हो रहा है आजके दौर में, भले ही ये पूरी तरह से न हुआ हो पर …… जो रिश्ते हमारे लिए शक्ति होते थे वो अब स्वार्थ की भेंट चढ़ते जा रहे हैं और ये पतन ….. आभारी हूँ आपका की आपने इस पोस्ट को पढ़ा और अपने विचार …… आगे भी आपसे अनुरोध है की अपने अमूल्य राइ ….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

rajkamal के द्वारा
September 26, 2011

प्रिय अबोध जी ….सस्नेह नमस्कार ! अब अगली बार आपक वोह मित्र आपसे मिले तो उससे पूछना की वोह राजकमल को जानता है की नहीं …. उसकी हाँ और ना पर ही मेरा अमीर – गरीब होना और प्रसिद्ध – गुमनाम होना निर्भर है …… जय श्री राम !!! :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/09/26/“वेश्यावृत्ति-को-कानूनी/

    jlsingh के द्वारा
    September 27, 2011

    आदरणीय महोदय, अभी कल ही मेरा एक मित्र कह रहा था — हाँ हाँ वही ‘राजकमल’ न जिसके नाम से राजकमल प्रकाशन पुस्तकें छापता है. — अब आप अनुमान लगा ही सकते हैं —- आपकी विनोदपूर्ण बातें और लेखन हमेशा हंसाने पर मजबूर कर देती है — आप इसी तरह हंसी का खजाना लुटाते रहें — आप से ज्यादा अमीर भाल कौन हो सकता है. साभार जवाहर!

    abodhbaalak के द्वारा
    September 29, 2011

    राजकमल जी :) आप भी न ……………, बड़े वो हैं :) :) :) अरे कहाँ आप और कहाँ वो ………………. आप तो आप हो, हम सब के ………, आप तो मंच के अन्ना हजारे हो, जो मंच पर अपनी …… (कहीं ज्यादा तो नहीं हो गया?) आपके लिए जो सम्मान मेरे ह्रदय में है, वो आप जानते ही हैं, कह कर उसे हल्का….. बस अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखे, क्योंकि आपके होने से मुझे एक सपोर्ट की भावना रहती है, की मंचपर मेरी बैकिंग करने के लिए कोई तो है …. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    abodhbaalak के द्वारा
    September 29, 2011

    जवाहर जी की बात से सहमत हूँ, अमीरी में भी तो अलग अलग ….. लखपति, करोड़ पति, अरब पति….. पर आप तो उससे भी ऊपर ………….. :)

sanjeevkumargangwar के द्वारा
September 26, 2011

आपने बिलकुल सही फ़रमाया अबोध जी

    abodhbaalak के द्वारा
    September 29, 2011

    संजीव जी मेरे विचार से संभवतः आपका पहला कमेन्ट है मेरे पोस्ट पर………. आपका आभारी हूँ की आपने इसे पढ़ा और अपने विचार देने के काबिल समझा …. आगे भी आपसे ………….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

sadhana thakur के द्वारा
September 26, 2011

अबोध भाई ,,सच कहा आपने रिश्ते भी अब सिक्के की खनक पर थिरकते हैं ,लेकिन रिश्तों को सहेजना भी हमें ही हैं ..बहुत अच्छी रचना …….

    abodhbaalak के द्वारा
    September 29, 2011

    आदरणीय साधना जी रिश्तो का भी बाजारीकरण होता जा रहा है और इसे सहेजने वाले भी तो हम ही है, अगर हम ही ….. प्रोत्साहन के लिए आपका आभारी हूँ, और आपसे आगे भी मार्गदर्शन का अनुरोध है … http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

alkargupta1 के द्वारा
September 26, 2011

अबोध जी , मुझे लगता है आज हर रिश्ता स्वार्थ से लिप्त हो गया है जिससे संबंधों की मधुरता समाप्त हो गयी है….हालाँकि इसके अपवाद भी हैं आज…….हर रिश्ते को निस्वार्थ भाव से देखें व उसे महत्त्व दें तभी उसकी गरिमा व महत्ता बनी रह सकती है…..आपने बहुत ही अच्छे विषय पर बहुत बढ़िया लिखा है……में आपके विचारों से पूर्णतः सहमत हूँ अति बहुत सुन्दर आलेख !

    abodhbaalak के द्वारा
    September 29, 2011

    आदरणीय अलका जी सम्बन्ध ही तो हमारी शक्ति होते थे, और हमें इनसे सुरक्षा का भाव …….. पर हमारे सवार्थ ने इन्हें भी अपने ………… आपके प्रोत्साहन और स्नेह के लिए आभारी हूँ, आपसे सदा ही मार्गदर्शन की अनुरोध रहा है और आगे भी….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

vikasmehta के द्वारा
September 26, 2011

अबोध जी …….आपका लेख अतिउत्तम है रिश्तो पर जो अपने अपनी राए वयक्त की है मै उससे सहमत हूँ

    abodhbaalak के द्वारा
    September 29, 2011

    विकास जी आभारी हूँ आपके विचार और प्रोत्साहन के लिए….. बस अपना प्रेम बनाये रखे, यही आपसे अनुरोध है … http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

sumandubey के द्वारा
September 26, 2011

अबोधबालक जी नमस्कार्। आपने सच कहा है रिश्ते अनमोल होते है उनका गरीबी अमीरी से कोई लेना देना नही मेरे समझ से इन्सान बड़ा स्वार्थी हो गया है चाहे वो गरीब हो या अमीर गरीब ज्यादा आपेक्षा करता है और अमीर पीछा छुड़ाता है। रिश्तों की पवित्रता तभी रहती है जब स्वार्थ को उनसे परा रखा जाये।

    abodhbaalak के द्वारा
    September 29, 2011

    आदरणीय सुमन जी सच kaha है अपने की अब हम स्वार्थी हो चुके हिं जो केवन अपने लाभ और हानि से रिश्तो को भी तौलने लगे हैं, ….. मोल भाव और लाभ हानि तो बाज़ार में देखि जनि चाहिए न की रिश्तो में….. विचार और प्रोत्साहन के लिए आपका आभारी हूँ


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