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abodhbaalak


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क्या कुछ बदलेगा?

Posted On: 11 Feb, 2012  
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छोटी सी बात

Posted On: 21 Jan, 2012  
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ऐसा क्यों होता है?

Posted On: 23 Dec, 2011  
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क्या मै धार्मिक हूँ?

Posted On: 4 Dec, 2011  
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चलो चलें (जलें)

Posted On: 17 Nov, 2011  
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हम जानवर हैं, वहशी जानवर

Posted On: 1 Nov, 2011  
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आत्म – मंथन

Posted On: 21 Oct, 2011  
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अनकही अनसुनी शायरी

Posted On: 13 Oct, 2011  
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दर्दे दिल

Posted On: 3 Oct, 2011  
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वो तो हमारे ………

Posted On: 26 Sep, 2011  
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61 Comments

Page 1 of 512345»

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: rajeevsharma rajeevsharma

राजनीति से बढ़ कर अब कोई लाभ दायक बिजनेस है ही नहीं, एक बार विधायक / सांसद बन जाये तो फिर न जाने कितनी पुश्तें ……… सब से बड़ा विचार विन्दु तो यही है ही अबोध जी ..तो क्या अब किसी को वोट दिया ही नहीं जाए जैसे दौड़ में दस में एक गधा भी रहे बाकी लूले लंगड़े गधे के बीच तो वो कछुवा चाल वाले से आगे तो रहेगा ही .. रिजेक्ट क्या हम कर सकते हैं पूरा चुनाव अब सलमान साब की ही देखिये चुनाव आयोग और नियम कानून से भी ताल ठोंक रहे हैं .. हम तो इसी लिए कहते हैं की १०० में इतने बेईमान फिर भी मेरा भारत महान ...आंकड़ा आप ने लिखा देखा ही ..कौन उन्हें रोकें कौन तिक्त न दे आप उसको बाहुबली और पैसा वाला कहते हैं तो वाही तो ... निराशावादी आप नहीं ये वक्त सब को इसमें ठेल दे रहा है ... जय श्री राधे ..सुन्दर लेख भ्रमर ५

के द्वारा:

आदरणीय अबोध जी,नमस्कार सबसे पहले तो में निचे लिखे शशि जी के बातों से सहमत हूँ और जहाँ तक कुछ बदलने की बात है तो बदलाव तो संसार का नियम है उम्मीद रखिये जरुर बदलेगा हाँ ये बात जरुर है की इस चुनाव में ना बदले मैं बिहार से हूँ और कुछ दिनों पहले तक बिहार की राजनीतिक हालत भी यू पी के जैसी ही थी पर परिवर्तन हुआ और आज धीमी गति से ही सही यहाँ की सरकार एक अच्छी सासन व्यवस्था दे रही है कल किसी ने नहीं देखा निराशावादी ना होइए "हम भारत के लोग एक दिन जरुर बढ़ेंगे" हमें बढना होगा ............................................................................................................................................... आपसे नम्र आग्रह है की एक बार मेरे लेख को पढ़ें उसमें हमने कुछ कोशश लिखे है अपने और हमारे बारे में अपना महत्वपूर्ण सहयोग दें और मार्गदर्शन करे आपको धन्यवाद

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

महोदय, आपकी रचना 'छोटी सी बात' अपने आप में इतना विशाल अर्थ व दर्शन समाहित किए हुए है कि मेरे जैसे नये ब्लागर के लिए इसको बहुत सुन्दर व प्रेरक कहकर पीछे हटना ही अच्छा होगा। इसी के साथ एक अनुरोध कि समसामयिक चुनाव व मताधिकार पर भी अपनी किसी रचना के द्वारा हम सभी को प्रेरित व जागरुक करने का कष्ट करें एवं मेरे निम्न प्रयास पर अपना अमूल्य मार्गदर्शन करने का कष्ट भी करें। काश! ये चुनावी दबाव हर वक्त रहता चुनाव आते ही नजारे बदल जाते हैं कल तक के राजा अब जनसेवक बन? जाते हैं काश ये चुनावी द बाव हर वक्त रहता कुछ दिनों के लिए ही सही गरीब बेसहारा जनता का मनोबल तो ऊचा रहता पता नहीं कब तक इन्हे ढोते रहेंगें हम? लोकतांत्रिक देश में तानाशाही से पिसते रहेंगें हम कब हम बदलेंगें? कब ये बदलेंगें? इनका तो क्या कहना चुनाव आते ही ये हर पल रंग बदलेंगें हमें इसके सिवा और क्या चाहिये सिर्फ दो वक्त की रोटी और अपनी पहचान चाहिये बस इसीलिए है लगता कि काश? चुनावी दबाव हर वक्त रहता।

के द्वारा: jagobhaijago jagobhaijago

अबोध जी क्षमा चाहता हूँ, मैं इस विषय पर आपसे सहमत नहीं हो पा रहा हूँ। 1. मानवता के अतिरिक्त अन्य कोई धर्म नहीं हैं, अज्ञानतावश जिन्हे हम धर्म समझते हैं,वे धर्म नहीं, अपितु सम्प्रदाय हैं। 2. कुछ राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से सम्पन्न व्यक्तियों ने राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े व्यक्तियों का शोषण करने के लिये किया था। 3. निःसंदेह ईश्वर अज्ञान एवं डर की अनैतिक संतान है।  4. मजहब हमें सिखाता, आपस में बँटके रहना।    मजहब के अब सितम को मुझको नहीं है सहना।।   इंसान बनके आये, इंसान बनके रहीये,  हिन्दु इसाई हमको, बनना नहीं मुसलमां।।  मैं धार्मिक बड़ा हूँ, हिन्दु औ मुसलमां से, चाहे न कोई माने, सच किन्तु मेरा कहना।।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: D33P D33P

इंसान ऐसा ही है, ना पूरी तरह से मजबूर और ना ही पूरी तरह से सक्षम .जो इस पूरी सृष्टि को चला रहा है वही इसका बनाने वाला भी है और उसे ही इश्वर कहते हैं.हमें सही और गलत को समझने कि शक्ति दे, हम जात -पात , धर्म, क्षेत्र , प्रान्त से ऊपर उठ कर केवल और केवल भारतीय बने. आने वाला 26 जनवरी हमारे लिए केवल एक छुट्टी मनाने का दिन ना होकर एक ऐसा दिन हो जो हम्मे एक नयी उर्जा फूक दे , एक नयी उमंग दे... प्रिय अबोध जी सुन्दर प्रसंग और सीख ..सब उस परम शक्ति को मानें जानें उसका तो भय रखें मन में सच्चाई और प्रेम की राह चल पड़ें सब कुछ बदल जाए ...सब कुछ सार तो आप ने लिख ही डाला और क्या लिखना .. साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय सार सार को गहि रहे थोथा देई उडाय... हम तो आप की हाँ में हाँ मिला देंगे बस ....वसंत पंचमी और गणतंत्र दिवस की अग्रिम शुभ कामनाएं .. भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

अमिता जी आप जैसा विद्वान् तो नहीं हूँ पर आपने जो दो उदारहण दिए हैं, उस पर कुछ कहना चाहूँगा. बच्चो को उनके हाल पर कभी नहीं छोड़ता, वो तो माँ के उदार में भी उसके जीवन का इन्तेजाम करदेता है, और बूढों को उनके बच्चो के सही पालन पोषण की सीख देता है, आज के परिवेश में जिस तरह से बच्चो को पालना चाहिए वो कहाँ रह गया है, अगर सही तरह से बच्चो की परवरिश की जाये तो वो ....................., अब तो जैसे बच्चे देख रहे है वो वैसा ही कर रहे हैं खैर ये मेरी सोच है, की इश्वर के दया है जो हम सांस भी ले रहे हैं, और हमें हर सांस के साथ उसका धन्यवाद करना चाहिए, ये मेरा अपना दृष्टिकोण है .... :) आभार आपके अलग सी प्रतिक्रिया का पर इससे भी सोच को नयी दिशा तो मिल ही जाती है. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

के द्वारा: abodhbaalak abodhbaalak

प्रिय अबोध जी ..... सप्रेम नमस्कारम ! जिस तरह से आप इन दिनों अध्यात्म की तरफ अपने नैनो कदम तेजी से बढाते हुए इश्वर तथा उसे जुड़ी हुई बातो + मान्यताओं तथा सिधान्तो की बाते करने लगे है उससे पता चलता है की अब आप अबोधता को छोड़ कर सुबोधता में प्रवेश कर रहे है ..... यह बहरी और भीतरी रूपान्तरण आपमें सकारात्मक और उपयोगी तथा सुखदायक बदलाव लेकर आये इसी कामना और तमन्नाओं के साथ हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा रचना लिखने के लिए आभार – वैसे आजकल इस मामले में मेरी हालत भी कमोबेश आप जैसी ही है हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

अबोध जी नमस्कार, आपका आलेख निश्चित ही रोचक, मनोरंजक है, साथ ही अंत में सुन्दर संदेश देता है। किन्तु क्षमा माँगते हुये आपके विद्वान पात्र (जिसका आपने शायद नामकरण संस्कार नहीं किया है) के आधार - हीन कुर्तकों से सहमत नहीं हूँ। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ईश्वर अज्ञान एवं डर की अनैतिक संतान है।इसके जन्म का  एकमारत्र उद्देश्य यह आर्थिक,सामाजिक, राजनैतिक  एवं धार्मिक रूप से सम्पन्न लोगों द्वारा आर्थक, सामाजिक, राजनैतिक एवं धार्मिक रूप से पिछड़े हुये लोगों का शोषण करना था। जिसे करने में वो कामयाब भी रहे। हमारे पिछड़ेपन एवं सदियों तक गुलामी का कारण भी यही ईश्वर तथा धर्म है।  ईश्वर के न होने का प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि- चलो आपके विद्वान महोदय की बात कुछ पल के लिये मान लेते हैं कि ईश्वर ही सब करता है, उसीने सब कुछ बनाया है, जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, जल,थल,वायु, आन्तरिक्ष आदि। यहाँ तक कि समय भी उसी ईश्वर ने बनाया है, मैं आपके विद्वान से मात्र एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ कि समय को बनाने से पहले उन विद्वान महाशय के ईश्वर पास समय कहाँ से आ गया। अबोध जी मैं यह प्रतिक्रिया मात्र अपनी शंका के समाधान के लिये प्रस्तुत कर रहा हूँ। मेरा उद्देश्य किसी के हृदय को आघात पहुँचाना नहीं है।कृपया इसे अन्यथा न लें। अंत में आपका संदेश निश्चित ही हृदय में अंकित हो गया जिसके लिये आपका आभार एवं आपको बधाई....

