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45 Posts

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abodhbaalak


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क्या कुछ बदलेगा?

Posted On: 11 Feb, 2012  
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जनरल डब्बा में

55 Comments

छोटी सी बात

Posted On: 21 Jan, 2012  
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जनरल डब्बा में

102 Comments

ऐसा क्यों होता है?

Posted On: 23 Dec, 2011  
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जनरल डब्बा में

76 Comments

क्या मै धार्मिक हूँ?

Posted On: 4 Dec, 2011  
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जनरल डब्बा में

81 Comments

चलो चलें (जलें)

Posted On: 17 Nov, 2011  
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जनरल डब्बा में

76 Comments

हम जानवर हैं, वहशी जानवर

Posted On: 1 Nov, 2011  
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जनरल डब्बा में

94 Comments

आत्म – मंथन

Posted On: 21 Oct, 2011  
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जनरल डब्बा में

85 Comments

अनकही अनसुनी शायरी

Posted On: 13 Oct, 2011  
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कविता में

72 Comments

दर्दे दिल

Posted On: 3 Oct, 2011  
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जनरल डब्बा में

83 Comments

वो तो हमारे ………

Posted On: 26 Sep, 2011  
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जनरल डब्बा में

61 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

राजनीति से बढ़ कर अब कोई लाभ दायक बिजनेस है ही नहीं, एक बार विधायक / सांसद बन जाये तो फिर न जाने कितनी पुश्तें ……… सब से बड़ा विचार विन्दु तो यही है ही अबोध जी ..तो क्या अब किसी को वोट दिया ही नहीं जाए जैसे दौड़ में दस में एक गधा भी रहे बाकी लूले लंगड़े गधे के बीच तो वो कछुवा चाल वाले से आगे तो रहेगा ही .. रिजेक्ट क्या हम कर सकते हैं पूरा चुनाव अब सलमान साब की ही देखिये चुनाव आयोग और नियम कानून से भी ताल ठोंक रहे हैं .. हम तो इसी लिए कहते हैं की १०० में इतने बेईमान फिर भी मेरा भारत महान ...आंकड़ा आप ने लिखा देखा ही ..कौन उन्हें रोकें कौन तिक्त न दे आप उसको बाहुबली और पैसा वाला कहते हैं तो वाही तो ... निराशावादी आप नहीं ये वक्त सब को इसमें ठेल दे रहा है ... जय श्री राधे ..सुन्दर लेख भ्रमर ५

के द्वारा: surendr shukl bhramar5

आदरणीय अबोध जी,नमस्कार सबसे पहले तो में निचे लिखे शशि जी के बातों से सहमत हूँ और जहाँ तक कुछ बदलने की बात है तो बदलाव तो संसार का नियम है उम्मीद रखिये जरुर बदलेगा हाँ ये बात जरुर है की इस चुनाव में ना बदले मैं बिहार से हूँ और कुछ दिनों पहले तक बिहार की राजनीतिक हालत भी यू पी के जैसी ही थी पर परिवर्तन हुआ और आज धीमी गति से ही सही यहाँ की सरकार एक अच्छी सासन व्यवस्था दे रही है कल किसी ने नहीं देखा निराशावादी ना होइए "हम भारत के लोग एक दिन जरुर बढ़ेंगे" हमें बढना होगा ............................................................................................................................................... आपसे नम्र आग्रह है की एक बार मेरे लेख को पढ़ें उसमें हमने कुछ कोशश लिखे है अपने और हमारे बारे में अपना महत्वपूर्ण सहयोग दें और मार्गदर्शन करे आपको धन्यवाद

के द्वारा: ANAND PRAVIN

महोदय, आपकी रचना 'छोटी सी बात' अपने आप में इतना विशाल अर्थ व दर्शन समाहित किए हुए है कि मेरे जैसे नये ब्लागर के लिए इसको बहुत सुन्दर व प्रेरक कहकर पीछे हटना ही अच्छा होगा। इसी के साथ एक अनुरोध कि समसामयिक चुनाव व मताधिकार पर भी अपनी किसी रचना के द्वारा हम सभी को प्रेरित व जागरुक करने का कष्ट करें एवं मेरे निम्न प्रयास पर अपना अमूल्य मार्गदर्शन करने का कष्ट भी करें। काश! ये चुनावी दबाव हर वक्त रहता चुनाव आते ही नजारे बदल जाते हैं कल तक के राजा अब जनसेवक बन? जाते हैं काश ये चुनावी द बाव हर वक्त रहता कुछ दिनों के लिए ही सही गरीब बेसहारा जनता का मनोबल तो ऊचा रहता पता नहीं कब तक इन्हे ढोते रहेंगें हम? लोकतांत्रिक देश में तानाशाही से पिसते रहेंगें हम कब हम बदलेंगें? कब ये बदलेंगें? इनका तो क्या कहना चुनाव आते ही ये हर पल रंग बदलेंगें हमें इसके सिवा और क्या चाहिये सिर्फ दो वक्त की रोटी और अपनी पहचान चाहिये बस इसीलिए है लगता कि काश? चुनावी दबाव हर वक्त रहता।

के द्वारा: jagobhaijago

अबोध जी क्षमा चाहता हूँ, मैं इस विषय पर आपसे सहमत नहीं हो पा रहा हूँ। 1. मानवता के अतिरिक्त अन्य कोई धर्म नहीं हैं, अज्ञानतावश जिन्हे हम धर्म समझते हैं,वे धर्म नहीं, अपितु सम्प्रदाय हैं। 2. कुछ राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से सम्पन्न व्यक्तियों ने राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े व्यक्तियों का शोषण करने के लिये किया था। 3. निःसंदेह ईश्वर अज्ञान एवं डर की अनैतिक संतान है।  4. मजहब हमें सिखाता, आपस में बँटके रहना।    मजहब के अब सितम को मुझको नहीं है सहना।।   इंसान बनके आये, इंसान बनके रहीये,  हिन्दु इसाई हमको, बनना नहीं मुसलमां।।  मैं धार्मिक बड़ा हूँ, हिन्दु औ मुसलमां से, चाहे न कोई माने, सच किन्तु मेरा कहना।।

के द्वारा: dineshaastik

के द्वारा: D33P

इंसान ऐसा ही है, ना पूरी तरह से मजबूर और ना ही पूरी तरह से सक्षम .जो इस पूरी सृष्टि को चला रहा है वही इसका बनाने वाला भी है और उसे ही इश्वर कहते हैं.हमें सही और गलत को समझने कि शक्ति दे, हम जात -पात , धर्म, क्षेत्र , प्रान्त से ऊपर उठ कर केवल और केवल भारतीय बने. आने वाला 26 जनवरी हमारे लिए केवल एक छुट्टी मनाने का दिन ना होकर एक ऐसा दिन हो जो हम्मे एक नयी उर्जा फूक दे , एक नयी उमंग दे... प्रिय अबोध जी सुन्दर प्रसंग और सीख ..सब उस परम शक्ति को मानें जानें उसका तो भय रखें मन में सच्चाई और प्रेम की राह चल पड़ें सब कुछ बदल जाए ...सब कुछ सार तो आप ने लिख ही डाला और क्या लिखना .. साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय सार सार को गहि रहे थोथा देई उडाय... हम तो आप की हाँ में हाँ मिला देंगे बस ....वसंत पंचमी और गणतंत्र दिवस की अग्रिम शुभ कामनाएं .. भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5

अमिता जी आप जैसा विद्वान् तो नहीं हूँ पर आपने जो दो उदारहण दिए हैं, उस पर कुछ कहना चाहूँगा. बच्चो को उनके हाल पर कभी नहीं छोड़ता, वो तो माँ के उदार में भी उसके जीवन का इन्तेजाम करदेता है, और बूढों को उनके बच्चो के सही पालन पोषण की सीख देता है, आज के परिवेश में जिस तरह से बच्चो को पालना चाहिए वो कहाँ रह गया है, अगर सही तरह से बच्चो की परवरिश की जाये तो वो ....................., अब तो जैसे बच्चे देख रहे है वो वैसा ही कर रहे हैं खैर ये मेरी सोच है, की इश्वर के दया है जो हम सांस भी ले रहे हैं, और हमें हर सांस के साथ उसका धन्यवाद करना चाहिए, ये मेरा अपना दृष्टिकोण है .... :) आभार आपके अलग सी प्रतिक्रिया का पर इससे भी सोच को नयी दिशा तो मिल ही जाती है. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

के द्वारा: abodhbaalak

प्रिय अबोध जी ..... सप्रेम नमस्कारम ! जिस तरह से आप इन दिनों अध्यात्म की तरफ अपने नैनो कदम तेजी से बढाते हुए इश्वर तथा उसे जुड़ी हुई बातो + मान्यताओं तथा सिधान्तो की बाते करने लगे है उससे पता चलता है की अब आप अबोधता को छोड़ कर सुबोधता में प्रवेश कर रहे है ..... यह बहरी और भीतरी रूपान्तरण आपमें सकारात्मक और उपयोगी तथा सुखदायक बदलाव लेकर आये इसी कामना और तमन्नाओं के साथ हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा रचना लिखने के लिए आभार – वैसे आजकल इस मामले में मेरी हालत भी कमोबेश आप जैसी ही है हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma

अबोध जी नमस्कार, आपका आलेख निश्चित ही रोचक, मनोरंजक है, साथ ही अंत में सुन्दर संदेश देता है। किन्तु क्षमा माँगते हुये आपके विद्वान पात्र (जिसका आपने शायद नामकरण संस्कार नहीं किया है) के आधार - हीन कुर्तकों से सहमत नहीं हूँ। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ईश्वर अज्ञान एवं डर की अनैतिक संतान है।इसके जन्म का  एकमारत्र उद्देश्य यह आर्थिक,सामाजिक, राजनैतिक  एवं धार्मिक रूप से सम्पन्न लोगों द्वारा आर्थक, सामाजिक, राजनैतिक एवं धार्मिक रूप से पिछड़े हुये लोगों का शोषण करना था। जिसे करने में वो कामयाब भी रहे। हमारे पिछड़ेपन एवं सदियों तक गुलामी का कारण भी यही ईश्वर तथा धर्म है।  ईश्वर के न होने का प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि- चलो आपके विद्वान महोदय की बात कुछ पल के लिये मान लेते हैं कि ईश्वर ही सब करता है, उसीने सब कुछ बनाया है, जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, जल,थल,वायु, आन्तरिक्ष आदि। यहाँ तक कि समय भी उसी ईश्वर ने बनाया है, मैं आपके विद्वान से मात्र एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ कि समय को बनाने से पहले उन विद्वान महाशय के ईश्वर पास समय कहाँ से आ गया। अबोध जी मैं यह प्रतिक्रिया मात्र अपनी शंका के समाधान के लिये प्रस्तुत कर रहा हूँ। मेरा उद्देश्य किसी के हृदय को आघात पहुँचाना नहीं है।कृपया इसे अन्यथा न लें। अंत में आपका संदेश निश्चित ही हृदय में अंकित हो गया जिसके लिये आपका आभार एवं आपको बधाई....

के द्वारा: dineshaastik

बस अभी ही पढ़ी है कविता की ये पंक्तियाँ चिली के एंटी कवि निकानोर पार्रा की.... लगा कि आपके ब्लॉग पर  टिप्पणी के लिए उपयुक्त हैं बड़ा मुश्किल है भरोसा करना उस ईश्वर में जो छोड़ देता है अपने बच्चों को उऩके हाल पर बुढ़ापे औऱ बीमारी के तूफानों की दया पर मौत की तो कोई बात ही नहीं.... अब सोचें कि क्या वाकई ईश्वर है औऱ यदि है तो वो इस अमानवीय तरीके से इंसान के दुखदर्द से निस्संग और  उदासीन कैसे रह सकता है...।  औऱ रही देश की बात तो भई व्य़वस्था का अस्तित्व इतना दानवाकार होता जा रहा है कि उसमें लाखों इंसानों  का खून भी कम पड़ता है।  अजीब लगेगा ये कमेंट, लेकिन ये भी एक दृष्टिकोण है सोचने का.... ;-)

के द्वारा: amita neerav

अबोध जी, नमस्कार! इतनी रात को आपने परमात्मा (ईश्वर) के अस्तित्व और कर्म के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया है जो अकाट्य सत्य है. आपका ह्रदय कितना विशाल है कि आपने लगभग सभी ब्लोग्गर्स की टीम का गुणगान भी बड़े आराम से चन्द शब्दों में कर दिया! .... आपने भारतीय होने का आह्वान कर सबको चौंका दिया. ........ "इश्वर से प्रार्थना है कि हमें सही और गलत को समझने कि शक्ति दे, हम जात -पात , धर्म, क्षेत्र , प्रान्त से ऊपर उठ कर केवल और केवल भारतीय बने. आने वाला 26 जनवरी हमारे लिए केवल एक छुट्टी मनाने का दिन ना होकर एक ऐसा दिन हो जो हममें एक नयी उर्जा फूंक दे , एक नयी उमंग दे , जिसमे हम प्रण करें कि हम अपने को बांटने वाली हर शक्ति का विरोध करेंगे और उन्हें कामयाब नहीं होने देंगे . देश सर्वोपरि है और उससे बढ़ कर कुछ नहीं." इससे अच्छा सन्देश कुछ भी नहीं हो सकता है! बहुत बहुत आभार आपका! आपका हार्दिक सम्मान करता हूँ. डाक्टर साहब की प्रतिक्रिया भी लाजवाब है!!! जय हिंद!! जय भारत!!

के द्वारा: jlsingh

अबोध जी मैंने आपकि लिखि बातो को कयी बार पढा और फिर सोचा कि प्यार क्या  है......! मै अभी 22 साल का हु और मुझे भी किसि से प्यार  है...और मुझे पता है कि प्यार अक्सर दूरियो से होता है ] आप जिससे प्यार करो तो जरुरि नहि कि जिन्दगी भी आपकि उसी के साथ बिते..और  प्यार का सहि मतलब ये है कि आप किसि कि भावनाओ को बहुत अच्छी तरह से समझते हो और आप उस  सख्स कि हर मजबुरियो का आदर करते हो..! और प्यार का ना तो कोई धर्म देख कर होता है और ना ही जाति.....प्यार तो केवल विचारों से होता है..! मै आपकी कहि एक बात को सहि ठहराउंगा की आजकल के युवा मुवी देख कर विचलित हो रहे है और प्यार का अर्थ वो कामुकता से जोड रहे है..! मगर मै अभी भी उनमे से कुछ लोगो मे प्यार के सार्थक पहलु को समझा पाया हु..और मेरी आप लोगो से यहि विनति है कि आप भी युवावो को प्यार का सही मतलब समझाने कि क्रिपा करे..! मै किसि भी मां बाप को गलत नहि कहुंगा क्युंकि हर लडकी और लडके के मां बाप अपने बच्चों की खुशियां चाहते हैं मगर उनकि अपनी मजबुरियां होती है और वो है समाज..! ""मेरा आप सभी से यही अनुरोध है कि अगर आपको आपका प्यार ना मिले तो कभी भुल कर भी ना सोचना कि उसको आपसे प्यार नहि था""

के द्वारा: Roshan Dhar Dubey

पर ये प्रेम कहाँ रहा , प्रेम तो एक सव्भाविक प्रतिक्रिया हैं जो सोच विचार करके नहीं किया जाता.. जब माँ बाप अपने खून का /दूध का वास्ता दें, बाकी बहनों के रिश्ते की बात करें, समाज में कटने वाली नाक का हवाला, और ना जाने इस तरह के कितने इमोशनल ……………., तो लड़की का उस समय अपने बात पर खड़ा रहना आसान नहीं होता .. प्रिय अबोध जी प्रश्न के साथ साथ सारे असमंजस ..हालात का भी आप ने झरोखा दिखा दिया है तो ..भ्रमर का झरोखा अब क्या करे ?,,,, ऐसा ही होता है लेकिन चूंकि हमारा समाज अभी पूरी तरह पाश्चात्य सभ्यता को नहीं पचा सकता है इसलिए लड़के लड़किओं को आगे बढ़ने से पहले अपने मन को समझा ले रास्ता चुन लेना चाहिए या तो पर्वत से अडिग रहने का प्रेम पर फ़िदा होने का या माँ बाप समाज घर की इज्जत का ...दो नावों पर पैर रखना इतना सहज नहीं ..हाँ पैर बहुत मजबूत हों उतने आधुनिक हों तो बात जुदा है ..कुत्ते भौंके हाथी चलता रहे मस्त .. आनर किल्लिंग से कोर्ट भी त्रस्त है आज ..आप ने देखा होगा जिस बच्चे को इतने प्यार से त्याग से लोग पालते हैं पढ़ते हैं वो सम्मान आन बान में दाग लगा दे तो ?? इस लिए प्रेम प्रेम रत्ना आसान है निभाना बहुत मुश्किल ...जय श्री राधे भ्रमर ५

के द्वारा: surendr shukl bhramar5

आदरणीय अबोध बालक जी मुझे ये ब्लॉग पहले ही पढ़ लेना चाहिए था , आपने बिलकुल उचित लिखा है और मुझे यकीन है की कई बुध्जिवियों को ये रास भी नहीं आएगा! वास्तवमें हम भारतीय बड़ी जल्दी लोगों से प्रभावित हो जाते हैं , इसमें कोई संदेह नहीं की वर्तमान सरकार के नेतृत्व में भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा को भी लांघ गया है , पर इसका जिम्मेदार सिर्फ एक दल या फिर राजनीति को ही मानना उचित नहीं है , क्यूंकि हम सब इसमें पूरी तरह शामिल हैं , कोई कांग्रेस या बी.जे. पी के लिए भ्रष्टाचार नहीं करता वो अपने परिवार को दुसरे से ज्यादा खुश रखने के लिए करता है ,मैंने भी देखा है जो सरे आम भ्रष्ट हैं वो अन्ना अन्ना करके अपने को देश का सबसे बड़ा सेवक सिद्ध कर लिया है , और उनकी टीम के कुछ सदस्यों का संदिग्ध गतिविधियों में सम्मिल्लित होना अछि बात नहीं है अतः हमें दूसरों में दोष निकालने से पहले अपना दमन साफ़ करना होगा! हमें विस्मय हुआ तब जब उन्होंने राजनीति में आने की समर्थ होने के बावजूद इससे न जुड़ने की बात की क्यूंकि उनकी निगाह में राजनीति गन्दी है! अब भला आप बताईये की क्या बिना राजनीति में अछे लोगों के आये हुए कोई भी जन कल्याणकारी काम व्यापकता से कर सकते है , कभी नहीं अच्छे लोगों का राजनीति में आना इस देश की सबसे बड़ी आवश्यकता है! अच्छे लेख के लिए आपका हार्दिक आभार!