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

बस अभी ही पढ़ी है कविता की ये पंक्तियाँ चिली के एंटी कवि निकानोर पार्रा की.... लगा कि आपके ब्लॉग पर  टिप्पणी के लिए उपयुक्त हैं बड़ा मुश्किल है भरोसा करना उस ईश्वर में जो छोड़ देता है अपने बच्चों को उऩके हाल पर बुढ़ापे औऱ बीमारी के तूफानों की दया पर मौत की तो कोई बात ही नहीं.... अब सोचें कि क्या वाकई ईश्वर है औऱ यदि है तो वो इस अमानवीय तरीके से इंसान के दुखदर्द से निस्संग और  उदासीन कैसे रह सकता है...।  औऱ रही देश की बात तो भई व्य़वस्था का अस्तित्व इतना दानवाकार होता जा रहा है कि उसमें लाखों इंसानों  का खून भी कम पड़ता है।  अजीब लगेगा ये कमेंट, लेकिन ये भी एक दृष्टिकोण है सोचने का.... ;-)

के द्वारा:

अबोध जी, नमस्कार! इतनी रात को आपने परमात्मा (ईश्वर) के अस्तित्व और कर्म के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया है जो अकाट्य सत्य है. आपका ह्रदय कितना विशाल है कि आपने लगभग सभी ब्लोग्गर्स की टीम का गुणगान भी बड़े आराम से चन्द शब्दों में कर दिया! .... आपने भारतीय होने का आह्वान कर सबको चौंका दिया. ........ "इश्वर से प्रार्थना है कि हमें सही और गलत को समझने कि शक्ति दे, हम जात -पात , धर्म, क्षेत्र , प्रान्त से ऊपर उठ कर केवल और केवल भारतीय बने. आने वाला 26 जनवरी हमारे लिए केवल एक छुट्टी मनाने का दिन ना होकर एक ऐसा दिन हो जो हममें एक नयी उर्जा फूंक दे , एक नयी उमंग दे , जिसमे हम प्रण करें कि हम अपने को बांटने वाली हर शक्ति का विरोध करेंगे और उन्हें कामयाब नहीं होने देंगे . देश सर्वोपरि है और उससे बढ़ कर कुछ नहीं." इससे अच्छा सन्देश कुछ भी नहीं हो सकता है! बहुत बहुत आभार आपका! आपका हार्दिक सम्मान करता हूँ. डाक्टर साहब की प्रतिक्रिया भी लाजवाब है!!! जय हिंद!! जय भारत!!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

अबोध जी मैंने आपकि लिखि बातो को कयी बार पढा और फिर सोचा कि प्यार क्या  है......! मै अभी 22 साल का हु और मुझे भी किसि से प्यार  है...और मुझे पता है कि प्यार अक्सर दूरियो से होता है ] आप जिससे प्यार करो तो जरुरि नहि कि जिन्दगी भी आपकि उसी के साथ बिते..और  प्यार का सहि मतलब ये है कि आप किसि कि भावनाओ को बहुत अच्छी तरह से समझते हो और आप उस  सख्स कि हर मजबुरियो का आदर करते हो..! और प्यार का ना तो कोई धर्म देख कर होता है और ना ही जाति.....प्यार तो केवल विचारों से होता है..! मै आपकी कहि एक बात को सहि ठहराउंगा की आजकल के युवा मुवी देख कर विचलित हो रहे है और प्यार का अर्थ वो कामुकता से जोड रहे है..! मगर मै अभी भी उनमे से कुछ लोगो मे प्यार के सार्थक पहलु को समझा पाया हु..और मेरी आप लोगो से यहि विनति है कि आप भी युवावो को प्यार का सही मतलब समझाने कि क्रिपा करे..! मै किसि भी मां बाप को गलत नहि कहुंगा क्युंकि हर लडकी और लडके के मां बाप अपने बच्चों की खुशियां चाहते हैं मगर उनकि अपनी मजबुरियां होती है और वो है समाज..! ""मेरा आप सभी से यही अनुरोध है कि अगर आपको आपका प्यार ना मिले तो कभी भुल कर भी ना सोचना कि उसको आपसे प्यार नहि था""

के द्वारा:

पर ये प्रेम कहाँ रहा , प्रेम तो एक सव्भाविक प्रतिक्रिया हैं जो सोच विचार करके नहीं किया जाता.. जब माँ बाप अपने खून का /दूध का वास्ता दें, बाकी बहनों के रिश्ते की बात करें, समाज में कटने वाली नाक का हवाला, और ना जाने इस तरह के कितने इमोशनल ……………., तो लड़की का उस समय अपने बात पर खड़ा रहना आसान नहीं होता .. प्रिय अबोध जी प्रश्न के साथ साथ सारे असमंजस ..हालात का भी आप ने झरोखा दिखा दिया है तो ..भ्रमर का झरोखा अब क्या करे ?,,,, ऐसा ही होता है लेकिन चूंकि हमारा समाज अभी पूरी तरह पाश्चात्य सभ्यता को नहीं पचा सकता है इसलिए लड़के लड़किओं को आगे बढ़ने से पहले अपने मन को समझा ले रास्ता चुन लेना चाहिए या तो पर्वत से अडिग रहने का प्रेम पर फ़िदा होने का या माँ बाप समाज घर की इज्जत का ...दो नावों पर पैर रखना इतना सहज नहीं ..हाँ पैर बहुत मजबूत हों उतने आधुनिक हों तो बात जुदा है ..कुत्ते भौंके हाथी चलता रहे मस्त .. आनर किल्लिंग से कोर्ट भी त्रस्त है आज ..आप ने देखा होगा जिस बच्चे को इतने प्यार से त्याग से लोग पालते हैं पढ़ते हैं वो सम्मान आन बान में दाग लगा दे तो ?? इस लिए प्रेम प्रेम रत्ना आसान है निभाना बहुत मुश्किल ...जय श्री राधे भ्रमर ५

के द्वारा:

आदरणीय अबोध बालक जी मुझे ये ब्लॉग पहले ही पढ़ लेना चाहिए था , आपने बिलकुल उचित लिखा है और मुझे यकीन है की कई बुध्जिवियों को ये रास भी नहीं आएगा! वास्तवमें हम भारतीय बड़ी जल्दी लोगों से प्रभावित हो जाते हैं , इसमें कोई संदेह नहीं की वर्तमान सरकार के नेतृत्व में भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा को भी लांघ गया है , पर इसका जिम्मेदार सिर्फ एक दल या फिर राजनीति को ही मानना उचित नहीं है , क्यूंकि हम सब इसमें पूरी तरह शामिल हैं , कोई कांग्रेस या बी.जे. पी के लिए भ्रष्टाचार नहीं करता वो अपने परिवार को दुसरे से ज्यादा खुश रखने के लिए करता है ,मैंने भी देखा है जो सरे आम भ्रष्ट हैं वो अन्ना अन्ना करके अपने को देश का सबसे बड़ा सेवक सिद्ध कर लिया है , और उनकी टीम के कुछ सदस्यों का संदिग्ध गतिविधियों में सम्मिल्लित होना अछि बात नहीं है अतः हमें दूसरों में दोष निकालने से पहले अपना दमन साफ़ करना होगा! हमें विस्मय हुआ तब जब उन्होंने राजनीति में आने की समर्थ होने के बावजूद इससे न जुड़ने की बात की क्यूंकि उनकी निगाह में राजनीति गन्दी है! अब भला आप बताईये की क्या बिना राजनीति में अछे लोगों के आये हुए कोई भी जन कल्याणकारी काम व्यापकता से कर सकते है , कभी नहीं अच्छे लोगों का राजनीति में आना इस देश की सबसे बड़ी आवश्यकता है! अच्छे लेख के लिए आपका हार्दिक आभार!

के द्वारा: gopesh gopesh

अवोध जी ; सार्थक लेखन पर वधाई ! विगत वर्ष एक लेख "दब्बू दबंग और दौलतमंद दिलवाले " के शुरुआती दो पेराग्राफ में उदाहरण ' खान ' साहब के संभ्रांत परिवार का देने की भूल के कारण लेख पूरे वर्ष प्रतिक्रिया विहीन रहा, इस वर्ष संपादित कर 'खान' साहब को 'सिंह' साहब बनाने पर वही लेख अन्य मंचों पर भी चर्चा में ..... एक अन्य अति महत्वपूर्ण विषय ईश्वर पर लिखे लेख "वो वेनाम सर्व शक्तिमान " को पांच-पाँच बार पुनर्प्रस्तुत करने पर भी हमारे मंच पर 'फीचर ' होना नसीब नहीं हुआ !!! कारण शुरूआती पेराग्राफ में ईसाई धर्म के अधिक प्रचलन का तार्किक कारण देने की भूल.....हालाकि अन्य मंचों पर अच्छा प्रतिसाद भी ...,, इसमें स्वयं मैं भी सम्मिलित हूँ ! आखिर "सम्मान हत्या " में सन्दर्भ नामों में परिवर्तन कर मैंने भी नापुन्शाकता का प्रदर्शन किया ही,,,,, यदि इस या इस जैसे मंच के बुद्धिवादी ब्लोगर ही इतने एकपक्षीय हैं तो आम आदमी को क्या दोष दें ,,,,, इसीलिये जिस तरह १९८८ में मुद्रण माध्यम से दूर हुआ उसी तरह चुपचाप समूह लेखन से भी ,,,, जय हिंद !!!

के द्वारा: Charchit Chittransh Charchit Chittransh

ऐसा क्यूँ होता है?,क्योंकि हम सभी सामान्य रूप से बेईमान है और बनावटी जिन्दगी जीते हैं । हम सभी जानते हैं कि जिस धर्म की बात हम सभी करते हैं वह मानव-निर्मित धर्म है अर्थात् प्राकृतिक धर्म नहीं है ।मानव -निर्मित धर्म होने के कारण और इस दिखावटी धर्म को वास्तविकता से अधिक मूल्य देने के कारण ऐसी असमन्जसपूर्ण स्थिति उत्पन्न होती है । समाज में ऐसी जो घटनाएँ कभी कभी घटती है,पूर्व में भी एसा होता रहा है और आगे भी एेसा होता रहेगा,आपत्तियाँ तब भी होती थी और कदाचितत आगे भी होती रहें, शायद न भी हों ।मेरे विचार से आने वाले दिनों में ऐसी घटनाओं पर विरोध स्वतः समाप्त हो जाएगा ।जैसे-जैसे पढ़ाई का स्तर बढ़ता जाएगा, ऐसी समस्याएं समाप्त हो जाएगी ,तब तक के लिए, विशेषकर माँ-बाप एवं अभिभावकों को थोड़ा सचेत,जागरूक और खुले दिमाग का होने की आवश्यकता है ।ऐसा होने पर बच्चों को उचित-अनुचित,सही-ग़लत की जानकारी उम्र के साथ-साथ अपने आप मिलती रहेगी ।आशापूर्वक प्रयास ही हम सभी के हाथ में है और इसे ही करने की सोचनी चााहिए । सही दिशा में सोचने और करने वाले की सहायता ईश्वर भी करते हैं ।

के द्वारा:

"आज आम समाज के लडके लडकियां समजदार हो गए हैं । अगर पेम करना हो तो भी केल्क्युलेटर ले के बैठ जाते हैं । सब गीना जाता है । अगर टोटल बराबर बैठता है तब ही आगे की बात होती है" भरोडिया जी, आपने प्रेम की नहीं, बिजनेस के बात की है जहाँ पर हानि लाभ को कल्कुलैत करने के बाद ......................, प्रेम की स्वाभिकता ही ख़त्म जो जाती है इससे, और इस तरह के कदम ( प्रेम में पड़ना या शादी करना) केवल ना समझ ही नहीं करते बल्कि व्यक्स्त, समझदार और समाज में अपना नाम रखने वाले भी करते हैं, अंतर ये है की अगर वो शक्ति शाली है तो वही समाज अपनी पूछ दबा कर बैठ जाता है और अगर निर्दन हो तो .............. आभारी हूँ आपकी प्रतिक्रिया के लिए और आगे भी आपसे सदा अपने विचारो से अवगत कराते रहेने का अनुरोध है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

के द्वारा: abodhbaalak abodhbaalak

प्रेम तो कुदरत की देन है, भाई । लेकिन कुदरत की ऐसी बहुत सी देन है, सबको फोलो नही कर सकते । अगर माना जाए की लोक शाही है तो आदमी अगर चाहता है की वो कुदरत की दी हुई हर व्रुत्ति को जीना चाहता है तो फीर से पाषाण्युग में जाना पड जाता है । वासना, आकर्षण या प्रेम सब एक ही है । क्षणिक या लंबा हो सकता है । ये तो हर सामान्य आदमी को हो जाता है । लेकिन वो बोलता या कोइ हरकत नही करता , वो जानता है ईस का कोइ मतलब नही । वो जानता है उसे समाज के बने टेंप्लेट में ही रहना है, बाहर गया तो फाईल करप्ट हो जाती है । मैने बात कही वो आम लोगों की कही आप सब बात कह रहे हो वो अपवाद की बातें है । नासमजी में, अनजाने में या विद्रोह की वजह से ऐसी घटनाये हो जाती है लेकिन पूरे समाज की तुलना मे बहुत ही कम संख्या मे होता है । आज आम समाज के लडके लडकियां समजदार हो गए हैं । अगर पेम करना हो तो भी केल्क्युलेटर ले के बैठ जाते हैं । सब गीना जाता है । अगर टोटल बराबर बैठता है तब ही आगे की बात होती है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

धन्यवाद आपकी प्रतिक्रिया के लिए दिवा जी. परिपक्व सोच है आपकी, और निसंदेह आपने जो कहा है वो काफी हद तक ठीक भी है, प्यार सोच के नहीं होता ये आपने भी माना है, और अगर मान ले की आपके घर वाले आपकी शादी करने के लिए तुल जाएँ की तुम्हे उसके साथ शादी करनी ही है और आप नहीं चाहते तो आपके पास दूसरा क्या रास्ता है? या ये के आप उनकी बात मान ले और उससे शादी कर लें, या अड़ जाएँ के नहीं करना, या ये के अपनी जान दे दें और या ये के भाग जाएँ, अब ये निर्भर करता है की प्यार का स्तर, प्यार करने वाली की सोच, उसकी इच्छा शक्ति और ...................... बहुत सरे लोगो ने कहा है की प्यार पाना ही नहीं है, और अगर विरह भी मिले तो ..........., पता नहीं अब क्या कहें, और क्या समझे,

के द्वारा: abodhbaalak abodhbaalak

प्यार में मिलन ही हो ये जरुरी तो नहीं | प्यार पा लेने का नाम नहीं होता | त्याग समर्पण और विश्वास मिल कर ही प्यार बनता है | अपने माँ बाप परिवार कि इज्जत ताक में रख कर प्यार को पाने का जो ये कदम है जिसे भाग जाना बोलते है मेरे हिसाब से तो सबसे गलत कदम है और फिर ये कैसा प्यार जिसमे अपनी, अपने परिवार कि इज्जत कि धज्जियाँ उड़ा दी फिर लड़के के ऊपर इल्जाम भी लगा दिया जाये ये कोरी भावनाये है जो लड़के के साथ है तो उसके लिए परिवार के साथ है तो उसके लिए अगर उस लड़की को सच में प्यार होता तो न तो वो अपने परिवार कि रुसवाई ही करती न अपने प्यार कि | प्यार सोच के नहीं किया जाता मगर प्यार हो जाने के बाद भी सोचा न जाये कि अपने प्यार कि रुसवाई किजाए है या समझ से प्यार को जीता जाये ये तो प्यार करने वालो के ऊपर है | मेरे साथ कॉलेज में एक लड़की थी जो किसी विजातीय लड़के से प्यार करती थी वो दोनों जानते थे कि घर वाले उनके प्यार को स्वीकार नहीं करेंगे मगर प्यार सोची समझी नीति तो है नहीं | मगर प्यार हो जाने के बाद दोनों ने ऐसा कुछ कदम नहीं उठाया बल्कि समझ से काम लिया लड़की आज नेशनल बैंक में पी ओ है और आज भी वो इस इंतजार में है कि घर वाले इस रिश्ते को काबुल करे कोई जल्दी नहीं प्यार है तो है बस उसी प्यार में एक ताकत के साथ खुशी के साथ जी रहे है |

के द्वारा:

अबोध जी नमस्कार ये कहानी आजकल हर किसी की प्रेम कहानी हो गयी है .. जाट पट की समस्या भी न हो तो भी जब दो प्यार करने वाले या यु खाइए की एक दुसरे के आकर्षण में पड़कर जब दो जन भाग जाते है तो अंत यही होता है ... इन कहनियों में अक्सर ये भी देखने को मिलता है की इस तरह के केस में दोनों ज्यदा समझदार नहीं होते अभी पढ़ रहे होते है .. यु कहिये की जवानी का नया जोश फिल्मो का असर और वास्तविकता से बहुत दूर के सपने ... काश के लोग समझे की प्यार क्या है ? सिर्फ पाना ही सब कुछ नहीं होता ... घर से भाग कर प्यार को पाना और जो घर में सब बचपन से प्यार करते है उस प्यार का क्या ... अंतहीन बाते है ये इनका कोई हल नहीं .. जानते हुए की भी कुछ गलत हो रहा है हम दिल के हाथों मजबूर होकर गलत कर देते है और बाद मे बदनामी , मौत या फिर सिर्फ पछतावा रह जाता है ...खैर इस बारे मे जितना लिखा जाये कम है .. और यु भी प्रतिक्रिया लेख न बन जाये इसलिए यही अंत करती हूँ बहुत खूब लिखा अपने आभार