के द्वारा: gopesh

अवोध जी ; सार्थक लेखन पर वधाई ! विगत वर्ष एक लेख "दब्बू दबंग और दौलतमंद दिलवाले " के शुरुआती दो पेराग्राफ में उदाहरण ' खान ' साहब के संभ्रांत परिवार का देने की भूल के कारण लेख पूरे वर्ष प्रतिक्रिया विहीन रहा, इस वर्ष संपादित कर 'खान' साहब को 'सिंह' साहब बनाने पर वही लेख अन्य मंचों पर भी चर्चा में ..... एक अन्य अति महत्वपूर्ण विषय ईश्वर पर लिखे लेख "वो वेनाम सर्व शक्तिमान " को पांच-पाँच बार पुनर्प्रस्तुत करने पर भी हमारे मंच पर 'फीचर ' होना नसीब नहीं हुआ !!! कारण शुरूआती पेराग्राफ में ईसाई धर्म के अधिक प्रचलन का तार्किक कारण देने की भूल.....हालाकि अन्य मंचों पर अच्छा प्रतिसाद भी ...,, इसमें स्वयं मैं भी सम्मिलित हूँ ! आखिर "सम्मान हत्या " में सन्दर्भ नामों में परिवर्तन कर मैंने भी नापुन्शाकता का प्रदर्शन किया ही,,,,, यदि इस या इस जैसे मंच के बुद्धिवादी ब्लोगर ही इतने एकपक्षीय हैं तो आम आदमी को क्या दोष दें ,,,,, इसीलिये जिस तरह १९८८ में मुद्रण माध्यम से दूर हुआ उसी तरह चुपचाप समूह लेखन से भी ,,,, जय हिंद !!!

के द्वारा: Charchit Chittransh

ऐसा क्यूँ होता है?,क्योंकि हम सभी सामान्य रूप से बेईमान है और बनावटी जिन्दगी जीते हैं । हम सभी जानते हैं कि जिस धर्म की बात हम सभी करते हैं वह मानव-निर्मित धर्म है अर्थात् प्राकृतिक धर्म नहीं है ।मानव -निर्मित धर्म होने के कारण और इस दिखावटी धर्म को वास्तविकता से अधिक मूल्य देने के कारण ऐसी असमन्जसपूर्ण स्थिति उत्पन्न होती है । समाज में ऐसी जो घटनाएँ कभी कभी घटती है,पूर्व में भी एसा होता रहा है और आगे भी एेसा होता रहेगा,आपत्तियाँ तब भी होती थी और कदाचितत आगे भी होती रहें, शायद न भी हों ।मेरे विचार से आने वाले दिनों में ऐसी घटनाओं पर विरोध स्वतः समाप्त हो जाएगा ।जैसे-जैसे पढ़ाई का स्तर बढ़ता जाएगा, ऐसी समस्याएं समाप्त हो जाएगी ,तब तक के लिए, विशेषकर माँ-बाप एवं अभिभावकों को थोड़ा सचेत,जागरूक और खुले दिमाग का होने की आवश्यकता है ।ऐसा होने पर बच्चों को उचित-अनुचित,सही-ग़लत की जानकारी उम्र के साथ-साथ अपने आप मिलती रहेगी ।आशापूर्वक प्रयास ही हम सभी के हाथ में है और इसे ही करने की सोचनी चााहिए । सही दिशा में सोचने और करने वाले की सहायता ईश्वर भी करते हैं ।

के द्वारा: Jagdeesh

"आज आम समाज के लडके लडकियां समजदार हो गए हैं । अगर पेम करना हो तो भी केल्क्युलेटर ले के बैठ जाते हैं । सब गीना जाता है । अगर टोटल बराबर बैठता है तब ही आगे की बात होती है" भरोडिया जी, आपने प्रेम की नहीं, बिजनेस के बात की है जहाँ पर हानि लाभ को कल्कुलैत करने के बाद ......................, प्रेम की स्वाभिकता ही ख़त्म जो जाती है इससे, और इस तरह के कदम ( प्रेम में पड़ना या शादी करना) केवल ना समझ ही नहीं करते बल्कि व्यक्स्त, समझदार और समाज में अपना नाम रखने वाले भी करते हैं, अंतर ये है की अगर वो शक्ति शाली है तो वही समाज अपनी पूछ दबा कर बैठ जाता है और अगर निर्दन हो तो .............. आभारी हूँ आपकी प्रतिक्रिया के लिए और आगे भी आपसे सदा अपने विचारो से अवगत कराते रहेने का अनुरोध है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

के द्वारा: abodhbaalak

प्रेम तो कुदरत की देन है, भाई । लेकिन कुदरत की ऐसी बहुत सी देन है, सबको फोलो नही कर सकते । अगर माना जाए की लोक शाही है तो आदमी अगर चाहता है की वो कुदरत की दी हुई हर व्रुत्ति को जीना चाहता है तो फीर से पाषाण्युग में जाना पड जाता है । वासना, आकर्षण या प्रेम सब एक ही है । क्षणिक या लंबा हो सकता है । ये तो हर सामान्य आदमी को हो जाता है । लेकिन वो बोलता या कोइ हरकत नही करता , वो जानता है ईस का कोइ मतलब नही । वो जानता है उसे समाज के बने टेंप्लेट में ही रहना है, बाहर गया तो फाईल करप्ट हो जाती है । मैने बात कही वो आम लोगों की कही आप सब बात कह रहे हो वो अपवाद की बातें है । नासमजी में, अनजाने में या विद्रोह की वजह से ऐसी घटनाये हो जाती है लेकिन पूरे समाज की तुलना मे बहुत ही कम संख्या मे होता है । आज आम समाज के लडके लडकियां समजदार हो गए हैं । अगर पेम करना हो तो भी केल्क्युलेटर ले के बैठ जाते हैं । सब गीना जाता है । अगर टोटल बराबर बैठता है तब ही आगे की बात होती है ।

के द्वारा: bharodiya

धन्यवाद आपकी प्रतिक्रिया के लिए दिवा जी. परिपक्व सोच है आपकी, और निसंदेह आपने जो कहा है वो काफी हद तक ठीक भी है, प्यार सोच के नहीं होता ये आपने भी माना है, और अगर मान ले की आपके घर वाले आपकी शादी करने के लिए तुल जाएँ की तुम्हे उसके साथ शादी करनी ही है और आप नहीं चाहते तो आपके पास दूसरा क्या रास्ता है? या ये के आप उनकी बात मान ले और उससे शादी कर लें, या अड़ जाएँ के नहीं करना, या ये के अपनी जान दे दें और या ये के भाग जाएँ, अब ये निर्भर करता है की प्यार का स्तर, प्यार करने वाली की सोच, उसकी इच्छा शक्ति और ...................... बहुत सरे लोगो ने कहा है की प्यार पाना ही नहीं है, और अगर विरह भी मिले तो ..........., पता नहीं अब क्या कहें, और क्या समझे,

के द्वारा: abodhbaalak

प्यार में मिलन ही हो ये जरुरी तो नहीं | प्यार पा लेने का नाम नहीं होता | त्याग समर्पण और विश्वास मिल कर ही प्यार बनता है | अपने माँ बाप परिवार कि इज्जत ताक में रख कर प्यार को पाने का जो ये कदम है जिसे भाग जाना बोलते है मेरे हिसाब से तो सबसे गलत कदम है और फिर ये कैसा प्यार जिसमे अपनी, अपने परिवार कि इज्जत कि धज्जियाँ उड़ा दी फिर लड़के के ऊपर इल्जाम भी लगा दिया जाये ये कोरी भावनाये है जो लड़के के साथ है तो उसके लिए परिवार के साथ है तो उसके लिए अगर उस लड़की को सच में प्यार होता तो न तो वो अपने परिवार कि रुसवाई ही करती न अपने प्यार कि | प्यार सोच के नहीं किया जाता मगर प्यार हो जाने के बाद भी सोचा न जाये कि अपने प्यार कि रुसवाई किजाए है या समझ से प्यार को जीता जाये ये तो प्यार करने वालो के ऊपर है | मेरे साथ कॉलेज में एक लड़की थी जो किसी विजातीय लड़के से प्यार करती थी वो दोनों जानते थे कि घर वाले उनके प्यार को स्वीकार नहीं करेंगे मगर प्यार सोची समझी नीति तो है नहीं | मगर प्यार हो जाने के बाद दोनों ने ऐसा कुछ कदम नहीं उठाया बल्कि समझ से काम लिया लड़की आज नेशनल बैंक में पी ओ है और आज भी वो इस इंतजार में है कि घर वाले इस रिश्ते को काबुल करे कोई जल्दी नहीं प्यार है तो है बस उसी प्यार में एक ताकत के साथ खुशी के साथ जी रहे है |

के द्वारा: div81

अबोध जी नमस्कार ये कहानी आजकल हर किसी की प्रेम कहानी हो गयी है .. जाट पट की समस्या भी न हो तो भी जब दो प्यार करने वाले या यु खाइए की एक दुसरे के आकर्षण में पड़कर जब दो जन भाग जाते है तो अंत यही होता है ... इन कहनियों में अक्सर ये भी देखने को मिलता है की इस तरह के केस में दोनों ज्यदा समझदार नहीं होते अभी पढ़ रहे होते है .. यु कहिये की जवानी का नया जोश फिल्मो का असर और वास्तविकता से बहुत दूर के सपने ... काश के लोग समझे की प्यार क्या है ? सिर्फ पाना ही सब कुछ नहीं होता ... घर से भाग कर प्यार को पाना और जो घर में सब बचपन से प्यार करते है उस प्यार का क्या ... अंतहीन बाते है ये इनका कोई हल नहीं .. जानते हुए की भी कुछ गलत हो रहा है हम दिल के हाथों मजबूर होकर गलत कर देते है और बाद मे बदनामी , मौत या फिर सिर्फ पछतावा रह जाता है ...खैर इस बारे मे जितना लिखा जाये कम है .. और यु भी प्रतिक्रिया लेख न बन जाये इसलिए यही अंत करती हूँ बहुत खूब लिखा अपने आभार

के द्वारा: roshni

बहुत सुन्दर लेख. किसी को पाना किसी को खोना, कभी हसना कभी रोना, कभी जागना तो कभी सोना बस यही है इस जहाँ में प्रेम का कोना. प्रेम करने के काबिल यदि सही में कोई है तो वह जिसे कभी कोई हमसे छीन नहीं सकता, जो कभी न रुद्ता है और न ही जिसे मनाने की ही कोई आवशयकता है. जो सदा एक समान रूप से सब पर प्रेम की वर्षा करता रहता है, उस पर कभी समय और काल का असर नहीं पड़ता. मेरे अनुसार मात्र व्ही हमारे प्रेम के काबिल है. यदि औरो में भी हम उसके दर्शन कर उसे प्रेम कर सके तो कभी भी वह प्रेम हमें दुःख और कष्ट न दे सकेगा. अबोध जी यह सब मात्र फिलोसोफी नहीं है, यह सत्य है और इसे स्वयं आजमा कर महसूस किया जा सकता है. और यह प्रेम ही शास्वत सत्य है.

के द्वारा: Amar Singh

प्रिय अबोध भाई ...... नमस्कारम ! आप तो इस बात को जानते ही है की मैं खुदा का बेटा हूँ ..... हर रोज मेरी नई -२ जरूरते होती है –नई -२ इच्छाए होती है ..... मैं भगवान से यह अपेक्षा+आशा रखता हूँ की वोह मेरे प्रति अपना पिता वाला फर्ज निभाए ..... जो वोह बिना मांगे देता है + मेरा माँगा हुआ देता है अगर मैं उससे संतुष्ट नहीं हुआ तो उससे और मांगता हूँ + दुबारा मांगता हूँ + बार बार मांगता हूँ ..... अगर वोह दे देता है तो ठीक अगर नहीं देता तो मेरी मांग यथावत रहती है .....इस प्रार्थना के साथ आपने जो सशर्त देने की कोशिश की थी उसको मैं अपनी कमियों की वजह से ग्रहण नहीं कर पाया .... मुझ पर ऐसी किरपा करे की अगली बार ऐसी गलती न हो .... लेकिन एक ही गलती बार बार हो रही है हर बार हो रही है ..... खैर यह हमारा आपसी मामला है ..... हा हा हा हा हा हा :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma

अबोध जी, धर्म व धार्मिकता की परिभाषा को जानने समझने के लिए ग्रन्थ, अनुभव व अनुभूति की महान आवश्यकता पड़ेगी. भारतीय सन्दर्भ में धर्म का स्वरुप लक्षण व उद्देश्य अन्य दर्शनों से पूर्णतः भिन्न है, मैं दार्शनिक अथवा शास्त्रीय विवेचन में नहीं जाना चाहूँगा टिप्पड़ी दीर्घ हो जाएगी, किन्तु आप जिस धर्म की बात कर रहे हैं वह वस्तुतः योग व साधना है जिसका पालन लोक में साधारण नहीं, निष्कामता की हम बात तो कर सकते हैं किन्तु प्राप्ति व पालन सुलभता से करतलगत नहीं है. यदि लेन देन व भय के विचार का प्रश्न है तो भय से मर्यादित रहना निर्भय उद्दंडता से श्रेष्ठ है व व्यवहारिक भी, सामान्य धर्म यही है ऐसा मेरा विचार है.

के द्वारा: vasudev tripathi

अबोध जी नमस्कार, धार्मिक होने का अर्थ ये नहीं की हमेशा ही पूजा पाठ में लीन रहे . मेरे हिसाब से अगर हर मनुष्य अपने हर फ़र्ज़ को कायदे से निभाए चाहे वो उसके अपने माँ बाप की तरफ हो , चाहे उसके अपने बच्चों की तरफ हो , चाहे उसके अपने आस पडौस की तरफ हो , चाहे समाज की तरफ हो , चाहे देश की तरफ हो तो मेरे विचार में वह इंसान धार्मिक है वो नहीं जो चार टाइम पूजा करे और अपने एक भी फ़र्ज़ अछे से ना निभाए . आज हमारे देश में वृधा आश्रम बढ़ते जा रहे हैं क्यूंकि बच्चे अपना फ़र्ज़(धर्म) नहीं निभा रहे हैं , देश में भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है क्यूंकि उसके नागरिक अपना फ़र्ज़(धर्म) भूल गए हैं ....... हम धार्मिक तभी होंगे जब हम अपने सरे फ़र्ज़ निभाए ... धन्यवाद...

के द्वारा: mparveen

के द्वारा: Santosh Kumar

आदरणीय अबोध जी नमस्कार, मै नहीं समझ सका की कैसे धर्म और डर का तालमेल हो गया. धर्म तो एक ही था मानवता का. अब उसको बचाने के लिए मायावती जी जैसे किसी धर्म प्रधान ने उसके टुकडे कर दिए. आप देख सकते हैं कोई भी धर्म मानवता के खिलाफ जाने की बात नहीं कहता सभी धर्म मानवता को प्राथमिकता देते हैं हाँ होता कुछ और ही है क्योंकि कोई ठीक से समझा नहीं सका. जहां तक बात इश्वर भक्ति की है तो साहब यकीं मानिये की यदि इश्वर बोलता होता तो इश्वर के भक्त ढूंढने से भी नहीं मिलते. हम तो हमेशा यही मानते हैं की इश्वर सदा सबका भला ही करता है.यदि ये सत्य है तो उस बच्चे से पूछिये जो माता पिता के साथ भगवान् के दर्शन करने निकला था और रास्ते में दुर्घटना में वह अनाथ हो गया.चलो और अधिक नहीं कहता वरना लोग मुझे अधर्मी कहने लगेंगे. आपने सही लिखा है लोग स्वार्थी हो गए हैं और यही उनका परम धर्म है.धन्यवाद.