के द्वारा: roshni roshni

बहुत सुन्दर लेख. किसी को पाना किसी को खोना, कभी हसना कभी रोना, कभी जागना तो कभी सोना बस यही है इस जहाँ में प्रेम का कोना. प्रेम करने के काबिल यदि सही में कोई है तो वह जिसे कभी कोई हमसे छीन नहीं सकता, जो कभी न रुद्ता है और न ही जिसे मनाने की ही कोई आवशयकता है. जो सदा एक समान रूप से सब पर प्रेम की वर्षा करता रहता है, उस पर कभी समय और काल का असर नहीं पड़ता. मेरे अनुसार मात्र व्ही हमारे प्रेम के काबिल है. यदि औरो में भी हम उसके दर्शन कर उसे प्रेम कर सके तो कभी भी वह प्रेम हमें दुःख और कष्ट न दे सकेगा. अबोध जी यह सब मात्र फिलोसोफी नहीं है, यह सत्य है और इसे स्वयं आजमा कर महसूस किया जा सकता है. और यह प्रेम ही शास्वत सत्य है.

के द्वारा: Amar Singh Amar Singh

के द्वारा: डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज" डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

प्रिय अबोध भाई ...... नमस्कारम ! आप तो इस बात को जानते ही है की मैं खुदा का बेटा हूँ ..... हर रोज मेरी नई -२ जरूरते होती है –नई -२ इच्छाए होती है ..... मैं भगवान से यह अपेक्षा+आशा रखता हूँ की वोह मेरे प्रति अपना पिता वाला फर्ज निभाए ..... जो वोह बिना मांगे देता है + मेरा माँगा हुआ देता है अगर मैं उससे संतुष्ट नहीं हुआ तो उससे और मांगता हूँ + दुबारा मांगता हूँ + बार बार मांगता हूँ ..... अगर वोह दे देता है तो ठीक अगर नहीं देता तो मेरी मांग यथावत रहती है .....इस प्रार्थना के साथ आपने जो सशर्त देने की कोशिश की थी उसको मैं अपनी कमियों की वजह से ग्रहण नहीं कर पाया .... मुझ पर ऐसी किरपा करे की अगली बार ऐसी गलती न हो .... लेकिन एक ही गलती बार बार हो रही है हर बार हो रही है ..... खैर यह हमारा आपसी मामला है ..... हा हा हा हा हा हा :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

अबोध जी, धर्म व धार्मिकता की परिभाषा को जानने समझने के लिए ग्रन्थ, अनुभव व अनुभूति की महान आवश्यकता पड़ेगी. भारतीय सन्दर्भ में धर्म का स्वरुप लक्षण व उद्देश्य अन्य दर्शनों से पूर्णतः भिन्न है, मैं दार्शनिक अथवा शास्त्रीय विवेचन में नहीं जाना चाहूँगा टिप्पड़ी दीर्घ हो जाएगी, किन्तु आप जिस धर्म की बात कर रहे हैं वह वस्तुतः योग व साधना है जिसका पालन लोक में साधारण नहीं, निष्कामता की हम बात तो कर सकते हैं किन्तु प्राप्ति व पालन सुलभता से करतलगत नहीं है. यदि लेन देन व भय के विचार का प्रश्न है तो भय से मर्यादित रहना निर्भय उद्दंडता से श्रेष्ठ है व व्यवहारिक भी, सामान्य धर्म यही है ऐसा मेरा विचार है.

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

अबोध जी नमस्कार, धार्मिक होने का अर्थ ये नहीं की हमेशा ही पूजा पाठ में लीन रहे . मेरे हिसाब से अगर हर मनुष्य अपने हर फ़र्ज़ को कायदे से निभाए चाहे वो उसके अपने माँ बाप की तरफ हो , चाहे उसके अपने बच्चों की तरफ हो , चाहे उसके अपने आस पडौस की तरफ हो , चाहे समाज की तरफ हो , चाहे देश की तरफ हो तो मेरे विचार में वह इंसान धार्मिक है वो नहीं जो चार टाइम पूजा करे और अपने एक भी फ़र्ज़ अछे से ना निभाए . आज हमारे देश में वृधा आश्रम बढ़ते जा रहे हैं क्यूंकि बच्चे अपना फ़र्ज़(धर्म) नहीं निभा रहे हैं , देश में भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है क्यूंकि उसके नागरिक अपना फ़र्ज़(धर्म) भूल गए हैं ....... हम धार्मिक तभी होंगे जब हम अपने सरे फ़र्ज़ निभाए ... धन्यवाद...

के द्वारा: mparveen mparveen

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

आदरणीय अबोध जी नमस्कार, मै नहीं समझ सका की कैसे धर्म और डर का तालमेल हो गया. धर्म तो एक ही था मानवता का. अब उसको बचाने के लिए मायावती जी जैसे किसी धर्म प्रधान ने उसके टुकडे कर दिए. आप देख सकते हैं कोई भी धर्म मानवता के खिलाफ जाने की बात नहीं कहता सभी धर्म मानवता को प्राथमिकता देते हैं हाँ होता कुछ और ही है क्योंकि कोई ठीक से समझा नहीं सका. जहां तक बात इश्वर भक्ति की है तो साहब यकीं मानिये की यदि इश्वर बोलता होता तो इश्वर के भक्त ढूंढने से भी नहीं मिलते. हम तो हमेशा यही मानते हैं की इश्वर सदा सबका भला ही करता है.यदि ये सत्य है तो उस बच्चे से पूछिये जो माता पिता के साथ भगवान् के दर्शन करने निकला था और रास्ते में दुर्घटना में वह अनाथ हो गया.चलो और अधिक नहीं कहता वरना लोग मुझे अधर्मी कहने लगेंगे. आपने सही लिखा है लोग स्वार्थी हो गए हैं और यही उनका परम धर्म है.धन्यवाद.

के द्वारा: akraktale akraktale

धार्मिक होने के लिए लेन देन का रिश्ता, मेरी समझ से तो सही नहीं है, ये तो सौदा है न कि.. प्रिय अबोध जी हम बड़े स्वार्थी हैं और बिना कुछ स्वार्थ के न कुछ मानते हैं और न करते हैं ..इस लिए समाज को एक अच्छी दिशा में बाँध कर रखने के लिए हमने कुछ न कुछ तरीके ईजाद किये और अपनी अच्छी बातों को मनवाने के लिए ईश्वर का भय दिखा उसे धर्म से जोड़ दिया गया ..बहुत सारी काम की बाते लोग जो किसी से भी नहीं डरते इस कारण कर जाते हैं ..आप ने देखा होगा किसी बच्चे को दूध पिलाने में कितनी जद्दो जहद ..हम डराते हैं पी लो नहीं बिल्ली आ जाएगी ..शेर आ जायेगा ..नहीं तो पी लोगे तो चंदा मामा आयेंगे वे तुम्हे दुलारायेंगे ..बहुत कुछ ऐसे ही ..जैसे आक्सीजन के लिए पीपल के पेड़ में देवी देवता ..नीम के गुण के लिए ..नीम में शिव जी ...बहुत कुछ ..... धर्म से जुड़ जाने पर हम कुछ समय तो अच्छा करने ही लगते हैं ...खुराफाती हो भी ... और जो आप ने उस परम पिता परमेश्वर के विषय में कही वो तो शत प्रतिशत सत्य है ..बिना किसी मांग के पूजा करें तो बात ही निराली है ..पूजा और धर्म थोडा अलग हुआ न ? भ्रमर

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

डॉ साहब नमस्कार आपने धर्म के उदय की बात में होगा होगा लिखा है, लेकिन ये हुआ ही है । और वो सब राजधर्म की तहत हुआ है । वर्तमान में मानव बुद्धि की बात करें तो मैने एक जगह कहा था - ईतिहास के सबसे बडे रुषिमुनी से अधिक ज्ञान आज के एक आम प्रोफेसर के पास होता है । ये बात लोगो को हजम नही हुई थी । धार्मिकता,पूराना वही सोना, ये सोच आदमी के डी.एन.ए मे घुस गई है । बायोलोजीकली आदमी का दिमाग विकसित हो गया है साथ साथ आज हमारे पास पूरे विश्व के देशों के ज्ञानियो का ज्ञान उपलब्ध है । ये कलेक्टिव ज्ञान ही ज्ञान होता है, कोइ भी व्यक्ति के ज्ञान से उपर है, भले महात्मा गान्धी भी क्यो न हो । आज का आदमी जानता है मानता है फीर भी उसका उसका डी.एन.ए उसकी टांग खिच के धार्मिकता की और ले जाता है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आदरणीय अबोधबालक जी, सादर. मेरे विचार से सभ्यता विकसित होने की प्रारंभिक अवस्था में ही सामाजिक व्यवस्था को शांतिपूर्ण तरीके से अनुशासित रखने के लिए "धर्म" शब्द का आविष्कार और उसका निरूपण किया गया होगा. तत्कालीन समय में इसे एक भयकारी और वजनदार रूप देकर एक अदृश्य शक्ति से जोड़ दिया गया होगा, जिससे भयभीत होकर समाज में शान्ति और सहजता बनी रहे. "भय" जो प्राणी मात्र के स्वभाव में अविछिन्न रूप से मौजूद है, इसी का सहारा लेकर यह धर्म और उसकी भावना को निरूपित किया गया होगा. यह उस समय की आचार संहिता भी होगी. वर्तमान में मानव बुद्धि उस समय से सहस्त्र्गुना विकसित रूप में है. वह तर्क कुशल हो गई है. इसी वजह से आज धर्म का वह रूप नहीं है, जो उस समय था. आज धार्मिक अनुष्ठान औपचारिक हो गए हैं, और इसमें डर कम , लालच का अधिक समावेश हो गया है. सोचने को मजबूर करने वाली रचना. बहुत धन्यवाद.

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

अबोधभाई नमस्कार सी.एन.जी (सिगरेट का धुआं) पर चलनेवाली गड्डी में जो नुकसान होता है वो नीचे वाजपाईभाई ने अच्छी तरह बताया है । सी.एन.जी से गाडी चलाने मे मजा आता है या टेण्शन दूर होता है ये भ्रम है, आदत हो जाती है वो भी भ्रम ही है । आदत नही एक जरूरत बन जाती है । आदत छुट सकती है जरूरत नही । गड्डी का दो प्रकार है । एक में जीतना भी सी.एन.जी डालते रहो उस का गियर ऐसा होता है के वो सी.एन.जी को ध्यान में नही लेता, अपना पूरानावाला काम किये जाता है । ऐसी गड्डी सी.एन.जी आसानी से छोड सकती है । दूसरी मे गियर सी.एन.जी के आधार पर चलने लगता है । सी.एन.जी नही मिलने से गड्डी रूक जाती है । छोडने के लिये कितने भी कसमे-वादे करवाओ वादे तो वादे ही रहते है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आदरणीय भ्रमर जी ….. सादर प्रणाम ! आपसे एक विनम्र निवेदन है की या तो लड़किया (अनछुई कलिया) दो देखना और अगर एक ही हो तो उसको मेरी तरफ से हमारे शादी के लायक +बेसब्र अबोध बालक जी को गिफ्ट कर देना क्योंकि उन्होंने सन्नी लियोन पर मेरे हक में अपना दावा छोड़ा था ….. हा हा हा हा हा हा हा जय श्री राधेकृष्ण surendra shukla bhramar5 के द्वारा December 1, 2011 प्रिय राज भाई वैसे तो आप जानते हैं की केवल एक दो नहीं भौंरे तो न जाने कितनी कलियों को चुन चुन सुन्दरता को चाहने वालों -आशिको तक सन्देश पहुंचा देते हैं …वैसे रही प्यारे अबोध जी की बात तो वे बड़ी मुश्किल से तो सामने आते हैं बड़े दिनों बाद अब कलियों फूलों के चक्कर में पड़े तो न जाने और कितना छुप जाएँ … ह हा….. वैसे आप कहे हैं तो उनके पास जाऊंगा …देखता हूँ उनका मन आज कल कैसा है …. एक प्रश्न आप से गुप्त रूप से पूछना चाहता हूँ ये फिल्म उतनी क्यों नहीं चली जिस पर आप कई बार आये ? जब अधर छुए तो तन मन कांपा ............आप की नजर ? जय श्री राधे भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

अबोध जी, घूम्रपान के बारे में लिख कर आपने सराहनीय कार्य किया है। आप तो इस दुष्‍प्रवृत्ति दूर रहे हैं , लेकिन मैंने 25-26 साल अंधाधुध सिगरेट पी है। कुछ अनुभव जन्‍य निवेदन-‍ - धूम्रपान शरीर को ऐसे खोखला करता है जैसे घुन लकडी को। स्‍टैमिना कमजोर हो जाता है। -गले की खराबी ,पाचन  तंत्र कमजोर हो जाना, फेफडे कमजोर होजाने पूरी सांस न ले पाना, चलने-सीढी चढने में सांस फूलने लगना, ठीक से नींद न आना,रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाना, सर्दी-गर्मी ज्‍यादा लगना, ठंठ और ठंठी चीजों से एलर्जी हो जाना, आये दिन कफ-खांसी से दोचार होना, मानसिक एकाग्रता में कमी और स्‍वभाव का चिडचिडा हो जाना  जैसी अन्‍यान्‍य कई बीमारियां धूम्रपान की सीध देन होती हैं।आसपास रहने वाले को, बीबी-बच्‍चों को बिना पिये नुकसान पहुंचता है। - लत लग जाने के बाद छोडना कठिन होता है। सामान्‍यत: हार्ट अटैक वगैरह के बाद ही लोग छोड पाते हैं। धीरे धीरे की अपेक्षा एक बार में झटके से दृढ संकल्‍प पर छूटती है। धीरे धीरे यह लत नहीं छूट पाती। -धूम्रपान के साथ शराब वगैरह की भी आदत है तो करैला नीम चढा हो जाता है।  शोबाजी के अलावा फायदा एक भी नहीं है। नुकसान ही नुकसान है।  -नियमित दिनचर्या है और साफ हवा में ब्‍यायाम-प्राणायाम आदि करते हैं तो 24 घंटे में चार -पांच सिगरेट तक पी  जा सकती है। दुष्‍प्रभाव प्राय: नहीं होंगे। लेकिन , वह भी सुबह और खाली पेट नहीं । -

के द्वारा:

आदणीय अबोध जी, नमस्कार.. बहुत दिनों के बाद इस मंच पे नज़र आये आप..बहुत ही गंभीर मुदद्दे के ऊपर एक अच्छी रचना..धूम्रपान इंसान को अंदर से धीरे-धीरे खोखला कर देती है और जब तक इंसान ये बात जान पाता है तब तक..... इन पंक्तियों से इस गंभीर लेख को आपने हास्य भी प्रदान किया ही है.. `` मुझे पढने को मिले के जो धूम्रपान करेगा उसके घर में चोर नहीं आयेंगे क्योंकि वो सारी रात खांसते खांसते बीतायेगा और चोर समझेगा कि ये …….., वैसे ही कुत्ते उससे दूर रहेगे क्योंकि वो धूम्रपान के कारण इतना कमज़ोर हो जायेगा कि उसको चलने के लिए लाठी का सहारा लेना पड़ेगा और कुत्ते लाठी देख कर दूर" ...... समाज के लिए अच्छा सन्देश देती एक अच्छी रचना..हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाए.. http://paarth.jagranjunction.com/2011/11/16/कमेन्टटेरिया-के-लक्षण-एव

के द्वारा: Paarth Dixit Paarth Dixit

प्रिय अबोध जी अभिवादन बहुत सुंदर विषय आप का ..सार्थक लेख ..यह देखा जाता है की समाचार में कभी किसी चीज के फायदे गिनाये जाते हैं तो कभी नुक्सान ..प्रक्त्यक्षम किम प्रमाणं ...हमें अपने आस पास समाज में इसका लाभ देख लेना चाहिए उनके मुह के पास थोड़ी देर बैठ उसकी गंध देख लेना चाहिए ..उसका पैसा कैसे चेन स्मोकर होने से जाता है देख लेना चाहिए ...खांसना ...कफ .. सांस फेफड़ा सब स्वतः बता देता है ...अब चाहे वह दिल जला पढ़े या टेंसन दूर करे ..या उसे अच्छा कहे ...उसकी मर्जी .... सुन्दर लेख ... आभार भ्रमर ५ आदत को छोड़ना आसान नहीं है.बहुत मज़बूत इच्छा शक्ति कि आवश्यकता होती है , और इसे एक बार में छोड़ा भी नहीं जाना चाहिए , नहीं तो इसके परिणाम स्वरुप कई दूसरी बीमारियों के होने का पता चला है , इसको छोड़ने के लिए मन में ठान लें , ये सोचे कि इसको छोड़ने से मुझे न केवल शारीरिक लाभ होगा बल्कि आर्थिक रूप से भी इस पैसे का उपयोग

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

नीरजा जी सबसे पहले तो आपका आभार, की आपने पहली बार ........... शिकायत तो नहीं है, बस सोचा करता था की आप अपने पोस्ट पर किये गए कमेंट्स के उत्तर तक नहीं देती हैं, और आपके पोस्ट पर किये गए किसी भी कमेंट्स का उत्तर मेरे विचार से किसी को नहीं मिला है, :) चलें आपको ये भी बता देते हैं की किसी भी कमेन्ट का उत्तर देने के लिए कुछ खास नहीं करना पड़ता, केवल आपके पोस्ट पर जो कमेन्ट हैं उसके नीचे रेपली आप्शन हैं, उसे क्लीक कर के हिंगलिश आप्शन को क्लीक करें और अपने कमेन्ट को कमेन्ट बॉक्स में लिख डालें , उसके बाद नीचे दर्शाए गये शब्द को आपने उसके नीचे दिए गए बॉक्स में टाइप करन होगा और फिर सुब्मित पर क्लिक कर दें बस हो गे. :) एक बार फिर से आपका धय्न्वाद, आगे भी ल........... http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