के द्वारा: akraktale

धार्मिक होने के लिए लेन देन का रिश्ता, मेरी समझ से तो सही नहीं है, ये तो सौदा है न कि.. प्रिय अबोध जी हम बड़े स्वार्थी हैं और बिना कुछ स्वार्थ के न कुछ मानते हैं और न करते हैं ..इस लिए समाज को एक अच्छी दिशा में बाँध कर रखने के लिए हमने कुछ न कुछ तरीके ईजाद किये और अपनी अच्छी बातों को मनवाने के लिए ईश्वर का भय दिखा उसे धर्म से जोड़ दिया गया ..बहुत सारी काम की बाते लोग जो किसी से भी नहीं डरते इस कारण कर जाते हैं ..आप ने देखा होगा किसी बच्चे को दूध पिलाने में कितनी जद्दो जहद ..हम डराते हैं पी लो नहीं बिल्ली आ जाएगी ..शेर आ जायेगा ..नहीं तो पी लोगे तो चंदा मामा आयेंगे वे तुम्हे दुलारायेंगे ..बहुत कुछ ऐसे ही ..जैसे आक्सीजन के लिए पीपल के पेड़ में देवी देवता ..नीम के गुण के लिए ..नीम में शिव जी ...बहुत कुछ ..... धर्म से जुड़ जाने पर हम कुछ समय तो अच्छा करने ही लगते हैं ...खुराफाती हो भी ... और जो आप ने उस परम पिता परमेश्वर के विषय में कही वो तो शत प्रतिशत सत्य है ..बिना किसी मांग के पूजा करें तो बात ही निराली है ..पूजा और धर्म थोडा अलग हुआ न ? भ्रमर

के द्वारा: surendra shukla bhramar5

अबोधभाई नमस्ते आपने बहुत से हथियार के बारेमें जानते होन्गे । धर्म भी एक हथियार ही है । ये हथियार हाथ में आने के बाद ही राजाओ ने चैन की सांस ली थी । आज भी आप देखते हो ना ईस का कैसे उपयोग किया जाता है । कीसी भी स्थल का ऍड्रेस होता है । लेकिन ऐसा जादू किया गया की लोग पूछना ही भूल गये स्वर्ग किधर है नर्क किधर है । ईसलिये तो मुकेश साहब राज कपूर के लिये गाया था----स्वर्ग यहां नर्क यहां ईसके सिवा जाना कहां --- ऍड्रेस होता तो लोग कब से स्पेस शटल उडा के पहुन्च गये होते । सत्य एक ही होता है, जो चीज होती है वो होती ही है, उसे ढुंढा जा सकता है और जो नही है वो नही है । दिमाग में ठुस दो की स्वर्ग है तो वो हो नही जाता । आप सिर्फ १४ धर्म के चीत्र दे पाये । हकिकत में आज दुनिया मे ४३४८ धर्म है । ईस लिन्क से आप पूरा लिस्ट डाउनलोड कर सकते हैं, एक्सल फाईल में । http://www.4shared.com/dir/-P7kfEeH/ForShare.html जाहिर है सब धर्म के अपने अपने भगवान होन्गे, ईतने सारे भगवान आप के सर पर नाचने लगे तो आप क्या करोगे । ईन सबको छोड कर सीधे कुदरत को ही पकडोगे । और कुदरत न किस की सुनता है न सुनेगा ।

के द्वारा: bharodiya

डॉ साहब नमस्कार आपने धर्म के उदय की बात में होगा होगा लिखा है, लेकिन ये हुआ ही है । और वो सब राजधर्म की तहत हुआ है । वर्तमान में मानव बुद्धि की बात करें तो मैने एक जगह कहा था - ईतिहास के सबसे बडे रुषिमुनी से अधिक ज्ञान आज के एक आम प्रोफेसर के पास होता है । ये बात लोगो को हजम नही हुई थी । धार्मिकता,पूराना वही सोना, ये सोच आदमी के डी.एन.ए मे घुस गई है । बायोलोजीकली आदमी का दिमाग विकसित हो गया है साथ साथ आज हमारे पास पूरे विश्व के देशों के ज्ञानियो का ज्ञान उपलब्ध है । ये कलेक्टिव ज्ञान ही ज्ञान होता है, कोइ भी व्यक्ति के ज्ञान से उपर है, भले महात्मा गान्धी भी क्यो न हो । आज का आदमी जानता है मानता है फीर भी उसका उसका डी.एन.ए उसकी टांग खिच के धार्मिकता की और ले जाता है ।

के द्वारा: bharodiya

आदरणीय अबोधबालक जी, सादर. मेरे विचार से सभ्यता विकसित होने की प्रारंभिक अवस्था में ही सामाजिक व्यवस्था को शांतिपूर्ण तरीके से अनुशासित रखने के लिए "धर्म" शब्द का आविष्कार और उसका निरूपण किया गया होगा. तत्कालीन समय में इसे एक भयकारी और वजनदार रूप देकर एक अदृश्य शक्ति से जोड़ दिया गया होगा, जिससे भयभीत होकर समाज में शान्ति और सहजता बनी रहे. "भय" जो प्राणी मात्र के स्वभाव में अविछिन्न रूप से मौजूद है, इसी का सहारा लेकर यह धर्म और उसकी भावना को निरूपित किया गया होगा. यह उस समय की आचार संहिता भी होगी. वर्तमान में मानव बुद्धि उस समय से सहस्त्र्गुना विकसित रूप में है. वह तर्क कुशल हो गई है. इसी वजह से आज धर्म का वह रूप नहीं है, जो उस समय था. आज धार्मिक अनुष्ठान औपचारिक हो गए हैं, और इसमें डर कम , लालच का अधिक समावेश हो गया है. सोचने को मजबूर करने वाली रचना. बहुत धन्यवाद.

के द्वारा: shashibhushan1959

अबोधभाई नमस्कार सी.एन.जी (सिगरेट का धुआं) पर चलनेवाली गड्डी में जो नुकसान होता है वो नीचे वाजपाईभाई ने अच्छी तरह बताया है । सी.एन.जी से गाडी चलाने मे मजा आता है या टेण्शन दूर होता है ये भ्रम है, आदत हो जाती है वो भी भ्रम ही है । आदत नही एक जरूरत बन जाती है । आदत छुट सकती है जरूरत नही । गड्डी का दो प्रकार है । एक में जीतना भी सी.एन.जी डालते रहो उस का गियर ऐसा होता है के वो सी.एन.जी को ध्यान में नही लेता, अपना पूरानावाला काम किये जाता है । ऐसी गड्डी सी.एन.जी आसानी से छोड सकती है । दूसरी मे गियर सी.एन.जी के आधार पर चलने लगता है । सी.एन.जी नही मिलने से गड्डी रूक जाती है । छोडने के लिये कितने भी कसमे-वादे करवाओ वादे तो वादे ही रहते है ।

के द्वारा: bharodiya

आदरणीय भ्रमर जी ….. सादर प्रणाम ! आपसे एक विनम्र निवेदन है की या तो लड़किया (अनछुई कलिया) दो देखना और अगर एक ही हो तो उसको मेरी तरफ से हमारे शादी के लायक +बेसब्र अबोध बालक जी को गिफ्ट कर देना क्योंकि उन्होंने सन्नी लियोन पर मेरे हक में अपना दावा छोड़ा था ….. हा हा हा हा हा हा हा जय श्री राधेकृष्ण surendra shukla bhramar5 के द्वारा December 1, 2011 प्रिय राज भाई वैसे तो आप जानते हैं की केवल एक दो नहीं भौंरे तो न जाने कितनी कलियों को चुन चुन सुन्दरता को चाहने वालों -आशिको तक सन्देश पहुंचा देते हैं …वैसे रही प्यारे अबोध जी की बात तो वे बड़ी मुश्किल से तो सामने आते हैं बड़े दिनों बाद अब कलियों फूलों के चक्कर में पड़े तो न जाने और कितना छुप जाएँ … ह हा….. वैसे आप कहे हैं तो उनके पास जाऊंगा …देखता हूँ उनका मन आज कल कैसा है …. एक प्रश्न आप से गुप्त रूप से पूछना चाहता हूँ ये फिल्म उतनी क्यों नहीं चली जिस पर आप कई बार आये ? जब अधर छुए तो तन मन कांपा ............आप की नजर ? जय श्री राधे भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5

अबोध जी, घूम्रपान के बारे में लिख कर आपने सराहनीय कार्य किया है। आप तो इस दुष्‍प्रवृत्ति दूर रहे हैं , लेकिन मैंने 25-26 साल अंधाधुध सिगरेट पी है। कुछ अनुभव जन्‍य निवेदन-‍ - धूम्रपान शरीर को ऐसे खोखला करता है जैसे घुन लकडी को। स्‍टैमिना कमजोर हो जाता है। -गले की खराबी ,पाचन  तंत्र कमजोर हो जाना, फेफडे कमजोर होजाने पूरी सांस न ले पाना, चलने-सीढी चढने में सांस फूलने लगना, ठीक से नींद न आना,रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाना, सर्दी-गर्मी ज्‍यादा लगना, ठंठ और ठंठी चीजों से एलर्जी हो जाना, आये दिन कफ-खांसी से दोचार होना, मानसिक एकाग्रता में कमी और स्‍वभाव का चिडचिडा हो जाना  जैसी अन्‍यान्‍य कई बीमारियां धूम्रपान की सीध देन होती हैं।आसपास रहने वाले को, बीबी-बच्‍चों को बिना पिये नुकसान पहुंचता है। - लत लग जाने के बाद छोडना कठिन होता है। सामान्‍यत: हार्ट अटैक वगैरह के बाद ही लोग छोड पाते हैं। धीरे धीरे की अपेक्षा एक बार में झटके से दृढ संकल्‍प पर छूटती है। धीरे धीरे यह लत नहीं छूट पाती। -धूम्रपान के साथ शराब वगैरह की भी आदत है तो करैला नीम चढा हो जाता है।  शोबाजी के अलावा फायदा एक भी नहीं है। नुकसान ही नुकसान है।  -नियमित दिनचर्या है और साफ हवा में ब्‍यायाम-प्राणायाम आदि करते हैं तो 24 घंटे में चार -पांच सिगरेट तक पी  जा सकती है। दुष्‍प्रभाव प्राय: नहीं होंगे। लेकिन , वह भी सुबह और खाली पेट नहीं । -

के द्वारा: sdvajpayee

आदणीय अबोध जी, नमस्कार.. बहुत दिनों के बाद इस मंच पे नज़र आये आप..बहुत ही गंभीर मुदद्दे के ऊपर एक अच्छी रचना..धूम्रपान इंसान को अंदर से धीरे-धीरे खोखला कर देती है और जब तक इंसान ये बात जान पाता है तब तक..... इन पंक्तियों से इस गंभीर लेख को आपने हास्य भी प्रदान किया ही है.. `` मुझे पढने को मिले के जो धूम्रपान करेगा उसके घर में चोर नहीं आयेंगे क्योंकि वो सारी रात खांसते खांसते बीतायेगा और चोर समझेगा कि ये …….., वैसे ही कुत्ते उससे दूर रहेगे क्योंकि वो धूम्रपान के कारण इतना कमज़ोर हो जायेगा कि उसको चलने के लिए लाठी का सहारा लेना पड़ेगा और कुत्ते लाठी देख कर दूर" ...... समाज के लिए अच्छा सन्देश देती एक अच्छी रचना..हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाए.. http://paarth.jagranjunction.com/2011/11/16/कमेन्टटेरिया-के-लक्षण-एव

के द्वारा: Paarth Dixit

प्रिय अबोध जी अभिवादन बहुत सुंदर विषय आप का ..सार्थक लेख ..यह देखा जाता है की समाचार में कभी किसी चीज के फायदे गिनाये जाते हैं तो कभी नुक्सान ..प्रक्त्यक्षम किम प्रमाणं ...हमें अपने आस पास समाज में इसका लाभ देख लेना चाहिए उनके मुह के पास थोड़ी देर बैठ उसकी गंध देख लेना चाहिए ..उसका पैसा कैसे चेन स्मोकर होने से जाता है देख लेना चाहिए ...खांसना ...कफ .. सांस फेफड़ा सब स्वतः बता देता है ...अब चाहे वह दिल जला पढ़े या टेंसन दूर करे ..या उसे अच्छा कहे ...उसकी मर्जी .... सुन्दर लेख ... आभार भ्रमर ५ आदत को छोड़ना आसान नहीं है.बहुत मज़बूत इच्छा शक्ति कि आवश्यकता होती है , और इसे एक बार में छोड़ा भी नहीं जाना चाहिए , नहीं तो इसके परिणाम स्वरुप कई दूसरी बीमारियों के होने का पता चला है , इसको छोड़ने के लिए मन में ठान लें , ये सोचे कि इसको छोड़ने से मुझे न केवल शारीरिक लाभ होगा बल्कि आर्थिक रूप से भी इस पैसे का उपयोग

के द्वारा: surendra shukla bhramar5

नीरजा जी सबसे पहले तो आपका आभार, की आपने पहली बार ........... शिकायत तो नहीं है, बस सोचा करता था की आप अपने पोस्ट पर किये गए कमेंट्स के उत्तर तक नहीं देती हैं, और आपके पोस्ट पर किये गए किसी भी कमेंट्स का उत्तर मेरे विचार से किसी को नहीं मिला है, :) चलें आपको ये भी बता देते हैं की किसी भी कमेन्ट का उत्तर देने के लिए कुछ खास नहीं करना पड़ता, केवल आपके पोस्ट पर जो कमेन्ट हैं उसके नीचे रेपली आप्शन हैं, उसे क्लीक कर के हिंगलिश आप्शन को क्लीक करें और अपने कमेन्ट को कमेन्ट बॉक्स में लिख डालें , उसके बाद नीचे दर्शाए गये शब्द को आपने उसके नीचे दिए गए बॉक्स में टाइप करन होगा और फिर सुब्मित पर क्लिक कर दें बस हो गे. :) एक बार फिर से आपका धय्न्वाद, आगे भी ल........... http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

के द्वारा: abodhbaalak

के द्वारा: pramod kumar Yadav

के द्वारा: abhishek singh

आदरणीय शाही जी, संतोष जी, और भरोडिया जी आप सब का आभार, की आपने सबने इस विषय पर अपने अपने विचार को ............ मैंने पहले ही कहा की लेख का टोपिक गद्दाफी नहीं है बल्कि हमारा आचरण है जो की समय समय पर हम ........... गद्दाफी achchha था या बुरा मुझे उस से कोई फर्क नहीं पड़ता, पर अगर ये तथ्य सच हैं तो यही कहा जा सकता है के "क्योंकि वेस्टर्न देश नहीं चाहते थे की वो शासन करे इस लिए ......" रही बात ये की वो बुरा था और उसने घोर पाप किये, मह्लियाओं पर अत्याचार किये.... और न जाने क्या क्या, " तो मेरे भाई, जरा हामारे देश में भी देख लो, छोटे छोटे नेता के ऊपर कितने केसेस होते हैं, जिसे चाह उठा लिया, जिसे चाह .................., क्या उनके साथ भी हमारे देश में भी ऐसा होना चाहिए............... लोगो का पैसा खा खा कर नेता अरबपति हो रहे हिं................... मत्रियुओं के साथ पुश्ते न भी कामये तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता, के या हमारे ऊपर ज़ुल्म नहीं है? क्या इसके लिए हम भी उन्हें दौड़ा दौड़ा कर ................ आप सब के इस डिस्कशन से मुझे भी बहुत सारी बातें ऐसें पता चली जो की मई नहीं जानता था .............. आभार आप सबका, http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