के द्वारा: abodhbaalak abodhbaalak

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आदरणीय शाही जी, संतोष जी, और भरोडिया जी आप सब का आभार, की आपने सबने इस विषय पर अपने अपने विचार को ............ मैंने पहले ही कहा की लेख का टोपिक गद्दाफी नहीं है बल्कि हमारा आचरण है जो की समय समय पर हम ........... गद्दाफी achchha था या बुरा मुझे उस से कोई फर्क नहीं पड़ता, पर अगर ये तथ्य सच हैं तो यही कहा जा सकता है के "क्योंकि वेस्टर्न देश नहीं चाहते थे की वो शासन करे इस लिए ......" रही बात ये की वो बुरा था और उसने घोर पाप किये, मह्लियाओं पर अत्याचार किये.... और न जाने क्या क्या, " तो मेरे भाई, जरा हामारे देश में भी देख लो, छोटे छोटे नेता के ऊपर कितने केसेस होते हैं, जिसे चाह उठा लिया, जिसे चाह .................., क्या उनके साथ भी हमारे देश में भी ऐसा होना चाहिए............... लोगो का पैसा खा खा कर नेता अरबपति हो रहे हिं................... मत्रियुओं के साथ पुश्ते न भी कामये तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता, के या हमारे ऊपर ज़ुल्म नहीं है? क्या इसके लिए हम भी उन्हें दौड़ा दौड़ा कर ................ आप सब के इस डिस्कशन से मुझे भी बहुत सारी बातें ऐसें पता चली जो की मई नहीं जानता था .............. आभार आप सबका, http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

के द्वारा: abodhbaalak abodhbaalak

अबोधभाई , शाही जी, सन्तोष्भाई हम सब नेगेटिव साईड ही जानते है । और हर तानाशाह की नेगेटिव साईड होती है । तानाशाह जबतक अच्छा होता है जनता सुखी होती है । जनता को और क्या चाहिये । ये परिस्थिती लोकशाही से भी अच्छी होती है । तनाशाह जनता को परेशान नही करता विरोधियों को मार देता है । यहां तक तो बच जाता लेकिन वो खूद ऐयाश बन जाता है, पैसे हजम करने लगता है तब मुश्किल मे पड जाता है । यही हुआ दग्गाफी के साथ । मैं यहां एक आएटिकल पेस्ट कर रहा हुं , जो उस की पोजिटिव साईड दिखाती है। लिबिया में लडाई के समय भारत की एक प्रोफेसर बहन थी वहां पर उसने लिखा है । मेरे पास लिन्क नही था आर्टिकल था । --------------------------------------------------------------- पूरे लीबिया में फैले असंतोष और धमाकों के बीच कहीं कोई लूटपाट या अभद्रता नहीं हुई, आम लोगों के भरोसे पूरी तरह महफूज थे भारतीय। लीबिया से हाल ही में लौटी डॉ. अंजना तिवारी ने बताएं वहां के हालात। भोपाल। फरवरी 2011 में इजिप्ट में फैली बदलाव की आग से लीबिया में भी विद्रोह लपटें भड़क गईं। शुरु में जब मैंने अशांति की बातें सुनी तो इन्हें कोरी अफवाह समझा क्योंकि अब तक लीबिया में रहते-रहते मुझे 3 साल से अधिक हो चुके थे और मैंने वहां के लोगों को बेहद सुकून में रहते देखा था। फरवरी के आखिर तक मैंने बेंगाजी की सड़कों पर हजारों लोगों को हाथों में हथियार लिए विरोध के नारे बुलंद करते हुए देखा तो खुद को यह यकीन दिलाना पड़ा कि अब हालात पहले जैसे नहीं रहे। मार्च की शुरुआत तक तो भूमध्य सागर के किनारे बसा यह खूबसूरत देश पूरी तरह सुलग उठा। बदलाव की चिंगारी को दबाने के कर्नल गद्दाफी के प्रयासों ने इसे और ज्यादा भड़का दिया था और जब मैं वापस भारत लौट रही थी। मेरे मन में बस एक ही सवाल उठ रहा था इस बेहद खूबसूरत देश ऐसा कहर क्यों बरपा है। इस देश में जहां न खाने की दिक्कत है न रहने की कोई समस्या। जहां के लोग शायद दुनिया के सबसे भोले लोगों में से एक हैं। जहां आप रात में भी हजारों दीनार लेकर अकेले घर आ सकते हैं। जहां के लोग अपने मेहमान को बड़ा ऊंचा दर्जा देते हैं, आखिर उस देश में ऐसा क्यों हो रहा है? आप के लिए जान पर खेल जाएंगे हम ... फरवरी के अंतिम सप्ताह में हमने लीबिया छोड़ने की तैयारी शुरु की। स्थानीय परिचित लोगों ने हमे रोकने का हरसंभव प्रयास किया। वो बार-बार यही कहते रहे कि आप लोगों को कोई खतरा नहीं होगा। हम अपने भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन अपनी जान पर खेलकर भी आपकी हिफाजत करेंगे। वो बार-बार कहते कि आपकी सरकार वापस बुला रही है तो चले जाइये लेकिन हम चाहते हैं कि आप लोग यहीं रहे। 28 फरवरी की शाम को जब हम लीबिया छोड़ रहे थे तो वहां के लोगों की आंखे नम थी। मेरे साथी स्थानीय प्रोफेसरों और शिक्षकों ने लीबिया में जो हुआ उसके लिए माफी मांगी और यह विश्वास जताया कि जल्द ही सबकुछ सामान्य हो जाएगा। लेकिन बेहद बेमन से अपने दोनों बच्चों के साथ उसी शाम मैं जितना हो सकता था सामान लेकर जहाज पर चढ़ी। जहाज पर हम सभी के पास अपनी कमाई थी, कीमती चीजों थीं लेकिन लूटमार तो दूर, किसी ने पूछा भी नहीं कि आप क्या ले जा रहे हैं। भारत सरकार ने वापसी के लिए अच्छा इंतजाम किया था। हम एक मार्च की सुबह बेंगाजी से इजिप्ट के एलेक्जेंड्रिया के लिए चले। ढाई दिन बाद एलेक्जेंड्रिया पहुंचे। चार मार्च को एयरइंडिया की फ्लाइट की हमें दिल्ली ले आई। मैं वापस हिंदुस्तान पहुंच चुकी थी। मैं उस खूबसूरत देश को जलता छोड़ आई थी जहां मेरे ढेर सारे छात्र भविष्य में चमकने की तैयारी कर रहे थे। लौटते वक्त मुझे उनकी चिंता थी। वहां के भोले-भाले लोगों की चिंता थी। जो शायद दुनियादारी के लिए जरूरी उतना कपट नहीं जानते। आज जब हिंदुस्तान में मैं लीबिया पर पश्चिमी सेनाओं के हमले के बारे में पढ़ती हूं तो बस यही ख्याल आता है कि वहां के लोग मानवाधिकारों के नाम पर किए जा रहे इन हमलों की अंतर्कथा को उसी शिद्दत से समझ पा रहे होंगे। बस यही दुआ है कि यह खूबसूरत देश बर्बाद न हो। लोगों में वही जिंदादिली बरकरार रहे। धमाके होते रहे पर कभी नहीं लगा डर... मैं बेंगाजी के पॉश इलाके में पांचवी मंजिल पर किराए के मकान में रहती थी। मैंने और मेरे दोनों बच्चों ने बेंगाजी की सड़कों पर गुजरते गद्दाफी की सेनाओं के टैंकों को अपनी बालकनी से देखा। हम पूरे दिन विरोध प्रदर्शन देखते रहे। हमने देखा कि गद्दाफी के सैनिक विद्रोहियों को प्यार से मनाने का प्रयास कर रहे थे। शुरू में उन्होंने समझाने की कोशिशें की लेकिन बाद में वो हिंसक हो गए। हमने गोलियों की गूंज सुनी। फिर धमाकों की आवाजें सुनी लेकिन कभी डर नहीं लगा। क्योंकि मेरी मकान मालकिन हमेशा यह विश्वास दिलाती थी कि वो अपनी जान की बाजी लगाकर भी हमें कुछ नहीं होने देंगी। संघर्ष के दिनों में स्थानीय लोग हमेशा मदद को तैयार थे। जब हवाई हमले हो रहे थे तब मुझसे बार-बार कहा जा रहा था कि मैं बच्चों के साथ नीचे वाले फ्लैट में शिफ्ट हो जाऊं। यह उनका भरोसा ही था कि गोलियों और धमाके के बीच भी मैं हम खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे थे। सिर्फ बदलाव के लिए विद्रोह... लीबिया में रहते हुए मैंने कभी भी गद्दाफी के विरोध में कुछ नहीं सुना। इसके दो बड़े कारण हैं एक तो यह कि गद्दाफी बेहद शक्तिशाली हैं और उन्होंने कभी अपने खिलाफ किसी आवाज को उठने ही नहीं दिया और दूसरी यह कि वहां के लोगों की कोई भी ऐसी आवश्यकता नहीं है जिसे सरकार पूरा न करती हो। घर, खाना, पढ़ाई, स्वास्थ्य सेवाओं के साथ ही सरकार देश की आय का एक निश्चित हिस्सा लोगों में बांटती हैं। यहां के लोगों को किसी भी चीज की कमी नहीं थी। लेकिन जब विद्रोह हुआ तो उसके समर्थन में आवाजें उठने लगीं। लीबिया के लोगों ने कभी भी लोकतांत्रिक आजादी को महसूस नहीं किया था। वो खुलकर बोल नहीं सकते थे। गद्दाफी जो फैसला लेते वो सबको स्वीकार करना होता। मैंने बेंगाजी की दीवारों पर बदलाव के नारे लिखे देखे। विद्रोह और उसका समर्थन कर रहे लोगों ने विद्रोह की सिर्फ एक ही बड़ी वजह बताई और वो यह थी कि लोग अब बदलाव चाहते थे। वो सरकारी फैसलों में खुद को शामिल करना चाहते थे। वो गद्दाफी के फैसलों को मानने के बजाए अपनी बात भी रखना चाहते थे। वो अपने हुक्मरानों को चुनने का अधिकार चाहते थे। बदलाव की चाहत ही वहां के लोगों के विद्रोह की बड़ी वजह थी। जो लोग पहले खामोश थे उन्होंने भी विद्रोह की आवाज में सुर मिला लिया था। मेरी मकान मालिक की बेटी जिसे मैंने कभी भी गद्दाफी के खिलाफ बोलते नहीं सुना था वो भी अब विद्रोहियों के समर्थन में बातें कर रही थी। मॉडर्न मुस्लिम राष्ट्र है लीबिया... लगभग तीन बरस पहले जब मैं यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के लिए लीबिया जा रही थी तो मेरे मन में यही डर था कि यह एक रूढ़िवादी मुस्लिम देश होगा, जहां महिलाओं को घरों में कैद रखा जाता होगा। लेकिन जब में वहां पहुंची तो स्थिति को बिल्कुल ही अलग पाया। लीबिया में महिलाएं पुरुषों से समान आजाद हैं। बैंकों, अस्पतालों, क़ॉलेजों में काम करने वाले कर्मचारियों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से कहीं ज्यादा हैं। शायद ही कोई काम ऐसा होगा जिसमें महिलाएं सेवाएं न देती हों। बस इतना सा फर्क है कि वो जहां भी होती हैं पर्दे का ख्याल रखती हैं। वो बुर्के में बंद नहीं रहती, सिर पर स्कार्फ बांधती हैं। किसी भी अन्य मुस्लिम राष्ट्र की तरह यहां भी महिलाएं पुरुषों से दूरी बनाए रखती हैं। लेकिन वो घर में कैद नहीं रहती। वो देश को चलाने में बराबरी से योगदान देती हैं। कबीलों में बंटा हैं लीबिया... लीबिया का समाज कई कबीलों में बंटा है जिसमें सबसे ताकतवर कबीला गद्दाफी का है। 1969 में लीबिया के शासन पर कब्जे के बाद से ही गद्दाफी ने तमाम महत्वपूर्ण पदों पर अपने कबीलें के लोगों की भर्ती की। गद्दाफी का कबीला ताकतवर होता गया। गद्दाफी के कबीले की बढ़ती ताकत बाकी कबीलों में असंतोष पैदा करने लगी लेकिन गद्दाफी ने देश को इस तरह से शासित किया कि किसी ने भी उनके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश नहीं की। यहां तक कि गद्दाफी ने देश की सेना को भी कमजोर ही रखा और सुरक्षा की कमान अपने कबीले के लोगों के हाथ में दी। विद्रोह का मुख्य कारण अन्य कबीलों के लोगों में व्याप्त असंतोष ही है। बेहद खूबसूरत देश है लीबिया... आमतौर पर लीबिया को रेगिस्तान समझा जाता है। लीबिया का एक बड़ा इलाका रेगिस्तान ही है लेकिन ज्यादातर आबादी शहरों में रहती है। बेंगाजी और त्रिपोली में ही लगभग आधी आबादी रहती है। यहां का मौसम बेहद खुशनुमा है। सर्दियां जनवरी के दूसरे पखवाड़े में शुरु होती हैं और फरवरी का अंत आते-आते चली जाती हैं। गर्मी कभी भी इतनी नहीं पड़ती की पंखा चलाना पड़े। साल के 12 महिने रातों में हल्की सर्दी पड़ती है और आप बिना चादर ओढ़े नहीं सो सकते। लीबिया के शहरों को नए तरीके से बसाया गया है। सबकुछ बेहद व्यवस्थित है। लीबिया में आपको ऐसा नहीं लगता कि आप अफ्रीका में हैं। बिलकुल नहीं होते हैं अपराध... लीबिया के लोगों में एक चीज है जो समान रूप से पाई जाती हैं और वो हैं उनका भोलापन। आप कहीं भी जाइये आपको बेहद सच्चे, सीधे और सरल लोग मिलेंगे। वो कोई दिखावा नहीं करते हैं। पड़ोसी भी पड़ोसियों की बुराई नहीं करते। अपराध की दर वहां जीरो फीसदी से भी कम है। दो सालों में मैंने लूटमार की कोई वारदात नहीं सुनी। मैं अमेरिका, ब्रिटेन, मिस्त्र, जार्डन और दुनिया के अन्य कई मुल्कों में गई हूं लेकिन लीबिया जैसे सरल और भोले लोग मैंने कहीं नहीं देखे। भारतीयों का करते हैं बेहद सम्मान... लीबिया में भारत के लोगों को सम्मान की नजर से देखा जाता है। वहां अन्य मुल्कों के भी लोग हैं लेकिन जितना सम्मान भारत के डॉक्टरों और प्रोफेसरों को मिलता हैं उतना शायद कहीं के लोगों को भी नहीं मिलता। जैसे ही आप वहां के लोगों को बताते हैं कि आप भारत से हैं उनका व्यवहार बेहद सम्माननीय हो जाता है। वो मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। इंग्लिश कम ही लोग बोलते हैं लेकिन जो आपको समझते हैं वो हर संभव तरीके से आपकी मदद करते हैं। (डा. अंजना तिवारी, सर गैरयूनिस यूनिवर्सिटी बेंगाजी (लीबिया) में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

के द्वारा: bharodiya bharodiya

प्रिय अबोध जी अभिवादन बहुत सही कहा आप ने हमारे अन्दर का शैतान तो जागता है ये सच है अच्छा हुआ की आप ने जो देखा केवल उसी का समर्थन नहीं किया क्योंकि उनके अन्दर का शैतान न जाने कितना जागा और कितने जुल्म ढाए..सुन्दर लेख सच को दर्शाता हुआ ....पहले जानवर बन जाने वाले काश जागें हमारे अन्दर का छिपा हुआ जानवर , समय समय पर बाहर निकलता रहता है , कहीं सड़क पर पुलिस के हाथों बुरी तरह पिट ता हुआ आदमी , तो कभी डंडो के बीच हाथ पैर से लटका हुआ , कहीं सड़क पर चलती लड़की पर तेजाब फेकता तो कभी 1984 के दंगो में ना जाने कितने मासूमो को ……….., तो कभी गोधरा की ट्रेन के मासूम यात्रियों को जलाते हुए , कभी गुजरात के बाकी शहरो में औरतो और बच्चो .. शुक्ल भ्रमर ५

के द्वारा:

अबोध जी नमस्कार ! आप केवल नाम के अबोध हैं, लिखते समय तो बहुत ही भावुक हो जाते हैं और कर देते हैं....... ये सही हैं के गद्दाफी के साथ जो हुआ वो गलत है. किन्तु इसी गद्दाफी ने हजारों लोगों को इससे भी ज्यादा बेरहमी से क़त्ल किया और परेशान किया. उन युवतियों के बारे में सोचिये, जिनके साथ इस गंदे आदमी ने गलत काम किया और फिर उन्हें अपने पुत्रों और अपने सैन्य अधिकारियों की जिस्मानी भूख मिटने के लिए उनके सामने दल दिया.... क्या वे रोई, गिडगिड़ायी नहीं होंगी..... जरुर उन्होंने अपनी इज्जत की भीख मांगी होंगी,,, फिर उस राक्षस ने अट्टहास किया होगा और उनको मरने के लिए छोड़ दिया होगा....... इस प्रकार के आततायी को कष्ट उठाते देख कर अगर कोई कम अत्याचारी होगा तो मेरा कम से कम ये मानना है कि ठीक ही हुआ..... क्योंकि वो कोई शरीफ व्यक्ति नही था....... आदित्य www.aditya.jagranjunction.com

के द्वारा:

आदरणीय अबोध जी ,.सादर नमस्कार आदरणीय शाही जी ,.सादर प्रणाम .. ये आंकड़े यदि सच हैं तो मैं भी अभी तक मुगालते में ही था ,..लेकिन यह भी देखना होगा इन अच्छे कामों से पाप कम नहीं हो सकते ,..वो एक तानाशाह था ,..जिसने ना सिर्फ अपनी मनमर्जी की बल्कि महिलाओं का बलात शोषण सहित विरोधिओं की प्रताड़ना और दमन आदि सब कुछ किया ,...कबीलाई संस्कृति में उसके साथ जो हुआ वो मुझे कहीं से भी असामान्य नहीं लगा ,.. . रावण की प्रजा को क्या कष्ट था ?....लेकिन ताकत का अहंकार और इसके फलस्वरूप हुए अनेकों पापो ने उसका समूल नाश कर दिया ,... लीबिया की आम जनता पढ़ी लिखी है ,..संयम के साथ एक मजबूत लोकतंत्र विकसित हो यही अच्छा रहेगा ,......जो गया सो गया ... बाकी इंसान तो जानवर ही है ,..जब उसे अपने या अपनों के अस्तित्व पर खतरा लगता है तो बिना वजह शैतान भी बन जाता है ,....राजनेताओं ने जनभावना का सदैव दोहन ही किया है ,...