के द्वारा: abodhbaalak

अबोधभाई , शाही जी, सन्तोष्भाई हम सब नेगेटिव साईड ही जानते है । और हर तानाशाह की नेगेटिव साईड होती है । तानाशाह जबतक अच्छा होता है जनता सुखी होती है । जनता को और क्या चाहिये । ये परिस्थिती लोकशाही से भी अच्छी होती है । तनाशाह जनता को परेशान नही करता विरोधियों को मार देता है । यहां तक तो बच जाता लेकिन वो खूद ऐयाश बन जाता है, पैसे हजम करने लगता है तब मुश्किल मे पड जाता है । यही हुआ दग्गाफी के साथ । मैं यहां एक आएटिकल पेस्ट कर रहा हुं , जो उस की पोजिटिव साईड दिखाती है। लिबिया में लडाई के समय भारत की एक प्रोफेसर बहन थी वहां पर उसने लिखा है । मेरे पास लिन्क नही था आर्टिकल था । --------------------------------------------------------------- पूरे लीबिया में फैले असंतोष और धमाकों के बीच कहीं कोई लूटपाट या अभद्रता नहीं हुई, आम लोगों के भरोसे पूरी तरह महफूज थे भारतीय। लीबिया से हाल ही में लौटी डॉ. अंजना तिवारी ने बताएं वहां के हालात। भोपाल। फरवरी 2011 में इजिप्ट में फैली बदलाव की आग से लीबिया में भी विद्रोह लपटें भड़क गईं। शुरु में जब मैंने अशांति की बातें सुनी तो इन्हें कोरी अफवाह समझा क्योंकि अब तक लीबिया में रहते-रहते मुझे 3 साल से अधिक हो चुके थे और मैंने वहां के लोगों को बेहद सुकून में रहते देखा था। फरवरी के आखिर तक मैंने बेंगाजी की सड़कों पर हजारों लोगों को हाथों में हथियार लिए विरोध के नारे बुलंद करते हुए देखा तो खुद को यह यकीन दिलाना पड़ा कि अब हालात पहले जैसे नहीं रहे। मार्च की शुरुआत तक तो भूमध्य सागर के किनारे बसा यह खूबसूरत देश पूरी तरह सुलग उठा। बदलाव की चिंगारी को दबाने के कर्नल गद्दाफी के प्रयासों ने इसे और ज्यादा भड़का दिया था और जब मैं वापस भारत लौट रही थी। मेरे मन में बस एक ही सवाल उठ रहा था इस बेहद खूबसूरत देश ऐसा कहर क्यों बरपा है। इस देश में जहां न खाने की दिक्कत है न रहने की कोई समस्या। जहां के लोग शायद दुनिया के सबसे भोले लोगों में से एक हैं। जहां आप रात में भी हजारों दीनार लेकर अकेले घर आ सकते हैं। जहां के लोग अपने मेहमान को बड़ा ऊंचा दर्जा देते हैं, आखिर उस देश में ऐसा क्यों हो रहा है? आप के लिए जान पर खेल जाएंगे हम ... फरवरी के अंतिम सप्ताह में हमने लीबिया छोड़ने की तैयारी शुरु की। स्थानीय परिचित लोगों ने हमे रोकने का हरसंभव प्रयास किया। वो बार-बार यही कहते रहे कि आप लोगों को कोई खतरा नहीं होगा। हम अपने भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन अपनी जान पर खेलकर भी आपकी हिफाजत करेंगे। वो बार-बार कहते कि आपकी सरकार वापस बुला रही है तो चले जाइये लेकिन हम चाहते हैं कि आप लोग यहीं रहे। 28 फरवरी की शाम को जब हम लीबिया छोड़ रहे थे तो वहां के लोगों की आंखे नम थी। मेरे साथी स्थानीय प्रोफेसरों और शिक्षकों ने लीबिया में जो हुआ उसके लिए माफी मांगी और यह विश्वास जताया कि जल्द ही सबकुछ सामान्य हो जाएगा। लेकिन बेहद बेमन से अपने दोनों बच्चों के साथ उसी शाम मैं जितना हो सकता था सामान लेकर जहाज पर चढ़ी। जहाज पर हम सभी के पास अपनी कमाई थी, कीमती चीजों थीं लेकिन लूटमार तो दूर, किसी ने पूछा भी नहीं कि आप क्या ले जा रहे हैं। भारत सरकार ने वापसी के लिए अच्छा इंतजाम किया था। हम एक मार्च की सुबह बेंगाजी से इजिप्ट के एलेक्जेंड्रिया के लिए चले। ढाई दिन बाद एलेक्जेंड्रिया पहुंचे। चार मार्च को एयरइंडिया की फ्लाइट की हमें दिल्ली ले आई। मैं वापस हिंदुस्तान पहुंच चुकी थी। मैं उस खूबसूरत देश को जलता छोड़ आई थी जहां मेरे ढेर सारे छात्र भविष्य में चमकने की तैयारी कर रहे थे। लौटते वक्त मुझे उनकी चिंता थी। वहां के भोले-भाले लोगों की चिंता थी। जो शायद दुनियादारी के लिए जरूरी उतना कपट नहीं जानते। आज जब हिंदुस्तान में मैं लीबिया पर पश्चिमी सेनाओं के हमले के बारे में पढ़ती हूं तो बस यही ख्याल आता है कि वहां के लोग मानवाधिकारों के नाम पर किए जा रहे इन हमलों की अंतर्कथा को उसी शिद्दत से समझ पा रहे होंगे। बस यही दुआ है कि यह खूबसूरत देश बर्बाद न हो। लोगों में वही जिंदादिली बरकरार रहे। धमाके होते रहे पर कभी नहीं लगा डर... मैं बेंगाजी के पॉश इलाके में पांचवी मंजिल पर किराए के मकान में रहती थी। मैंने और मेरे दोनों बच्चों ने बेंगाजी की सड़कों पर गुजरते गद्दाफी की सेनाओं के टैंकों को अपनी बालकनी से देखा। हम पूरे दिन विरोध प्रदर्शन देखते रहे। हमने देखा कि गद्दाफी के सैनिक विद्रोहियों को प्यार से मनाने का प्रयास कर रहे थे। शुरू में उन्होंने समझाने की कोशिशें की लेकिन बाद में वो हिंसक हो गए। हमने गोलियों की गूंज सुनी। फिर धमाकों की आवाजें सुनी लेकिन कभी डर नहीं लगा। क्योंकि मेरी मकान मालकिन हमेशा यह विश्वास दिलाती थी कि वो अपनी जान की बाजी लगाकर भी हमें कुछ नहीं होने देंगी। संघर्ष के दिनों में स्थानीय लोग हमेशा मदद को तैयार थे। जब हवाई हमले हो रहे थे तब मुझसे बार-बार कहा जा रहा था कि मैं बच्चों के साथ नीचे वाले फ्लैट में शिफ्ट हो जाऊं। यह उनका भरोसा ही था कि गोलियों और धमाके के बीच भी मैं हम खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे थे। सिर्फ बदलाव के लिए विद्रोह... लीबिया में रहते हुए मैंने कभी भी गद्दाफी के विरोध में कुछ नहीं सुना। इसके दो बड़े कारण हैं एक तो यह कि गद्दाफी बेहद शक्तिशाली हैं और उन्होंने कभी अपने खिलाफ किसी आवाज को उठने ही नहीं दिया और दूसरी यह कि वहां के लोगों की कोई भी ऐसी आवश्यकता नहीं है जिसे सरकार पूरा न करती हो। घर, खाना, पढ़ाई, स्वास्थ्य सेवाओं के साथ ही सरकार देश की आय का एक निश्चित हिस्सा लोगों में बांटती हैं। यहां के लोगों को किसी भी चीज की कमी नहीं थी। लेकिन जब विद्रोह हुआ तो उसके समर्थन में आवाजें उठने लगीं। लीबिया के लोगों ने कभी भी लोकतांत्रिक आजादी को महसूस नहीं किया था। वो खुलकर बोल नहीं सकते थे। गद्दाफी जो फैसला लेते वो सबको स्वीकार करना होता। मैंने बेंगाजी की दीवारों पर बदलाव के नारे लिखे देखे। विद्रोह और उसका समर्थन कर रहे लोगों ने विद्रोह की सिर्फ एक ही बड़ी वजह बताई और वो यह थी कि लोग अब बदलाव चाहते थे। वो सरकारी फैसलों में खुद को शामिल करना चाहते थे। वो गद्दाफी के फैसलों को मानने के बजाए अपनी बात भी रखना चाहते थे। वो अपने हुक्मरानों को चुनने का अधिकार चाहते थे। बदलाव की चाहत ही वहां के लोगों के विद्रोह की बड़ी वजह थी। जो लोग पहले खामोश थे उन्होंने भी विद्रोह की आवाज में सुर मिला लिया था। मेरी मकान मालिक की बेटी जिसे मैंने कभी भी गद्दाफी के खिलाफ बोलते नहीं सुना था वो भी अब विद्रोहियों के समर्थन में बातें कर रही थी। मॉडर्न मुस्लिम राष्ट्र है लीबिया... लगभग तीन बरस पहले जब मैं यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के लिए लीबिया जा रही थी तो मेरे मन में यही डर था कि यह एक रूढ़िवादी मुस्लिम देश होगा, जहां महिलाओं को घरों में कैद रखा जाता होगा। लेकिन जब में वहां पहुंची तो स्थिति को बिल्कुल ही अलग पाया। लीबिया में महिलाएं पुरुषों से समान आजाद हैं। बैंकों, अस्पतालों, क़ॉलेजों में काम करने वाले कर्मचारियों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से कहीं ज्यादा हैं। शायद ही कोई काम ऐसा होगा जिसमें महिलाएं सेवाएं न देती हों। बस इतना सा फर्क है कि वो जहां भी होती हैं पर्दे का ख्याल रखती हैं। वो बुर्के में बंद नहीं रहती, सिर पर स्कार्फ बांधती हैं। किसी भी अन्य मुस्लिम राष्ट्र की तरह यहां भी महिलाएं पुरुषों से दूरी बनाए रखती हैं। लेकिन वो घर में कैद नहीं रहती। वो देश को चलाने में बराबरी से योगदान देती हैं। कबीलों में बंटा हैं लीबिया... लीबिया का समाज कई कबीलों में बंटा है जिसमें सबसे ताकतवर कबीला गद्दाफी का है। 1969 में लीबिया के शासन पर कब्जे के बाद से ही गद्दाफी ने तमाम महत्वपूर्ण पदों पर अपने कबीलें के लोगों की भर्ती की। गद्दाफी का कबीला ताकतवर होता गया। गद्दाफी के कबीले की बढ़ती ताकत बाकी कबीलों में असंतोष पैदा करने लगी लेकिन गद्दाफी ने देश को इस तरह से शासित किया कि किसी ने भी उनके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश नहीं की। यहां तक कि गद्दाफी ने देश की सेना को भी कमजोर ही रखा और सुरक्षा की कमान अपने कबीले के लोगों के हाथ में दी। विद्रोह का मुख्य कारण अन्य कबीलों के लोगों में व्याप्त असंतोष ही है। बेहद खूबसूरत देश है लीबिया... आमतौर पर लीबिया को रेगिस्तान समझा जाता है। लीबिया का एक बड़ा इलाका रेगिस्तान ही है लेकिन ज्यादातर आबादी शहरों में रहती है। बेंगाजी और त्रिपोली में ही लगभग आधी आबादी रहती है। यहां का मौसम बेहद खुशनुमा है। सर्दियां जनवरी के दूसरे पखवाड़े में शुरु होती हैं और फरवरी का अंत आते-आते चली जाती हैं। गर्मी कभी भी इतनी नहीं पड़ती की पंखा चलाना पड़े। साल के 12 महिने रातों में हल्की सर्दी पड़ती है और आप बिना चादर ओढ़े नहीं सो सकते। लीबिया के शहरों को नए तरीके से बसाया गया है। सबकुछ बेहद व्यवस्थित है। लीबिया में आपको ऐसा नहीं लगता कि आप अफ्रीका में हैं। बिलकुल नहीं होते हैं अपराध... लीबिया के लोगों में एक चीज है जो समान रूप से पाई जाती हैं और वो हैं उनका भोलापन। आप कहीं भी जाइये आपको बेहद सच्चे, सीधे और सरल लोग मिलेंगे। वो कोई दिखावा नहीं करते हैं। पड़ोसी भी पड़ोसियों की बुराई नहीं करते। अपराध की दर वहां जीरो फीसदी से भी कम है। दो सालों में मैंने लूटमार की कोई वारदात नहीं सुनी। मैं अमेरिका, ब्रिटेन, मिस्त्र, जार्डन और दुनिया के अन्य कई मुल्कों में गई हूं लेकिन लीबिया जैसे सरल और भोले लोग मैंने कहीं नहीं देखे। भारतीयों का करते हैं बेहद सम्मान... लीबिया में भारत के लोगों को सम्मान की नजर से देखा जाता है। वहां अन्य मुल्कों के भी लोग हैं लेकिन जितना सम्मान भारत के डॉक्टरों और प्रोफेसरों को मिलता हैं उतना शायद कहीं के लोगों को भी नहीं मिलता। जैसे ही आप वहां के लोगों को बताते हैं कि आप भारत से हैं उनका व्यवहार बेहद सम्माननीय हो जाता है। वो मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। इंग्लिश कम ही लोग बोलते हैं लेकिन जो आपको समझते हैं वो हर संभव तरीके से आपकी मदद करते हैं। (डा. अंजना तिवारी, सर गैरयूनिस यूनिवर्सिटी बेंगाजी (लीबिया) में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

के द्वारा: bharodiya

प्रिय अबोध जी अभिवादन बहुत सही कहा आप ने हमारे अन्दर का शैतान तो जागता है ये सच है अच्छा हुआ की आप ने जो देखा केवल उसी का समर्थन नहीं किया क्योंकि उनके अन्दर का शैतान न जाने कितना जागा और कितने जुल्म ढाए..सुन्दर लेख सच को दर्शाता हुआ ....पहले जानवर बन जाने वाले काश जागें हमारे अन्दर का छिपा हुआ जानवर , समय समय पर बाहर निकलता रहता है , कहीं सड़क पर पुलिस के हाथों बुरी तरह पिट ता हुआ आदमी , तो कभी डंडो के बीच हाथ पैर से लटका हुआ , कहीं सड़क पर चलती लड़की पर तेजाब फेकता तो कभी 1984 के दंगो में ना जाने कितने मासूमो को ……….., तो कभी गोधरा की ट्रेन के मासूम यात्रियों को जलाते हुए , कभी गुजरात के बाकी शहरो में औरतो और बच्चो .. शुक्ल भ्रमर ५

के द्वारा: surendr shukl bhramar5

अबोध जी नमस्कार ! आप केवल नाम के अबोध हैं, लिखते समय तो बहुत ही भावुक हो जाते हैं और कर देते हैं....... ये सही हैं के गद्दाफी के साथ जो हुआ वो गलत है. किन्तु इसी गद्दाफी ने हजारों लोगों को इससे भी ज्यादा बेरहमी से क़त्ल किया और परेशान किया. उन युवतियों के बारे में सोचिये, जिनके साथ इस गंदे आदमी ने गलत काम किया और फिर उन्हें अपने पुत्रों और अपने सैन्य अधिकारियों की जिस्मानी भूख मिटने के लिए उनके सामने दल दिया.... क्या वे रोई, गिडगिड़ायी नहीं होंगी..... जरुर उन्होंने अपनी इज्जत की भीख मांगी होंगी,,, फिर उस राक्षस ने अट्टहास किया होगा और उनको मरने के लिए छोड़ दिया होगा....... इस प्रकार के आततायी को कष्ट उठाते देख कर अगर कोई कम अत्याचारी होगा तो मेरा कम से कम ये मानना है कि ठीक ही हुआ..... क्योंकि वो कोई शरीफ व्यक्ति नही था....... आदित्य www.aditya.jagranjunction.com

के द्वारा: aditya

आदरणीय अबोध जी ,.सादर नमस्कार आदरणीय शाही जी ,.सादर प्रणाम .. ये आंकड़े यदि सच हैं तो मैं भी अभी तक मुगालते में ही था ,..लेकिन यह भी देखना होगा इन अच्छे कामों से पाप कम नहीं हो सकते ,..वो एक तानाशाह था ,..जिसने ना सिर्फ अपनी मनमर्जी की बल्कि महिलाओं का बलात शोषण सहित विरोधिओं की प्रताड़ना और दमन आदि सब कुछ किया ,...कबीलाई संस्कृति में उसके साथ जो हुआ वो मुझे कहीं से भी असामान्य नहीं लगा ,.. . रावण की प्रजा को क्या कष्ट था ?....लेकिन ताकत का अहंकार और इसके फलस्वरूप हुए अनेकों पापो ने उसका समूल नाश कर दिया ,... लीबिया की आम जनता पढ़ी लिखी है ,..संयम के साथ एक मजबूत लोकतंत्र विकसित हो यही अच्छा रहेगा ,......जो गया सो गया ... बाकी इंसान तो जानवर ही है ,..जब उसे अपने या अपनों के अस्तित्व पर खतरा लगता है तो बिना वजह शैतान भी बन जाता है ,....राजनेताओं ने जनभावना का सदैव दोहन ही किया है ,...

के द्वारा: Santosh Kumar

अबोध जी, आप द्वारा उल्लेखित तथ्य यदि आधिकारिक और सत्य हैं, तो मुझे खेद है कि मैं बदनाम गद्दाफ़ी के बारे में शायद आजतक मुग़ालते में रहा हूं । आश्चर्य है कि रामराज्य के सिद्धान्तों से टक्कर लेते गद्दाफ़ी के लोकप्रिय साम्राज्य की चर्चा विश्व में आम क्यों नहीं रह पाई, जबकि पश्चिमी देशों के आकर्षक लगने वाले मामूली से नागरिक अधिकार व सुविधाएं न सिर्फ़ सारा संसार जानता है, बल्कि उन्हीं आकर्षणों की गिरफ़्त में पड़कर दुनिया से श्रम और मेधा का पलायन भी पाश्चात्य देशों की ओर ही होता रहा है । मैं दिग्भ्रमित हो गया हूं, अब पूरी जानकारियों के साथ ही इस विषय पर कोई चर्चा करूंगा । वैसे मेरी प्रतिक्रिया के विचारों को आप गद्दाफ़ी को रिप्लेस कर किसी अन्य आततायी व शोषक तानाशाह शासक के साथ जोड़ कर भी देख सकते हैं । धन्यवाद !

के द्वारा: आर.एन. शाही

आप के लिस्ट्वाली बातें सही है । लिबिया की प्रजा दुनिया में सब से भोली प्रजा है । शरिफ ईतनी है की वहां का क्राईम रेट झिरो है । लडाई के दौरान एक भी दुकान लूटने की घटना नही बनी है । वहा की मुस्लिम औरतें भारत की औरतों की तरह पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करती है । मुस्लिम कानून नही है । गद्दाफी के बाद अब सोचा जा रहा है की शरियत का कानून लगाया जाये । आम जनता को गद्दाफी से कोइ फरियाद नही थी । लेकिन जैसे हमारे यहां जातिवाद है वैसे वहां कबिलावाद है । गद्दाफीने अपने कबिले के लोगों को उच्च स्थान पर लगा दिया और खूद भी ऐयाशियां करने लगा । विरोधी कबिलेवाले ये सब सहन नही कर सके । जनता को भडकाने लगे, भोली जनता जल्दी भडक जाती है । बाकी बात सब के सामने है ।

के द्वारा: bharodiya

अबोध जी सुप्रभात ,,उक्त वाक्य /विचार अरस्तू ही नही कांट स्पिनोजा आदि तमाम दार्शनिकों के थे ,,लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है की इन तमाम दार्शनिकों / दार्शनिक विचारों का उद्भव पन्द्रहवी शताब्दी के बाद ही कैथोलिक धर्माचार्य पॉप के पाखंडों के विरुद्ध हुआ तो इसमें सत्य का इन लोगों ने कितना अन्वेषण किया और विरोधी विचारों को कितना व्यक्त किया यह विचार करने वाली बात है और यह तमाम बुद्धिजीवी पलायन करके इटली में एकत्रित होकर अपने विचारों को व्यक्त कर सके (है न आश्चर्य वाली बात स्वछन्द दर्शन का पलायनी विश्लेषण :) ) तो यह तो क्रिया की प्रतिक्रया हुई न की स्त्युदबोधन यहाँ बुद्धिजीवी के शांत क्रोध का ही प्रस्फुटन हुआ और उस समय भी कोइ नवीन बात नही हुई ध्यान दें श्रीमद भागवत गीता के कुछ बिंदु (यो माँ पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति ,तस्याहं न प्रणस्यामि सच में न प्रणश्यति ,,मत्त परतरः नान्यतिक चिदसति धनन्जय , मयि सर्व मिदं प्रोक्तं सूत्रे मणि गणा इव,, सुवर्णाज्जाय मानस्य सुवर्णत्वं हि निश्चितं ,ब्राह्मणों जायमानस्य ब्रह्मणतव्म च विनिश्चितम ,, इसी तरह के तमाम विचार ईश्वरवादी दृष्टीकोणों के थे तो मुझे तो इसमें कुछ नवीन स्त्योद्घाटन नजर नही आता ,,और जहां तक रही बात पशुवत आचरण की तो आप पशुओं के प्रति पाश्चात्य दृष्टिकोण और भारतीय सोच को देखिए चलिए आम जन की प्रिय रामायण को ही देखिए और इसके आलोक में पशुवों की व्याख्या करिये कहीं भी पशु निंदनीय नही है ,,मानव तो दो ही श्रेणियों में है एक असुर और दूसरा मनुष्य जिसके देवत्व /श्रेष्ठत्व की तरफ अग्रषर होने की भारतीय दर्शन में कामना की गयी है /विचारों के व्यक्त किया गया है /अपनाने के लिए आग्रह किया गया है परन्तु हठ नही :) हाँ तो पन्द्रहवी शताब्दी में भारतीय संस्कृति भी संक्रमण के दौर से गुजर चुकी थी और गुजर भी रही थी तो इसके दर्शन में भी छेड़ छाड़ का प्रयाश किया गया परन्तु आप शरीर को विकृत कर सकते हैं आत्मा को नही और यही आत्मा का अछूतापन अनेक वैदेशिक संस्कृतियों का पोषक भी बना जो की आक्रान्ताओं से अनजाने में हुई भूल जो की उनके लिए वरदान साबित हुई लेकिन यहीं से भारतीय संस्कृति भी दूषित होने लगी ,, और जहां तक बात आचरण की तो विषय विशेष में सुप्त क्रोध का असुरवृत्ति में प्रकट होना कोइ नवीन बात (भारत के सन्दर्भ में ) नही धरती माता भी जिसकी उष्णता सदा जीवन का संचार करती है अति होने पर अपने अंतर से ज्वालामुखी उत्त्पन्न करके सब कुछ भस्मीभूत कर देती है (परन्तु वैदेशिक जीवन पद्धति का अलग ही दृष्टिकोण है ) वहां जीवन पद्धति के हर एक बिन्दुवों पर विचार करिये हर जगह हिसा की झलक मिलेगी ( आसुरी वृति और मानव में तो सदैव बैर ही रहा है जो की स्न्क्रमनीय संस्कृति के कारण और भी अधिक बदता ही जा रहा है (उक्त आचरण निंदनीय तो है ही परन्तु कहीं कहीं शठे शाठ्यम समाचरेत की भी आवश्यकता होती है जिसका की भारतीय संस्कृति ने कम ही अनुकरण किया है :) )...........................जय भारत

के द्वारा: ashvini kumar

आदरणीय शाही जी , इन्टरनेट पर एक मेल काफी circulate हो रही है, जिसका सोर्स मुझे कन्फर्म नहीं हो पा रहा है, उसके अनुसार ये तथ्य गद्दाफी और लीबिया के baare में मिलते है: Lesser known facts about Libya and Gaddafi : 1. There is no electricity bill in... Libya; electricity is free for all its citizens. 2. There is no interest on loans, banks in Libya are state-owned and loans given to all its citizens at 0% interest by law. 3. Home considered a human right in Libya – Gaddafi vowed that his parents would not get a house until everyone in Libya had a home. Gaddafi’s father has died while him, his wife and his mother are still living in a tent. 4. All newlyweds in Libya receive $60,000 Dinar (US$ 50,000 ) by the government to buy their first apartment so to help start up the family. 5. Education and medical treatments are free in Libya. Before Gaddafi only 25% of Libyans are literate. Today the figure is 83%. 6. Should Libyans want to take up farming career, they would receive farming land, a farming house, equipments, seeds and Livestock to kick- start their farms – all for free. 7. If Libyans cannot find the education or medical facilities they need in Libya, the government funds them to go abroad for it – onnot only free but they get US $2, 300/month accommodation and car allowance. 8. In Libyan, if a Libyan buys a car, the government subsidized 50% of the price. 9. The price of petrol in Libya is $0. 14 per liter. 10. Libya has no external debt and its reserves amount to $150 billion – now frozen globally. 11. If a Libyan is unable to get employment after graduation the state would pay the average salary of the profession as if he or she is employed until employment is found. 12. A portion of Libyan oil sale is, credited directly to the bank accounts of all Libyan citizens. 13. A mother who gave birth to a child receive US $5 ,000 14. 40 loaves of bread in Libya costs $ 0.15 15. 25% of Libyans have a university degree 16. Gaddafi carried out the world’s largest irrigation project, known as the Great Man-Made River project, to make water readily available throughout the desert country. अगर ये तथ्य सच है तो हमें इसे क्या समझे, क्या केवल अमेरिया और वेस्टर्न देश के पैसे और सामर्थ्य के बल पर उसे हटाया गया है, ऐसे किसी भी देश के साथ हो सकता है. बहरहाल, मेरा भी भी गद्दाफी से कोई lagaav नहीं है, बात केवल मनुष्य की पाशविकता के बारे में हो रही है, आपके विचार सदा ही मेरे लिए बहुमूल्य होते हैं, और आप हैं कहाँ? काफी समय से आपकी कोई पोस्ट .......... आशा है की शीघ्र ही आप हमें....... http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

के द्वारा: abodhbaalak

आपका कथन अपने आशय के हिसाब से बिल्कुल सटीक है अबोध जी । भीड़तंत्र में आदमी कभी-कभी जानवर से भी अधिक मूढ़ बना दिखाई देता है । परन्तु गद्दाफ़ी वाले मामले में आपका आकलन सटीक नहीं है । वह भीड़ नहीं थी, विक्षुब्धों का वह समूह था, जिसने तिल-तिल कर उस मनहूस तानाशाह के हाथों एक आम नागरिक का सामान्य अधिकार तक छीन-छीन कर, तड़पा-तड़पा कर दशकों तक अपनी ऐयाशी के लिये शाही खज़ाना भरते देखा था । किसी दिन अपने देश के काले अंग्रेज़ जब इसी तरह जनता के हाथों पिटते रहम की भीख मांग रहे होंगे, खुद आपका दिल भी ज़रा भी नहीं पसीजेगा, बल्कि आपका जूता खुद बखुद पैर से निकल कर आपके हाथों में होगा, और आप उस समूह का हिस्सा बनकर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे होंगे । आभार !

के द्वारा: आर.एन. शाही

आदरणीय अबोध जी, नमस्कार..बिलकुल सही बात कही है आपने ..मै आपकी बात से पूरी तरह से सहमत हूँ..इंसान जानवर से भी ज्यादा गिर चुका है ..मैंने बीते दिनों इन्टरनेट पर एक तस्वीर देखी मै दंग रह गया एक कुत्ता अपने साथी कुत्ते की लाश को जो सड़क पर पड़ी हुई थी उसे घसीट कर किनारे लाकर उसे चाटने लगा उसे जीवित करने की कोशिश करने लगा..और वही मनुष्य जो सिर्फ नाम का ही..., एक बच्ची सड़क किनारे दर्द से तड़प रही थी वही से ''नाम के मनुष्य " उसे नज़रंदाज़ करते हुए निकलते गए और बाद में उस बच्ची के ऊपर से ट्रक निकल गया और उसकी मौत हो गयी..बड़ा दुःख होता है जब कभी ऐसे दृश्य सामने आजाते है...सही कहा आपने "हम सब केवल नाम के ही …………………. पर हम सब हैं अन्दर से जानवर , वहशी जानवर .''... ..साधुवाद..

के द्वारा: Paarth Dixit

अबोध जी सादर नमस्कार, आपको नहीं लगता की आप आदमी को जानवर कह कर उस जानवर की बेइज्जती कर रहे हैं. जो अपने सारे काम निश्चित दिनचर्या के अनुसार ही करता है. प्रातः सूर्योदय के साथ ही जागना, भूख लगने पर ही शिकार करना, अपनी जान का ख़तरा होने पर ही विरोध करना, सभी छोटे बड़े, जाति परजाति के जानवरों के साथ रहना, बच्चों को पूरा समय देना समाज के कायदे क़ानून समझाना. क्या ये सब हम इंसानों में देख पा रहे हैं? इंसान एक अलग प्रकार का जीव है उसका इन उपरोक्त बातों से कोई सम्बन्ध नहीं है.मानव एक पर्दाधारी जीव है.क्योकि उसने हर जगह परदा डालना सीख लिया है. पहले तन पर,फिर मन पर और अब आँखों पर.ये इश्वर की नायाब और अंतिम कृति है, इसीलिए भगवान् ने अन्य जीव बनाने के बाद जो कुछ बचा सब इसमें डाल दिया, जो इसके पहले बनाए किसी जीव में डालने की हिम्मत खुद भगवान् भी ना कर सका. फिरभी आपने बहुत अच्छा लिखा है क्योंकि ये मानव भी कभी कभी जानवरों के दुर्गुण का प्रदर्शन भी करता है.साधुवाद.

के द्वारा: akraktale

के द्वारा: Triawsagrip

प्रिय अबोध जी ....सस्नेह नमस्कार ! प्रिय भरोदिया जी ...... नमस्कार ! आदरणीय अशोक जी .....सादर अभिवादन ! आप सभी को मेरी शुभकामनाये और मुबारकबाद दीपावली की सपरिवार बधाईयां और मुबारकबाद :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o आदरणीय अशोक जी , मेरी तीसरी आँख कह रही है है की अब मुझको पांच बजे उठ जाया करना चाहिए ..... सुबह की ताजा प्राणवायु और पक्षियो का कलरव +चुस्ती फुर्ती +सेहत और तंदरुस्ती यह सब मुझको मिल कर एक औसत बिहारी के मुकाबले में वास्तव में बेहतर पंजाबी बना देगा ....हाहा हा हा हा ************************************************************************************************* मैं माइक्रोसॉफ्ट के आउटलुक में मेल की सैटिंग देख रहा थी की तभी इत्तेफाक से मुझको इन पीलिया के मरीजों का दीदार हुआ ..... इनके सहारे ही भारी भीड़ में मैं अपना कमेन्ट खोज लेता हूँ ..... एक बार फिर से आप सभी स्नेही सज्जनो +साथियो को सपरिवार दीपावली की मुबारकबाद

के द्वारा: rajkamal

के द्वारा: Raj

आदरणीय अबोध जी आपने शायद आधार,अद्वितीय पहचान पत्र के बारे में सुना होगा.मुझे उसमें कई विसंगतिया दिखाई दे रही है जिसकी वजह से शायद ये भारत की गरीब जनता तक ना पहुच पाए.हलाकि मैंने इस सन्दर्भ में आधार हेल्पलाइन से बात की है,वहाँ से मुझे रिफरेन्स आई डी (१५९३९३९) भी दी गयी है लेकिन मुझे नहीं लगता की इस पर कोई विचार होगा.कृपया आप भी मेरे इस लेख का विश्लेषण करें और अपना कीमती सुझाव दें.क्योंकि यदि ये आम आदमी तक नहीं पहुच पाया तो कोई फायदा नहीं होगा सिवाय जनता के पैसों की बर्बादी के. कई बच्चे जो बचपन से गरीबी की वजह से दिल्ली या मुंबई में रोज़गार में लग चुके हैं उनके लिए वोटर आई डी का कोई महत्त्व नहीं है.क्योंकि वो वोट करने जाते ही नहीं. कई लोग जो पढाई ख़त्म करके प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, उनके पास किसी संस्थान का पहचान पत्र कहाँ से आएगा और वो किराये के मकानों में रहते हैं. क्या उनके सभी शैक्षिक प्रमाण पत्रों के आधार पर उन्हें आधार नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि नौकरी तो उन्ही दस्तावेजों से मिलती है.और मुझे नहीं लगता कि कोई विद्यार्थी इतने घोटाले करेगा हाँ अगर संस्थान का आई कार्ड नहीं है तो किसी निकटवर्ती प्रतियोगी परीक्षा का प्रवेश पत्र भी माँगा जाना चाहिए. मुझसे कहा गया की आप किसी ए ग्रेड अधकारी या नेता से लिखवाइए वो भी लेटर हेड पर, तो क्या एक आम गरीब आदमी ए ग्रेड अधिकारी से इतनी आसानी से मिल सकता है. अधिकारी तो आम जनता से सीधे मुह बात तक नहीं करते,तो वो भला किसी के लिए क्यों लिखेंगे. और नेता जी तो चुनाव के बाद दिखते कहाँ हैं मुझे और भी कई बातें बताई गयी जो कि आम आदमी के बस में नहीं है . तो फिर क्यों आधार जैसी परियोजना पर जनता का पैसा बरबाद कर रही है भारत सरकार. कृपया आप http://ajaykumar2623.jagranjunction.com/2011/10/14/aadhar-some-questions-of-public-interest/ तथा http://uidai.gov.in/index.php?option=com_content&view=article&id=157&Itemid=१०८ पर भी विजिट करें

के द्वारा: ajaykumar2623

अबोध जी, शायद आप जितना ज्ञानी तो मैं नहीं हूँ किन्तु जीवन में काफी अनुभव हासिल किया है. कही तरह के लोग कही तरह का त्याग कही तरह ही आग और कहीं तरह भावनाएं महसूस की हैं. सब कुछ देखने के बाद आज केवल यही निष्कर्ष बाकि रहा गया है है की प्रेम और त्याग को किसी तरह की आशा नहीं होती. सच्चे पेम से कभी दुःख नहीं मिलता.चाहे जिससे हम प्रेम करते हैं उसे हासिल कर सके या नहीं. प्रेम एक भक्ति होती है. जो की किसी पत्थर की मूर्ति के लिए भी की जा शक्ति है. उसमे हमें कुछ भी पाने की चेष्टा नहीं होती होती. किन्तु जब हम अपने प्रेम से दुखी हो जाते हैं और उसका प्रचार करने लगते हैं तो वास्तव में हम प्यार जैसे पवित्र शब्द को गन्दा करते हैं. प्रेम में कोई खोट नहीं होती.जब इन्सान भगवान से प्रेम करता है तो इस तरह की भावना क्यों दिल में नहीं आती.क्योंकि भगवान् से शायद वो एक सच्चा प्रेम होता है. बुरा मत मानियेगा, किन्तु आपके इस ब्लॉग के बाद से आपने भी उस्सी तरह की एक तस्वीर मेरे सामने पेश कर दी है की इन्सान के प्रति हमारा प्रेम काफी अलग होता है.उसमे केवल एक स्वार्थ होता है. आप खुद भी सोच सकते हैं की आप केवल इसलिए दुखी है आप जिससे प्रेम करते हैं उससे हासिल नहीं कर सकते.लेकिन हासिल करना ही प्रेम नहीं होता. जहाँ यह सब बातें ख़त्म हो जाती हैं वहां से प्रेम की वास्तविक तस्वीर उभरती है. दुखी तो इन्सान अपनी पसंद की कार न ले पाने पर भी होता है. मैं भी सोचता हूँ की काश मेरे पास कभी बुगाटी हो पर मैं जनता हूँ की यह असंभव है.मैं और बुगाटी नदी के दो किनारे हैं. मेरे मन में बार बार अपनी बुगाटी चलाने का ख्याल आता है.किन्तु इसका मतलब यह तोह नहीं की मैं बुगाटी से प्यार करता हूँ. वो तो मेरी एक इच्छा है क्यूँ की वो मुझे अच्छी लती है. इसलिए दुखी मत होइए जनाब प्यार किसी को दुखी नहीं करता बल्कि हर हाल में सुख ही पहुंचाता है. जिसदिन आप प्रेम और पसंद में अंतर समझ जाएँ आप शायद प्रेम का वास्तविक मतलब समझ जायेंगे. बढ़िया लेखन के लिए हार्धिक बधाई.

के द्वारा: Sunnu

http://rajkamal.jagranjunction.com/2010/10/16/%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%9f/ http://rajkamal.jagranjunction.com/2010/08/31/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8/ प्रिय अबोध जी ....नमस्कार ! आजकल आप बेहद उम्दा लिखने लगे है .... फ़िक्र मत कीजियेगा मेरी बातो से नजर नहीं लगेगी बल्कि मेरी तो यह कामना है की आप अपनी सख्शियत के छुपे हुए पहलुओ को हम सभी के सामने लाकर हमारी मन और आत्मा की प्यास को इसी तरह से तृप्त करने का पावन कार्य करते रहे .... आमीन :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/09/30/“आदरणीय-निशा-मित्तल-–-दा-ल/ पूज्यनीय माता जी के श्री चरणों में साष्टांग दंडवत बारम्बार प्रणाम ! प्रिय भ्रमर जी .....सादर प्रणाम ! माता रानी के दर्शनों के बाद सपरिवार उनकी शोभा +गाथा को पढ़ना मन को सकूं दे गया .... आप बंजारे होकर भी बंजारे नहीं हो सकते .... क्योंकि जो असली बंजारे होते है वोह -जो प्यार किया सो प्यार किया जो नफरत की सो नफरत की वाले गाने पर अमल करते है ..... जय हो माता जगत जननी जी की :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/09/30/“आदरणीय-निशा-मित्तल-–-दा-ल/ http://rajkamal.jagranjunction.com/2010/10/16/%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%9f/ http://rajkamal.jagranjunction.com/2010/08/31/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8/ priy अबोध जी .....सप्रेम नमस्कार ! मेरे उन तिन में से दो लेखों तक ही पहुँच पाया हूँ ..... शायद आपने इनको पढ़ा भी होगा पहले ..... उम्मीद है की आपकी जिज्ञासा अब शांत हो गई होगी ******************************************************************************************* हर किसी को नहीं मिलता यहाँ पर प्यार जिंदगी में खुशनसीब है वोह जिनको मिला है प्यार जिंदगी में .... खुशनसीबी वाली शुभकामनाओं सहित **************************************************************** प्रिय अबोध जी ....नमस्कार ! आजकल आप बेहद उम्दा लिखने लगे है .... फ़िक्र मत कीजियेगा मेरी बातो से नजर नहीं लगेगी बल्कि मेरी तो यह कामना है की आप अपनी सख्शियत के छुपे हुए पहलुओ को हम सभी के सामने लाकर हमारी मन और आत्मा की प्यास को इसी तरह से तृप्त करने का पावन कार्य करते रहे .... :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/09/30/“आदरणीय-निशा-मित्तल-–-दा-ल/

के द्वारा: Rajkamal Sharma

के द्वारा: rajkamal

के द्वारा: Makailee

के द्वारा: Latricia

अबोध जी सुप्रभात ,,,विषय बहुत ही अच्छा है और यह तो भारतीय / सनातनी संस्कृति का केंद्र बिंदु रहा है यह आत्मशोधन ,आत्ममंथन,अंतर्बोध , आदि का सुअवसर प्रदान करता है,,मौन वस्तुतः मौन नही होता जब हम मौन होते हैं तब अन्दर बहुत कुछ घटित हो रहा होता है इतना कुछ जितना की हम सोच भी नही सकते ,,लेकिन हम बाहरी शोर में इतना खो जाते हैं की अपनी अंतरात्मा की आवाज नही सुन पाते ,,मौन के द्वारा हम खुद से बात कर पाते हैं खुद को समझ पाते हैं ,अपनी विसंगतियों की तरफ ध्यान दे पाते हैं ,,,लेकिन पाश्चात्य जगत इस आत्म्बोधन से डरता है यह डर खुद के ही कृत्यों से है आप अपने आप को देखना ही चाहते क्योंकि आपको अच्छी तरह पता है की आप कैसे हैं और आप वैसे ही रहना चाहते हैं इसीलिए आप खुद को शोर में मदिरा में एवं अन्न्यान्य तरह के नशों में खुद को डूबा देते हैं यह प्रायः खुद के कुकृत्यों पर पर्दा डालने की एक कोशिश भर होती है जो कामयाब भी होती है आप ताउम्र उन्माद में जीवन गुजार देते हैं ,,,इतिहाश में बहुत से ऐसे व्यक्तित्व मिल जायेंगे .........अबोध जी अच्छे विषय हेतु आभार ....................जय भारत

के द्वारा: ashvinikumar

प्रिय अबोध जी, मैं यहाँ पर विशेष रूप से आपके द्वारा उठाये गए एक सवाल पर केन्द्रित करना चाहूँगा- एक तरफ आप कहते हैं- 'मै आपसे पूछता हूँ क्या अन्ना जी से पहले किसी नो भ्रष्टाचार का विषय नहीं उठाया………………., तो आज फिर अन्ना जी ही को गाँधी जी के अवतार के रूप में क्यों देखा जा रहा हैं?' और दूसरी तरफ 'अन्ना जी के समर्थन में उतरने से पहले हमें खुद को देखना होगा, की क्या हम वास्तव में उनका समर्थन कर रहे हैं' आपके प्रश्न से लगता है जैसे आप अन्ना जी को गांधी जी के अवतार के रूप में देखे जाने को ठीक नहीं मानते क्योंकि अन्य लोग भी उनके जैसे हैं और दूसरी और ऐसा लगता है जैसे आप अन्ना जी को पाक साफ़ मानते हैं इसलिए सिर्फ पाक-साफ़ लोगों का ही उनके साथ शामिल होना आपको पसंद है| फिर एक और जगह भटकाव नजर आता है जब आप लिखते हैं 'इश्वर से प्रार्थना है की अन्ना जी वही अवतार हों जिसकी आपने प्रार्थना की हो,' यानी आप कहीं न कहीं अन्ना के लोगों की उम्मीदों पर खरा साबित न हो पाने वाली स्थिति से डरते भी हैं| कुल मिला कर पोस्ट शायद अपनी बात स्पष्ट करने की कोशिश करते करते भटक गई| ये सिर्फ मेरी राय है हो सकता है मुझे ऐसा प्रतीत हुआ हो| आशा है मेरी राय को अन्यथा नहीं लेंगे|

के द्वारा: chaatak

प्रिय अबोध जी, आपकी इस पोस्ट को पढ़कर अनायास ही मुझे कुछ पंक्तियाँ स्मरण हो आईं, आशा है आपको भी पसंद आएँगी- पर बाँध कल्पना के मानव, छू ले तारों की ऊँचाई को, वो चाँद चमकता गगन बीच, आवाजें दे तरुनाई को, सुन प्रकृति बुलाती है तुझको, इसकी सरिता की ताल समझ, इसका मुखमंडल दमके है, आतुर तेरी अगुआई को, अब ज्ञान का बंधन तोड़ के तू, नादान समझ ये बात सही, विज्ञान से रूठी सृष्टि कहीं, ना दिखला दे निज निठुराई को, जब ज्ञान बढ़ा, विज्ञान बढ़ा, तो आयुध महाविनाश बढे, ज्ञानी मानव तब छोड़ धर्म, गह लिया लोभ चतुराई को, तृष्णा को छोड़ निकल 'चातक', कुदरत बाहें फैलाए खड़ी, इसकी आगोश में बैठ भुला दे, तृष्णा की तरुनाई को | खूबसूरत लेखन पर हार्दिक बधाई!

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: vikasmehta

सुमित जी, चलें किसी ने तो आप जैसे भाषा के साथ मुझे अपने विचार दिए, इस मंच से मुझे इतना प्यार मिला की अलग विचार रखने के बावजूद भी किसे ने मुझसे आप जैसे स्टाइल में..... एक बात याद रखें, अलग मत रखने से कोई देशद्रोही नहीं हो जाता है और न ही इसको सत्यता पर ऊँगली उठाई जाती है, आज इस मंच पर बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिन्होंने कहीं अन्ना जी को कांग्रेस का तो कहीं बीजेपी का एजेंट कहा है, पर इससे उनके ..... मेरी एक सोच थी, बल्कि अभी भी हैं, शंकाएं हैं जिसे मैंने मंच के अपने सभी साथियों के साथ बनता है और उन्होंने भी इन शंकायों को दूर करने के लिए अपने विचार दिए हैं, .... आशा है की आपके अच्छे कमेन्ट भी मुझे भविष्य में मिलेंगे .... http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

के द्वारा: abodhbaalak

प्रिय अबोधबालक जी, वास्तव में भ्रष्टाचार इस व्यवस्था का एक स्थायी अंग बन चुका है. जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में इस कदर घुलमिल गया है की ये हमको भी ध्यान नहीं रहता की हम भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं. इसलिए ये कहना की भ्रष्टाचारी ही इस आन्दोलन में शिरकत कर रहे हैं, इसलिए उन्हे आन्दोलन करने का अधिकार नहीं हैं........गलत है........ हमारी व्यवस्था ऐसी बन चुकी है की न चाहकर भी भ्रष्टाचार में शामिल होना ही पड़ता है......... लेकिन यदि सभी लोग एकमत होकर व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाते हैं इसमें क्या गलत है....... आपकी आशंका निराधार नहीं है लेकिन मेरे विचार से आपने उसको आन्दोलन से गलत जोड़ा है और गलत समय पर जोड़ा है. क्योंकि की किसी भी आन्दोलन के मध्य में इस तरह के विचार यदि आयेंगे तो हो सकता है की आन्दोलन की गति को अवरुद्ध करे, .........! मैंने बहुत पहले रोजमर्रा की जिंदगी में हो रहे भ्रष्टाचार के ऊपर एक पोस्ट लिखी थी उसका लिंक दे रहा हूँ http://munish.jagranjunction.com/2011/05/19/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%ad%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%b9%e0%a5%82%e0%a4%81/

के द्वारा: munish

सर भ्रष्टाचार को समाप्त करने की अन्ना की मांग एकदम सही है लेकिन अब अन्ना की कुछ मांगे गलत हैं. अन्ना द्वारा न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने की मांग गलत है क्योंकि न्यायपालिका कई दोषियों को सजा देने का काम भी karti है तो ऐसे में हो सकता है कोई सज़ा प्राप्त व्यक्ति बदले की भावना से किसी न्यायधीश पर भरष्ट होने का गलत आरोप लगा दे……………. तो ऐसे में जज कैसे निष्पक्ष होकर न्याय कर पायेगा…….. इसलिए सज़ा तो गलत या झूठा आरोप लगाने वाले को भी कड़ी से कड़ी मिलनी चाहिए.वरना न्याय व्यवस्था चरमरा जायेगी… और इससे हो सकता है उन लोगों को भी नुकसान हो जो अपने पर हुए अन्याय के लिए इन्साफ मांगने न्यायलय की शरण में जाते हैं…… तब उन्हें एहसास होगा की अन्ना का समर्थन करके उन्होंने कितनी बड़ी गलती की थी …………………. प्रधान मंत्री को कई बार देश हित में कई अजीबो गरीब तरह के फैसले भी करने पड़ते है ऐसे में अगर प्रधानमंत्री लोकपाल जांच में फंसा तो देश का तो बंटाधार हो जाएगा ……….. जो भी बात प्रधानमन्त्री बोलता है तो वो देश के 121 करोड़ लोगो की और से बोलता है,ऐसे में लोकपाल के दायरे में उसे रखने की बात सरासर गलत है एक आम आदमी जब अपने घर के दो चार सदस्यों की समस्या सुलझाने में पागल होने लगता है, तो प्रधानमत्री किस सूझ बूझ से निर्णय लेता होगा ये तो वही जानता है. जहाँ तक बात विपक्ष के शोर शराबे की है तो सत्ता तो विपक्ष की भी आएगी, तो विपक्ष (जो उस वक्त सत्ता में होगा) कैसे निर्भीक होकर काम करेगा ??????????? फिर चाहे वो भाजपा हो या कोई और……….. हाँ जजों की संपत्ति की जांच के लिए क़ानून बनाया जा सकता है जो उनपर रिश्वतखोरी का आरोप लगने, या उनके कदाचार साबित होने पर उन्हें अपदस्थ करने में सक्षम हो……….. खैर मैं ज्यादा क्या लिखूं क्योंकि कुछ लोगों को बुरा लग सकता है. वैसे भारत में जब तक कोई चीज़ खुद के सिर पर ना गिरे लोगों को कुछ एहसास नहीं होता …………. लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा की संविधान से ऊपर कोई नहीं है ना तो प्रधानमंत्री, ना न्यायपालिका, ना लोकपाल और ना ही अन्ना हजारे इस बात की क्या गारंटी है की लोकपाल ढूध का धुला होगा । रही बात भ्रष्टाचार की ,तो उसके पक्ष में मैं भी नहीं हूँ, और हाँ मैंने ये कहना चाहा है कि सज़ा का प्रावधान गलत या झूठी शिकायत करने वाले के लिए भी होना चाहिए.

के द्वारा: ajaykumar2623

अबोध जी , नमस्कार, मेरी प्रतिक्रिया को महत्व देने के लिये धन्यवाद. प्रतिक्रिया तो क्रिया पर निर्भर होती है. आप किसी विचार या व्यक्ति का जितनी शालीनता के साथ विरोध करते है सामान्यत: आपको भी उसी अनुपात में ही  शालीनता  के साथ प्रतिक्रिया प्राप्त होती है.  आप की इस प्रति उत्तर को पढ़ने से तुरन्त पूर्व  मनोरंजन भाई का ब्लाग "क्या चखेंगे अन्ना का आइस्क्रीम" पढ़ा और तदानुसार प्रतिक्रिया भी दी. जी हाँ तदानुसार भाषा भी प्रयोग हुई है. उन्ही के एक और ब्लाग  "दोनों अन्ना भाई-भाई" मे भी उन्होने जैसी भाषा एवं आन्दोलनरत जनता के लिये जैसा सम्बोधन प्रयोग किया है (हाथों में तिरंगा लिए, वंदे मातरम्् गाते लोग रातों रात पैदा हो गए। ठीक वैसे ही जैसे मच्छर बारिश, गंदगी, जलजमाव होते ही भिन-भिनाने लगते हैं, पैदा ले लेते हैं। वैसे भी इन देशभक्तों को मच्छरों से सीख लेनी चाहिए।) मेरी प्रतिक्रिया भी कुछ वैसी ही है. इति.    !!!!!!अन्ना जी द्वारा किये गये संघर्ष की प्रथम सफलता पर आपको भी हर्दिक बधाई!!!!!!!     

के द्वारा: ajaysingh

अमिता जी आपके विचार भी आपकी vidvanta का ............ बात प्रासंगिक या अप्रासंगिक की नहीं बल्कि किसी तरह लिखा जाये उसकी हो रही थी, मेरे लेख अभी भी किसी नौसिखिया ....... खैर, आपने जो ३ बिंदु दिए हैं उनके उत्तर में यही कह सकता हों की १> आपको नहीं लगता की इस देश में न्याय मिलना कितना सुस्त है, मुक़दमे बाप से चल कर पोते तक..... , इस लिए कानून ही नहीं बल्कि उसे सही तरह से और तीव्र गति से .. २> सचह है की आज तो किसी को नहीं छोड़ा जा रहा है पर किसी पर विश्वास कैसे किया जाये इसका मापदंड क्या होगा? ३?फिर बात कानून की आ गयी, कानून तो संसद की द्वारा ही बनेगा और संसद में सांसद होते हैं जो कैसे होते हैं वो ...... आशा है की आगे भी आप अपने विचारों से अवगत कराती रहेग्नी. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

के द्वारा: abodhbaalak

आप बड़े प्रासंगिक विषयों पर लिखते हैं और मैं अप्रासंगिक... :-) अण्णा या आंदोलन से असहमत होने का आपको अधिकार है। 1 ये सही है कि कोई एक कानून देश से भ्रष्टाचार नहीं मिटा सकता है, लेकिन दंड का खौफ उसकी आवृत्ति और गति दोनों पर लगाम लगा सकता है, यदि ऐसा न होता तो फिर दुनिया में किसी भी तरह के कानूनों की जरूरत ही नहीं होती। 2 ये राजनीति बहुत घटिया चीज है और यूँ भी हम षडयंत्रों के दौर में रह रहे हैं। हम कभी समझ ही नहीं सकते हैं कि कौन, किसके खिलाफ और क्या षडयंत्र बुन रहा है। यहाँ गाँधी तक को नहीं छोड़ा गया तो फिर बेचारे अण्णा हजारे क्या चीज है...? 3 भ्रष्टाचार मिटाने के लिए सबसे पहले हमें खुद को ही साधना होगा, सही है, लेकिन तब तक तो कानून की जरूरत पड़ेगी ना... ;-)

के द्वारा: amitadixit

आज भ्रष्टाचार के विरुद्ध देश की जनता ने कमर कस ली है, किन्तु कुछ अपने ही लोगों ने ये प्रश्न उठा रखा है कि हम जनता के लोगों को पहले खुद मे सुधार लाना होगा तब भ्रष्टाचार के विरुद्ध लडा जाना चाहिये. फिर पहले कौन.. ? पहले आप (स्वयं हम) या पहले आप (सरकार)…. हम मजबूर,गरीब,अधिकारविहीन (वोट को छोड कर),याचक और आप सत्ताशीन,अधिकारसम्पन्न, शक्तिशाली .हम अपनी सायकिल से किसी को टक्कर मार दें तो कितना नुकशान होगा आप कार से किसी को टक्कर मार दे तब ? स्पष्ट है कि….. जो जितना ऊँचा पद सत्ता में चाहेगा, उसे उतना ही ज्यादा उत्तरदायी होना होगा. जनता सबसे नीचे है अतः उसका उत्तरदायित्व सबसे कम है. भ्रष्टाचार की नाली ऊपर से नीचे बहती है,अतः यह ऊपर से ही नियन्त्रित होगा. आज हम ऊपर वालों कों सुधार लें कल ऊपर वाले हमको सुधार देंगें (अपनी सरकारी मशीनरी से). हम अकेले रिश्वत देते हैं वो हम जैसे कई लोगों को रिश्वत देने के लिये मजबूर करते है. हम गलत करते होंगे किन्तु गलत का विरोध कर रहे हैं, वो गलत को सिस्टम को हिस्सा बनाने पर तुले हैं. अब हमारी कमियों की ओर उँगली उठा कर हमारी आवाज को न दबायें. भ्रष्टाचार के विरुद्ध सभी बुद्धिजीवियों से यही अनुरोध है कि…..  व्यवस्था सुधार और समाज सुधार के अन्तर पर विचार करे, समाज सुधार स्वयं के सुधार से प्रारम्भ होता है किन्तु व्यवस्था सुधार नियम कानून द्वारा  ऊपर से ही सम्भव है.

के द्वारा: ajaysingh

प्रिय अबोध बालक जी जब मतैक्य हो अलग विचार रखे जाएँ तो ही मजा आता है आपके जो भी विचार हों हमारे जो भी हों हमारा मकसद साफ़ है जो आप ने नीचे लिखा ..ये एक सुन्दर सन्देश है और बिना इस के कोई भी पाल सफल नहीं हो सकता है लेकिन इतना तो आप को मानना चाहिए ही की जो भी हो रहा है अच्छा हो रहा है कुछ तो कहीं न कहीं होगा ही लाभ किसी को .....जो लोग साथ खड़े है सब दूध के धुले नहीं लेकिन इस कारण पर समर्थन तो दे रहे ...राजनीति बहुत गन्दी भी होती है और कल ....स्पष्ट हो जाएगा सब ...अब पुलिस डंडा मांगने लगी है .... जहाँ भ्रष्टाचार जीवन का क हिस्सा बन गया हो, वहां पर हर किसी को खुद के गिरेबान में झाक कर देखना होगा, दुसरे पर ऊँगली उठाते समय ये देखना होगा की हम कितने पानी में हैं. बदलाव घर से होगा, खुद से होगा………. भ्रमर ५

के द्वारा: surendr shukla bhramar5

आदरणीय अबोध जी, बहुत दिनों बाद मंच पर आपकी रचना देखकर ख़ुशी हुयी... दर असल आज हर आदमी भ्रस्टाचार से त्रस्त है...भले ही वोह खुद भ्रस्टाचार क्यूँ न करता हो... कांग्रेस सर्कार अब तक की सबसे भ्रस्त सर्कार है इसमें भी कोई दो राय नहीं...और इनकी विचार धरा भी बदली है....यह भ्रष्ट भी हैं और जो इनके भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठता है उसको यह कुचलने की कोशिश भी करते हैं...बाबा रामदेव के खिलाफ आज से तीन चार महीने पहले तक कोई केस नहीं था... अचानक सैकड़ों केस कहाँ से आ गए ...अगर बाबा ने गलती की थी तो पहले क्यूँ नहीं....कांग्रेस सरकार अंग्रेजों की तरह व्यवहार कर रही है.... एक और चीज़ जोड़ना चाहूँगा ,किसी महापुरुष ने कहा है कि .. यह मत देखो कौन कह रहा है... यह देखो क्या कह रहा है.... अच्छे लेख के लिए बधाईयाँ...

के द्वारा: syeds

आदरणीय अबोध बालक जी, सादर अभिवावादन मैं इस मंच पर बिलकुल नया और अनुभवहीन हूँ ,..आपकी शंकाओं पर अपने विचार रखने की आज्ञा चाहूँगा ,.. आपकी पहली बात बिलकुल सही है कि, भ्रष्ट लोग भी इस आंदोलनों में भाग ले रहे हैं...इसके कई कारण मेरी समझ में आते हैं -- १- वो किसी ऐसी संस्था से जुड़े हो सकते हैं ,.जो मजबूरी में ही सही आन्दोलन को समर्थन दे रही है २-किसी परिचित के बुलावे पर भी जरूर पहुंचते होंगे ,.. चाहे तफरी करने या स्थिति का आकलन करने ३- नेता और व्यावसायिक समाजसेवी तो इस आन्दोलन से दूर रह ही नहीं सकते ( आखिर उनकी दुकानदारी का सवाल है ) ४- एक शेखचिल्ली की गप मार रहा हूँ .." कुछ लोगों ने मेरे लेख के नायक से मुलाकात ना कर ली हो " ५- एक महत्वपूर्ण बात मेरी समझ में और आती है ,.."भ्रष्टाचार से भ्रष्टाचारी भी पीड़ित हो सकता है " आपकी अगली बात पर मेरा मानना है कि हम सब इस भ्रष्टाचार में कहीं न कहीं शामिल अवश्य हैं (चाहे मजबूरी हो ) ,..तो इस महामारी से छुटकारा पाने के लिए क्या ईश्वर के अवतार लेने की प्रतीक्षा करेंगे ?? ...यहाँ स्मरण रखना होगा " आरोप तो कभी न कभी ईश्वर पर भी लगे हैं " श्री अन्ना हजारे इस महायुद्ध के नायक हैं ,.हमें उनपर पूरा भरोसा रखना चाहिए ........ उनके अपने ट्रस्ट की जांच करने के आग्रह पर सरकार ने जस्टिस सावंत से जांच कराई थी ,..बकौल जस्टिस सावंत "ट्रस्ट के कागजों में कुछ अनियमितता पाई गयी थी जिसे भ्रष्टाचार नहीं कहा जा सकता " आपकी अगली बात से मैं पूरा सहमत हूँ ,...बदलाव खुद से ही करना होगा ,..और शायद इसके लिए आम मध्य वर्ग तैयार है ,.कुछ ही दिनों में आन्दोलन का विशाल स्वरुप धारण कर लेना इसी मानसिकता को पुष्ट करता है मेरे विचार से हमें इस आन्दोलन को पूरा समर्थन करना चाहिए ,..लेकिन आँखे ,दिल ,दिमाग सब खोल कर ...अन्ना जी की टीम के बारे में भी कुछ सवाल अवश्य हैं ,..लेकिन फिलहाल जन लोकपाल बिल समय की मांग है ,..जिसके आगे बाकी सारे प्रश्न फिलहाल औचित्यहीन लगते हैं .. कहीं पढ़ा था ,..विचार के बीज से कर्म रूपी वृक्ष जन्मता है उसी से भाग्य रूपी फल मिलता है......आइये सब मिलकर सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ें ,.. कारवां बढ़ाते चलें जयहिंद, वन्देमातरम

के द्वारा: Santosh Kumar

के द्वारा: Soumi

के द्वारा: नीरज नीखरा

के द्वारा: Vivekinay

के द्वारा: Mala Srivastava

प्रिय अबोध जी ....सस्नेह नमस्कार ! आपसे हफ्तावसूली पाकर मन को एक अजीब सा सकून मिलता है ...... इस रहस्यमयी रचना ने यह साबित कर दिया है की आप में अनेको संभावनाए छुपी हुई है ,जिनको की बाहर आने का बेसब्री से इंतज़ार है ..... वैसे मैं आपकी जानकारी के लिए एक बात बताना चाहता हूँ की मेरी पहली बीवी का नाम रचना था .. चूँकि इस मंच पर एक रचना नाम की ब्लागर आदरणीय रचना जी भी है तो उनके और सीमा जी के सम्मिलित प्रयासों और विशेष आग्रह पर बेचारी रचना को असमय काल का ग्रास बनना पड़ा .... और मेरी शादी रचना की छोटी बहन मधु से हो गई ..... वैसे इस मंच पर उन दोनों ही बहनों संग बारी -२ से मैंने हनीमून भी सेलिब्रेट किया है औए सबके साथ उनकी यादों को साँझा भी किया है ..... बाकि सब तो इतिहास की बाते है ....... आपकी अंत में में तौबा करते हुए सभी को फ्री में दी गई नेक सलाह देख कर बहुत ही बुरा लगा .... सभी आपकी सलाह पर अम्ल करने लगे फिर तो हो गई हमारी असल में शादी ? :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma

अबोधजी बहुत से व्यक्ती अशिक्षा को इसका कारण मानते हैं.  लेकिन मेरा मानना है यदि आपके मन में दूसरे धर्म के प्रति आदर नहीं है तो यदि आप अशिक्षित या कम पढ़े लिखे हैं तो चूंकी आपको अपनी बात ढंग से कहना नहीं आता तो आप सामने स्पष्ट रूप से अपनी भावनाएं व्यक्त कर देते हैं. पढ़े लिखे व्यक्ती अपनी बात को चाशनी में डुबो कर बोलते हैं. मकसद दोनों का एक ही होता है.      हर धर्म की अच्छाई और बुराई होती है. हमें हर धर्म का सम्मान करना चाहिए. अच्छाई को स्वीकारना चाहिए. बुराई का विरोध करना चाहिए. आखिर हमारा उद्देश्य तो उस एक ही शक्ति की उपासना करना है. यदि हम किसी की भावनाओं को आहत कर रहें हैं तो यह भी तो पाप है. बहुत अच्छा लेख. बधाई.

के द्वारा: preeti

आदरणीय अबोध जी बहुत ही सुन्दर सार्थक लेख पहले तो सब को एक करते हुए आप चले आज आपकी और मेरी रचना में एक बात " एकता " उसका आह्वान मिला फिर आप ने संदेह और बाँट कर लाभ लेने को प्रमुखता दी निम्न में आप ने सन्देश दे दिया जो बहुत ही यथार्थ परक है उसके (ना) पाक इरादों को मट्टी में मिला देना है नक्सल वाद और आतंकवाद इस का फायदा प्रमुखता से ले रहे हैं इस की जड़ हैं लेकिन सब से महत्वपूर्ण बात इस मंच और अन्य मंच पर जो धर्म को लेकर ब्लोगिंग हो रही है उसके बारे में लिख आप ने बड़ा ही अनूठा काम किया है हमने भी कई मंच पर देखा हमारे निजी ब्लॉग पोस्ट पर कितने लोग धर्म के नाम पर भड़काऊ बयानबाजी और आह्वान कर रहे हैं की आइये अगर आप अपने धर्म से प्यार करते है तो ये लिखिए वो लिखिए जो की एक विष है और हम सब को इस का हर तरह से विरोध करना चाहिए सारे धर्म अच्छे हैं हम उनकी व्याख्या गलत कर गलत समझाते गलत करते हैं -सभी से आग्रह है सजग रहें बहुत ही बढ़िया लेख आप का तहे दिल से शुक्रिया जनाब शुक्ल भ्रमर ५

के द्वारा: surendrashuklabhramar5

के द्वारा: baijnathpandey

भ्रष्टाचार को बढ़ावा भी हम ही देते है और इससे त्रस्त भी हम ही रहते है | अपने आप रिश्वत दे कर काम कराये तो वो सहूलियत और दूसरा रिश्वत ले तो भ्रष्ट रिश्वतखोर.................रिश्वत का खून भी तो हमने ही लगाया है अब उससे परेशां भी हो रहे है ..............अपने हिस्से की ईमानदारी बरतने की आवश्यकता है सुधार अपने आप होना शुरू हो जायेगा | हम सोचते है पहल कोई करे तो साथ देंगे मगर आगे बढ़ कर मिसाल कायम नहीं कर पाते| कहते है एक मछली पूरे तालाब को गन्दा करती है मगर हम सब ने मिल कर अपने पूरे समाज को गन्दा कर दिया है कोई बड़ी मछली(कलमाड़ी जैसे) है , कोई छोटी मछली (हम आम जन जो की कभी मज़बूरी में और कभी लालच में) है | दोषी सम सब है | अच्छे लेख के लिए ................बधाई

के द्वारा: div81

के द्वारा: abodhbaalak

स्नेही अबोध जी ,,बहुत दिन बाद आपके लेख पर प्रतिक्रया दे पा रहा हूँ इसका कारण कुछ समयाभाव और कुछ मंच का प्रदुसित होना भी है जिसके कारण मन अत्याधिक खिन्न हो गया है ,,आपने समाज की जिस तरह विवेचना की वह काबिले तारीफ़ है,,लेकिन इसके आगे और भी सच है ऐसा सच जिसकी हम कल्पना भी नही कर सकते ,,यकीन माने मे ह्रदय से उस रयुमर का बहुत बेसब्री से प्रतीक्छा कर रहा हूँ एवं परमपिता परमात्मा से प्रार्थना भी कर रहा हूँ की वह सत्य सिद्ध हो ,,यह हद से अधिक प्रदुसित समाज जिसकी सोच को बदलना तो मुझे नामुमकिन सा ही लगता है ,,अगर ऐसे समाज का विनाश ही हो जाए तो यह सबसे सार्थक हल होगा ,,जहरीली झाड़ियों को एक एक कर चुनने की अपेक्छा सारी झाड़ियों को एक साथ आग लगा देना ही सबसे बेहतर निराकरण होगा ,,समाज और नव युवा वर्ग(15 to २४) जिसे देख कर कभी कभी इतनी अधिक घृणा हो जाती है कि भाई प्रयुत्तर में शब्द ही नही है किस हद तक समाज गिर चुका है इसकी व्याख्या अब शायद शब्दों में सम्भव ही नही है ,,,स्नेही भाई अब बस करता हूँ कभी कभी अत्याधिक तल्ख हो जाता हूँ शायद आपको इससे किंचित दुःख हो ................जय भारत

के द्वारा: ashvinikumar

के द्वारा: संदीप कौशिक

आदरणीय अबोध जी बहुत ही बेबाक सच्चा ज्वलंत मुद्दा और विषय आप का -इसी लिए हम कहते हैं की पहले नब्ज पकड़ो कारण खोजो और निवारण फिर बाद में -कौवा कान ले गया और सुन हम उसके पीछे भाग पड़े -हम अपने बिम्ब को अपने चेहरे को अपने पुत्र पति को गंगा में धुला ही मानते रहते हैं जो भी कर आये दांत निकल हंस टाल देते है और ये जहर कुछ दिन बाद हमारा अपना चैन भी जब छीनने लगता है तब हमें याद आता है की कोई बड़ी भूल हो गयी हमसे हम शुरू से अपनी विरासत अपनी संस्कृति ममता प्यार को सहेजते शिक्षित करते तो आज इस तरह पत्थर उठाये और छींटाकशी हम एक दुसरे पर क्यों करते आरोप प्रत्यारोप लिख पढ़ सब किताबों में कैद और बस वाही ढांक के तीन पात -सच कहा आप ने बस यही सोच हमें नपुंसक बना देती है, हम बस चुप रहते हैं और जब खुद पर पड़ती है तो दूसरो की ओर देखते है की कोई हमारी सहायता करे और तब – दुसरे भी वैसे ही .. जिनके पाँव न फटी बिवाई वो क्या जाने पीर परायी ... सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भमर५

के द्वारा: surendrashuklabhramar5

के द्वारा: manoranjan thakur

के द्वारा: manoranjan thakur

के द्वारा: manoranjan thakur

के द्वारा: Abdul Rashid

के द्वारा: shab

प्रिय श्री अबोध जी, आपकी अबोधता के पीछे छूपी बोधता से एक माह से भी अधिक वंचित रहा। इसका कुछ मलाल था लेकिन ■बेरोज़गारी की समस्या, लेख ■आह! और ■यादों का झरोखा कविताएं व ■आपका सच्चा मित्र तथा ■देश बुलाता है लेख पढ़कर यह मलाल भी दूर हो गया। बेरोजगारी की समस्‍या तो विकट है ही लेकिन जागरण जंक्‍शन पर फीचर्ड होना या सप्‍ताह का ब्‍लॉगर बनना और भी विकट है इसलिए आह तो निकलनी थी । यादो का झरोखा अवश्‍य ही कुछ याद दिला गया और सच्‍चे मित्र के गुणों की सूची वास्‍तव में सही बनाई गई है। प्रवासी के लिए अपना देश सदैव प्‍यारा होता है अपने बिछड़ें चमन को सभी याद रखते हैं। इस पर लिखा काबुलीवाला का यह गीत 'ऐ मेरे प्‍यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन तुझ पर दिल कुर्बान ......।याद आ गया । सभी बेहतरीन रचनाएं है। बधाई। Valentine Contest में आपकी कमी खलेगी। तथापि अभी चार दिन हैं आप चाहें तो दो पोस्‍ट डाल सकते हैं और नहीं तो किन्‍हीं तो पोस्‍टों का या ज्‍यादा का चयन कर उनके शीर्षक के साथ Valentine Contest चस्‍पां कर दीजिए। किसी भी प्रतियोगिता में भाग लेना महत्‍वपूर्ण है ना कि इनाम जीतना। क्‍योंकि प्रतिभागी ज्‍यादा व इनाम कम है। अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: bhaijikahin by ARVIND PAREEK

के द्वारा: Tufail A. Siddequi

भाई अबोध जी........... आप भी किस खेल मे फंस गए......... वास्तव मे जागरण वाले हमें गीता के कर्म के ज्ञान से दो चार करा रहे हैं......... की तुम कर्म करो फल के फेर मे मत पडो............ जैसा की आप राजकमल भाई को अपना गुरु कहते हैं तो उनसे नि:स्वार्थ ब्लॉग छापना सीख लें.............. वो हर दूसरे दिन एक नया ब्लॉग लिखते हैं ओर कभी जागरण वाले तो कभी कोई ओर उनके ब्लॉग को पाठकों की नज़रों से ओझल कर देता है ....... फिर भी लगे हैं........ ओर आपके ब्लॉग लोग खुद खोज खोज कर पढ़ते हैं........... आप फीचर्ड लेखक हैं............. आपके लेखों का इंतज़ार किया जाता है.......... आपने साथ जुड़े पाठकों को (प्रतिक्रिया) देखें ओर किसी फीचर्ड ब्लॉग पर आई प्रतिक्रियाएँ देखें ............ जवाब खुद मिल जाएगा............ आप हमारे फीचर्ड ब्लॉगर हैं............ तो कभी भी निराश न हों...........

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

bhai sahib ...adaab ! आप से टी बस एक यही दरख्वास्त है की आप एक दिन में सर एक ही पोस्ट किया करे ... ****************************************************************************************************** अबोध जी ....सादर अभिवादन ! आप के लेख पर टिप्पणियाँ पढ़ी और उनके जवाब भी पढ़े ..... जो भी हमारा लेख फीचर्ड होता है , उसके बाद उसमे कोई खास निशानी देखने कों नही मिलती ... की बाद में उसको देख कर कोई कह सके की इसमें दो सींग लगे थे इसलिए यह फीचर्ड हो गया .... आपने अपने हाल ऐ दिल कों भी ना पसन्द किये जाने की शिकायत की थी ...जबकि वोह टाप लिस्ट में आया था .... मेरे लिखे लेख से जब मैं कोई फायदा नही उठा पा रहा हूँ तो फिर आप आदरणीय निशा जी से प्रेरणा लीजिए .... कई बार ऐसा हुआ की मेरा कोई ब्लाग फीचर्ड हुआ , उसके मुकाबले में मेरा जो जो ब्लाग फीचर्ड नही हुआ उसको ज्यादा कमेण्ट मिले तो हमारे लिए तो अपने ब्लोगर साथियों का प्यार ही ज्यादा मायने रखता है ... भविष्य के लिए शुभकामनायो सहित धन्यवाद (वैसे अगर आप अपना नाम बदल कर अबोध बालिका रख ले तो आपको ज्यादा प्यार मिलेगा )

के द्वारा: rajkamal

अबोध भाई ,, बेरोज़गारी की समस्या को मंच पर उठाने के लिए धन्यवाद ! देश आज़ाद हुआ था तो सोचा गया था की अब समस्याओ को निदान होगा लेकिन हुआ इसके उलट.. समस्याए दिन बा दिन बढती गयी बेरोज़गारी भी उसमे प्रमुख है !! आज आप जितने भी काबिल हों बग़ैर किसी सिफारिश या रिश्वत के नौकरी मिलना लगभग ना मुमकिन है , दूसरी तरफ आप यह भी देखेंगे की MA / BA पास युवक एक ढंग की application तक नहीं लिख पाते है और ना इस उनका आचरण वैसे होता है जैसे एक पढ़े लिखे जागरूक व्यक्ति का होना चाहिए कुल मिलाकर हर तरफ बस कमिया ही ज्यादा नज़र आती है चाहे सरकारी स्तर पर देखे या सामाजिक स्तर पर ,, ना तो शिक्षक वैसे रहे और ना ही छात्र . बल्कि ज़्यादातर शिक्षक छात्रो से डरते ही नज़र आते है और अपनी इज्ज़त बचाने की खातिर खामोश रहना ज्यादा बेहतर समझते है ! बहरहाल मेरा मानना है की व्यक्ति , समाज को पहले आत्म मंथन करना चाहिए और इमानदारी से सोचना चाहिए की हम कहाँ जा रहे है ,, जिस समाज और देश का प्रतिनिधित्व करने वाले घोटालो / भ्रष्टाचार / सांप्रदायिक विभाजन / समाज में साम्प्रदायिकता के ज़हर बोने / छेत्रवाद फैलाने आदि जैसे आरोपों में घिरे हो और हम उनको वोट देकर चुनते हों सिर्फ इस लिए की वह मेरे धर्म के है या जाति के है या छेत्र के है या हमको फायेदा पंहुचा सकते हैं तो वह समाज और देश कहाँ जाएगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है !! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

के द्वारा: Rashid

के द्वारा: Syeds

अबोध जी, आपने सही कहा,आतंकवादी कार्यवाही करके,निर्दोषों की हत्या करने को, कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति बहादुरी नहीं कहेगा,यह कायराना हरकत हॆ.आतंकवादी कार्यवाही करने वाला,कभी भी सही मायने में धार्मिक नहीं हो सकता.यदि वह किसी तथाकथित धर्म के नाम पर इस तरह की कार्यवाही करता हॆ,तो वह धर्म का सही अर्थ ही नहीं समझता.जो समुदाय मानवता का दुश्मन हो-उसे कोई बुद्धिहीन ही धार्मिक कह सकता हॆ.दु;ख की बात तो यह हॆ,इस तरह के लोग-अपने-अपने तथाकथित धर्म का मुखॊटा लगाये घूम रहे हॆं.कभी ये मांलेगांव में कार्यवाही करते हॆं,तो कभी वाराणसी में.जरुरत हॆ तो आम जनता को जागरुक होने की ऒर इनका हिम्मत से मुकाबला करने की.
प्रिय अबोध जी कहने के लिए तो यूँ बहुत रहते हैं. जितना कहें फिर भी कम पड़ जाता है. सारी बातें आपके लेख में आही गयी. जहाँ तक मै भी जानता हूँ , किसी भी धर्म में निर्दोष लोगों की हत्या का फल जन्नत नहीं होता , और एक निर्दोष की हत्या पूरे मानवता की हत्या है . ऐसे लोगों को सजा ज़रूर मिलेगी. उसके इन्साफ में देर ज़रूर है लेकिन अंधेर कतई नहीं. और आपने मेरा पता निकाल ही लिया. इधर तो सब ठीक है. और दुआ है उधर भी ठीक रहे. आपका मेसेज स्पाम में चला गया था इस वजह से देख ही नहीं पाया. बस अभी देखा तो पाया बहुत देर हो गयी है. फिर भी जानबूझकर अनजान तो नहीं बन सकता न. फिर आया आपलोगों के पास. इसी तरह मेल मोहब्बत जारी रखें. इसी की कमी है हर जगह. आपकी बेबाक राय के लिए तारीफ़ है. चलिए अब चलता हूँ. खुदा हाफिज़

के द्वारा: jalal

अबोध जी बनारस में जो घटना हुयी निश्चित तौर पर शर्मनाक है,इसको अंजाम देने वालों का ताल्लुक इस्लाम से कतई नहीं हो सकता भले ही इनके नाम मुसलामानों वाले हों.यह निश्चित तौर पर यज़ीद कि औलाद हैं और न ही यज़ीद का कोई ताल्लुक इस्लाम से था और न ही आज के इन आतंकवादियों यानी नस्ले यज़ीद का. इस बेगुनाह बच्ची का खून बहाकर इन्होने साबित कर दिया है कि यह इस्लाम और इंसानियत दोनों के दुश्मन हैं...इनके अमल से इंसानियत शर्मसार होती है तो इस्लाम बदनाम हो रहा है और यज़ीद कि तरह ही यही इनका मकसद है . हमे इस तरह के असामाजिक तत्वों से सावधान रहना होगा और देश कि एकता और अखंडता पर कोई आंच नहीं आने देना है और यही इनके मुंह पर करार तमाचा होगा. प्रतिक्रया देर से करने के लिए माफ़ी चाहूँगा http://syeds.jagranjunction.com

के द्वारा: Syeds

अबोध जी बनारस में जो घटना हुयी निश्चित तौर पर शर्मनाक है,इसको अंजाम देने वालों का ताल्लुक इस्लाम से कतई नहीं हो सकता भले ही इनके नाम मुसलामानों वाले हों.यह निश्चित तौर पर यज़ीद कि औलाद हैं और न ही यज़ीद का कोई ताल्लुक इस्लाम से था और न ही आज के इन आतंकवादियों यानी नस्ले यज़ीद का. इस बेगुनाह बच्ची का खून बहाकर इन्होने साबित कर दिया है कि यह इस्लाम और इंसानियत दोनों के दुश्मन हैं...इनके अमल से इंसानियत शर्मसार होती है तो इस्लाम बदनाम. हमे इस तरह के असामाजिक तत्वों से सावधान रहना होगा और देश कि एकता और अखंडता पर कोई आंच नहीं आने देना है और यही इनके मुंह पर करार तमाचा होगा. प्रतिक्रया देर से करने के लिए माफ़ी चाहूँगा. http://syeds.jagranjunction.com

के द्वारा: Syeds

अबोध जी, मै इनसे सीधे तौर पे यही पूछना चाहता हूँ की ये पीछे से छिपकर वार करते है या फिर सामने से उत्तर तो यही मिलेगा की ये लोग छिपकर कही कूड़े में या फिर ऐसी जगह जहा हम लोग अपना मल त्याग करते है और वहा अपना हाँथ भी नहीं लगने देते ये वहा पर अपने कर कमलो द्वारा बम रखते है..और सोचते है की वीर है..साले कायर हो तुम लोग... अगर भारत का एक नवजवान इनके एक आदमी को एक कन्टाप मार दे तो पैंट गीली हो जाए सालों की..ये तो हमारे नमक हराम नेताओं की मेहरबानी से जिंदा है..बहादुरी देखनी है तो सिर्फ इतना जानिए की ..."कसाब को जिस सिपाही ने पकड़ा था उसके हांथो में डंडा था और कसाब के हाँथ में A.K.47.." अब बताइऎ कौन है बहादुर और कौन है कायर..  आकाश तिवारी http://aakashtiwaary.jagranjunction.com

के द्वारा: Aakash Tiwaari

प्रिय अबोध जी, वासना वह ज्वार है जिसमें जलने से कोई सिर्फ एक ही कीमत पर बच सकता है यदि उसे माता-पिता से संस्कार और पूर्वजों से शुद्ध रक्त मिला हो| आज जब व्यक्ति के सम्मान को झूठी शान और झूठी इज्ज़त कह कर पुकारा जा रहा है तो ऐसे में आप समाज में छुट्टा घूम रहे कामियों को 'क्या तुम्हारी कोई बहन नहीं है?' प्रश्न पूछ कर शर्मिंदा नहीं कर सकते| अब इन्हें शर्म नहीं आती क्योंकि इन्हें बाकायदा अदालत और क़ानून का संरक्षण प्राप्त है| एक बार लिव इन रिलेशन को पूरे रंग में आने तो दीजिये फिर देखिएगा कि किस तरह पीड़ित स्त्रियों को पैसे और रसूख के दम पर लिव इन रिलेशन में रहने वाली रखैल साबित करके यही सफेदपोश युवाओं के रोल माडल बन कर उभरेंगे| शरीफ नारियां फिर घरों की चारदीवारों में सर पटकेंगी और वेश्याएं आधुनिक सफल नारियों का तमगा लगा के बिना कपड़ों के सड़क पर घूमती नजर आएँगी| अच्छे लेख पर बधाई!

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: Harish Bhatt

के द्वारा: nishamittal

मनोज जी, भले हो आपको लगता हो की मै अब अबोध नहीं हूँ, पर मै तो जानता हूँ की मै कितने पानी में हूँ, मै केवल एक विद्यार्थी हूँ और लेखन में नौसिख्या, जहाँ तक मुझे लगता है की अगर हम अपनी इन्द्रियों को खुला रखें तो चारो ओर बहुत सारे विषय होते हैं जिन पर लिखा जा सकता है, पर अपनी कम ज्ञान के कारण मुझे लिखें के लिए बड़ा प्रयत्न करना पड़ता है तब जाकर कहीं को एक पोस्ट कर पाता हूँ, इश्वर से प्रार्थना है की किसी भी घर में इस तरह की स्थिति ना उत्पन्न हो ना ही किसी को ऐसे संतुलन की आवश्यकता है, आपके विचार मेरे लिए बहुत महत्त्व रखते है, क्योंकि आप विद्वान् भी हैं और लेखन की कला में प्रवीण भी, अनुरोध है की अगर कहीं लेखन में त्रुटियाँ दिखें तो अवगत कराते रहें http://abodhbaalak.jagranjunction.com

के द्वारा: abodhbaalak

नंदा दीप जलाना होगा| अंध तमस फिर से मंडराया, मेधा पर संकट है छाया| फटी जेब और हाँथ है खाली, बोलो कैसे मने दिवाली ? कोई देव नहीं आएगा, अब खुद ही तुल जाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा|| केहरी के गह्वर में गर्जन, अरि-ललकार सुनी कितने जन? भेंड, भेड़िया बनकर आया, जिसका खाया,उसका गाया| मात्स्य-न्याय फिर से प्रचलन में, यह दुश्चक्र मिटाना होगा| नंदा-दीप जलाना होगा| नयनों से भी नहीं दीखता, जो हँसता था आज चीखता| घरियालों के नेत्र ताकते, कई शतक हम रहे झांकते| रक्त हुआ ठंडा या बंजर भूमि, नहीं, गरमाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा ||..................................मनोज कुमार सिंह ''मयंक'' प्रिय मित्र अबोधबालक जी, आपको और आपके सारे परिवार को ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं || वन्देमातरम

के द्वारा: atharvavedamanoj

ऋतंभरा जी, मैंने अपने लेख में कहीं भी केवल युवा वर्ग को इस समस्या के लिए दोषी नहीं ठहराया है, ये सत्य है की परिवर्तन पृकृति का नियम है, आपने जो घूंघट का उदहारण दिया है वो एक हद तक सही भी है और आपकी सलवार कमीज वाली बात भी, पर मेरा प्रशन इन सब बातो पर नहीं बल्कि इस समस्या के उपजने और इसके असर के उपर था, आपको नहीं लगता की मैंने जो मूल प्रशन उठाया है वो संयुक्त परिवार के टूटने और इसके हमारे बच्चो पर पड़ने का था, सवतंत्रता अच्छी बात है पर बड़ो के कुछ कह देने को हस्तक्षेप मानना ये मेरी समझ से नयी पीढ़ी का दोष है. आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद, आगे भी आपके बहुमूल्य विचारों के प्रीतीक्षा रहेगी http://abodhbaalak.jagranjunction.com

के द्वारा: abodhbaalak

आदरणीय अबोध जी! यह सही है कि आजकल एकल परिवार कि तरफ झुकाव बढ़ता जा रहा है पर इसका एक मात्र दोष युवाओ को ही नहीं दिया जा सकता .परिवर्तन prakriti का niyam है पर इसे हमारे बुजुर्ग गण समझने को तैयार नहीं hain .jab छोटी छोटी बातो पे वही कई पीढ़ी पुराना रवैया अपनाया जायेगा तो टकराव होगा ही,मसलन jaisa एक naw वधु कि सास ने अपने ज़माने में ghunghat किया उतना आजकल कि पढ़ी लिखी लड़कियां नहीं करेंगी ,उन्हें अगर साडी में असुविधा होगी तो सलवार कुरता पहनेगी ही! सुबह चार बजे वे अपनी सास की तरह नहीं उठ सकती क्योकि उन्हें raat में देर तक अगले दिन की अपने ऑफिस जाने की व बच्चो के स्कूल की taiyari के लिए जागना पड़ सकता है aur भी कई दिक्कते हैं .हर बहु मिनी स्कर्ट नहीं पहना चाहती पर अब कोई बहु अनावश्यक शासन बर्दाश्त नहीं करेगी! संयुक्त परिवार मैं भी पसंद करती हूँ पर जितना यह व्यवस्था युवाओ के कारन डगमगाती है उतना ही बड़े भी दोषी है,

के द्वारा: Ritambhara tiwari

अरविन्द जी शैक्स्पीर ने शायद कहा था की वाट इस इन नेम, पर मुझे लगता है की नाम हमें धर्म, जात, क्षेत्र आदि में बाँट देता है, अब अगर मै हिन्दू हूँ और कुछ ऐसा लिखूं जो मुस्लिम समाज जो नापसंद हो तो वो सव्भाविक तौर पर कहेंगे की मैंने हिन्दू होने की वजह से ऐसा कह, और इसी तरह अगर मै मुसलमान हूँ और कुछ ऐसा लिखा जो हिन्दू धर्म के लोगों को ना पसंद हुआ तो वो भी इसे मेरे धर्म से जोड़ देंगे, इस लिए मै अबोध ही सही, रही बात मेरी फोटो को तो वो वास्तव में मेरी ही छाया है, आप विद्वान् व्यक्ति हैं समझ ही गए होंगे की मै क्या कह रहा हूँ, मै अपनी इस रचना में उसके रचियेगा का नाम अवश्य लिखता अगर मुझे पता होता, क्यों की जहा से मैंने इसे उठाया वहां पर उसके लेखक का नाम नहीं था और बाद में नेट पर सर्च किया तो भी नहीं मिला, फिर भी मै इसे आप सब के साथ बांटने के लोभ से बच नहीं सका इस लिए पोस्ट कर दी, आपके विचारों के लिए धन्यवाद, ऐसे ही इस अबोध का मार्गदर्शन करते रहें http://abodhbaalak.jagranjunction.com

के द्वारा: abodhbaalak

राज जी, ऐसे रचना मेरे बस की बात नहीं है, आपका अंतिम वाक्य ठीक से समझ में नहीं सका, आप ये कहना चाह रहे हैं की काश ये कविता मेरी होती? राज जी, कविता किसी को हो, जो लिखा है मै उसका पूरी तरह से समर्थन करता हूँ, इस लिए पोस्ट की. आज भले ही हम में विचारों को लेकर मतभेद हो, भले मै आपके, अश्वनी जी या चातक जी के विचारों से पूरी तरह से सहमत ना होता हूँ, लेकिन ये हमारे घर की बात है, हम आपस में भाई है, और घर में मतभेद होता ही है, उसमे क्या नया है लेकिन अगर कोई बाहर वाला आकर ये सोचता है की हमारे मतभेद का लाभ उठा कर वो हमसे हमारे घर का कोई हिस्सा छीन लेगा तो वो सपना देख रहा है. एक राज्य क्या, अपने देश की धरती का एक सेंटीमीटर भी हम किसी को नहीं देंगे. चाहे पूरा विश्व उनके साथ मिल जाए. कृपया अपने विचार के अंतिम पंक्ति को स्पष्ट कर दे, आभारी हूँगा http://abodhbaalak.jagranjunction.com

के द्वारा: abodhbaalak

प्रिय श्री अबोधबालक जी, आपनें न केवल अपने आपकों एक नाम के पीछे छुपा रखा है अपितु फोटो भी अपनी वास्‍तविक नहीं लगाई है । ऐसा क्‍यों ? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ । आज जब काफी समय बाद आपकी पोस्‍ट पढ़नें बैठा तो फिर यही ख्‍याल आया कि आप जैसा विद्वान व्‍यक्ति क्‍यों सामनें नहीं आना चाहता ? खैर यह आपकी मर्जी है । आपकी ताजा पोस्‍ट ■काश्मीर पर घडियाली आंसू - से लेकर ■एहसास ■मंहगाई मार गयी! ■एक मजबूर माँ ■क्या हम अयोध्या निर्णय से खुश हैं ? ■अभी भी संभल जाओ ! मैंनें सभी रचनाएं पढ़ी । एक मजबूर मॉं, एहसास व काश्‍मीर पर घड़याली आँसू जैसी काव्‍य रचनाएं मन को छू गई । भले ही रचनाएं किसी दूसरे की हैं लेकिन इन्‍हें आपनें हमारे लिए प्रस्‍तुत किया हैं । इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं । बस अच्‍छी रचना के लिए रचनाकार को भी यदि बधाई पहुँच जाती तो वो अवश्‍य ऐसी और रचनाएं प्रस्‍तुत कर पाते । आपकी स्‍वरचित पोस्‍टें ■मंहगाई मार गयी! ■क्या हम अयोध्या निर्णय से खुश हैं ? ■अभी भी संभल जाओ ! तीनों ही आपके मनोभावों को बेहतरीन तरीके से प्रस्‍तुत करनें में सफल रही हैं । अच्‍छी रचनाओं के लिए मेरी बधाई स्‍वीकार करें । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: bhaijikahin by ARVIND PAREEK

नाम तो आपने अबोध बालक लिखा है मगर लिखते है एक अच्छे लेखक की ही तरह... वाकई में महंगाई इस समय बहुत ज्यादा है... जब भी मै राहुल गाँधी जैसे नेताओं को किसी गरीब के यहाँ खाना खाते हुए न्यूज़ चैनेल पर देखता हूँ तो मुझे इन चैनेल वालों पर बहुत गुस्सा आता है की सब बिक गए है..ये क्या इन नेताओं से ये सवाल नहीं कर सकते"की श्री राहुल गांधी जी अभी-अभी जो दाल और रोटी आपने खाई है ये मजदूर पिछले साल दोनों चीजे ४० रुपये में खाता था आज १२० रुपये में खा रहा है जबकि आमदनी ठीक से १० रुपये भी नहीं बढ़ी तो क्या आपकी सरकार केवल खा सकती है लोगों को खिला नहीं सकती या यों कहे की खाते हुए नहीं देख सकती' फिर देखिये शायद ये राहुल गांधी भी बुखारी की तरह अपना आपा खो बैठेगे...

के द्वारा: Aakash Tiwaari

के द्वारा: K M Mishra

के द्वारा: razia mirza

के द्वारा: manishgumedil




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