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

अबोध जी, आप द्वारा उल्लेखित तथ्य यदि आधिकारिक और सत्य हैं, तो मुझे खेद है कि मैं बदनाम गद्दाफ़ी के बारे में शायद आजतक मुग़ालते में रहा हूं । आश्चर्य है कि रामराज्य के सिद्धान्तों से टक्कर लेते गद्दाफ़ी के लोकप्रिय साम्राज्य की चर्चा विश्व में आम क्यों नहीं रह पाई, जबकि पश्चिमी देशों के आकर्षक लगने वाले मामूली से नागरिक अधिकार व सुविधाएं न सिर्फ़ सारा संसार जानता है, बल्कि उन्हीं आकर्षणों की गिरफ़्त में पड़कर दुनिया से श्रम और मेधा का पलायन भी पाश्चात्य देशों की ओर ही होता रहा है । मैं दिग्भ्रमित हो गया हूं, अब पूरी जानकारियों के साथ ही इस विषय पर कोई चर्चा करूंगा । वैसे मेरी प्रतिक्रिया के विचारों को आप गद्दाफ़ी को रिप्लेस कर किसी अन्य आततायी व शोषक तानाशाह शासक के साथ जोड़ कर भी देख सकते हैं । धन्यवाद !

के द्वारा:

आप के लिस्ट्वाली बातें सही है । लिबिया की प्रजा दुनिया में सब से भोली प्रजा है । शरिफ ईतनी है की वहां का क्राईम रेट झिरो है । लडाई के दौरान एक भी दुकान लूटने की घटना नही बनी है । वहा की मुस्लिम औरतें भारत की औरतों की तरह पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करती है । मुस्लिम कानून नही है । गद्दाफी के बाद अब सोचा जा रहा है की शरियत का कानून लगाया जाये । आम जनता को गद्दाफी से कोइ फरियाद नही थी । लेकिन जैसे हमारे यहां जातिवाद है वैसे वहां कबिलावाद है । गद्दाफीने अपने कबिले के लोगों को उच्च स्थान पर लगा दिया और खूद भी ऐयाशियां करने लगा । विरोधी कबिलेवाले ये सब सहन नही कर सके । जनता को भडकाने लगे, भोली जनता जल्दी भडक जाती है । बाकी बात सब के सामने है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

अबोध जी सुप्रभात ,,उक्त वाक्य /विचार अरस्तू ही नही कांट स्पिनोजा आदि तमाम दार्शनिकों के थे ,,लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है की इन तमाम दार्शनिकों / दार्शनिक विचारों का उद्भव पन्द्रहवी शताब्दी के बाद ही कैथोलिक धर्माचार्य पॉप के पाखंडों के विरुद्ध हुआ तो इसमें सत्य का इन लोगों ने कितना अन्वेषण किया और विरोधी विचारों को कितना व्यक्त किया यह विचार करने वाली बात है और यह तमाम बुद्धिजीवी पलायन करके इटली में एकत्रित होकर अपने विचारों को व्यक्त कर सके (है न आश्चर्य वाली बात स्वछन्द दर्शन का पलायनी विश्लेषण :) ) तो यह तो क्रिया की प्रतिक्रया हुई न की स्त्युदबोधन यहाँ बुद्धिजीवी के शांत क्रोध का ही प्रस्फुटन हुआ और उस समय भी कोइ नवीन बात नही हुई ध्यान दें श्रीमद भागवत गीता के कुछ बिंदु (यो माँ पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति ,तस्याहं न प्रणस्यामि सच में न प्रणश्यति ,,मत्त परतरः नान्यतिक चिदसति धनन्जय , मयि सर्व मिदं प्रोक्तं सूत्रे मणि गणा इव,, सुवर्णाज्जाय मानस्य सुवर्णत्वं हि निश्चितं ,ब्राह्मणों जायमानस्य ब्रह्मणतव्म च विनिश्चितम ,, इसी तरह के तमाम विचार ईश्वरवादी दृष्टीकोणों के थे तो मुझे तो इसमें कुछ नवीन स्त्योद्घाटन नजर नही आता ,,और जहां तक रही बात पशुवत आचरण की तो आप पशुओं के प्रति पाश्चात्य दृष्टिकोण और भारतीय सोच को देखिए चलिए आम जन की प्रिय रामायण को ही देखिए और इसके आलोक में पशुवों की व्याख्या करिये कहीं भी पशु निंदनीय नही है ,,मानव तो दो ही श्रेणियों में है एक असुर और दूसरा मनुष्य जिसके देवत्व /श्रेष्ठत्व की तरफ अग्रषर होने की भारतीय दर्शन में कामना की गयी है /विचारों के व्यक्त किया गया है /अपनाने के लिए आग्रह किया गया है परन्तु हठ नही :) हाँ तो पन्द्रहवी शताब्दी में भारतीय संस्कृति भी संक्रमण के दौर से गुजर चुकी थी और गुजर भी रही थी तो इसके दर्शन में भी छेड़ छाड़ का प्रयाश किया गया परन्तु आप शरीर को विकृत कर सकते हैं आत्मा को नही और यही आत्मा का अछूतापन अनेक वैदेशिक संस्कृतियों का पोषक भी बना जो की आक्रान्ताओं से अनजाने में हुई भूल जो की उनके लिए वरदान साबित हुई लेकिन यहीं से भारतीय संस्कृति भी दूषित होने लगी ,, और जहां तक बात आचरण की तो विषय विशेष में सुप्त क्रोध का असुरवृत्ति में प्रकट होना कोइ नवीन बात (भारत के सन्दर्भ में ) नही धरती माता भी जिसकी उष्णता सदा जीवन का संचार करती है अति होने पर अपने अंतर से ज्वालामुखी उत्त्पन्न करके सब कुछ भस्मीभूत कर देती है (परन्तु वैदेशिक जीवन पद्धति का अलग ही दृष्टिकोण है ) वहां जीवन पद्धति के हर एक बिन्दुवों पर विचार करिये हर जगह हिसा की झलक मिलेगी ( आसुरी वृति और मानव में तो सदैव बैर ही रहा है जो की स्न्क्रमनीय संस्कृति के कारण और भी अधिक बदता ही जा रहा है (उक्त आचरण निंदनीय तो है ही परन्तु कहीं कहीं शठे शाठ्यम समाचरेत की भी आवश्यकता होती है जिसका की भारतीय संस्कृति ने कम ही अनुकरण किया है :) )...........................जय भारत

के द्वारा:

आदरणीय शाही जी , इन्टरनेट पर एक मेल काफी circulate हो रही है, जिसका सोर्स मुझे कन्फर्म नहीं हो पा रहा है, उसके अनुसार ये तथ्य गद्दाफी और लीबिया के baare में मिलते है: Lesser known facts about Libya and Gaddafi : 1. There is no electricity bill in... Libya; electricity is free for all its citizens. 2. There is no interest on loans, banks in Libya are state-owned and loans given to all its citizens at 0% interest by law. 3. Home considered a human right in Libya – Gaddafi vowed that his parents would not get a house until everyone in Libya had a home. Gaddafi’s father has died while him, his wife and his mother are still living in a tent. 4. All newlyweds in Libya receive $60,000 Dinar (US$ 50,000 ) by the government to buy their first apartment so to help start up the family. 5. Education and medical treatments are free in Libya. Before Gaddafi only 25% of Libyans are literate. Today the figure is 83%. 6. Should Libyans want to take up farming career, they would receive farming land, a farming house, equipments, seeds and Livestock to kick- start their farms – all for free. 7. If Libyans cannot find the education or medical facilities they need in Libya, the government funds them to go abroad for it – onnot only free but they get US $2, 300/month accommodation and car allowance. 8. In Libyan, if a Libyan buys a car, the government subsidized 50% of the price. 9. The price of petrol in Libya is $0. 14 per liter. 10. Libya has no external debt and its reserves amount to $150 billion – now frozen globally. 11. If a Libyan is unable to get employment after graduation the state would pay the average salary of the profession as if he or she is employed until employment is found. 12. A portion of Libyan oil sale is, credited directly to the bank accounts of all Libyan citizens. 13. A mother who gave birth to a child receive US $5 ,000 14. 40 loaves of bread in Libya costs $ 0.15 15. 25% of Libyans have a university degree 16. Gaddafi carried out the world’s largest irrigation project, known as the Great Man-Made River project, to make water readily available throughout the desert country. अगर ये तथ्य सच है तो हमें इसे क्या समझे, क्या केवल अमेरिया और वेस्टर्न देश के पैसे और सामर्थ्य के बल पर उसे हटाया गया है, ऐसे किसी भी देश के साथ हो सकता है. बहरहाल, मेरा भी भी गद्दाफी से कोई lagaav नहीं है, बात केवल मनुष्य की पाशविकता के बारे में हो रही है, आपके विचार सदा ही मेरे लिए बहुमूल्य होते हैं, और आप हैं कहाँ? काफी समय से आपकी कोई पोस्ट .......... आशा है की शीघ्र ही आप हमें....... http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

के द्वारा: abodhbaalak abodhbaalak

आपका कथन अपने आशय के हिसाब से बिल्कुल सटीक है अबोध जी । भीड़तंत्र में आदमी कभी-कभी जानवर से भी अधिक मूढ़ बना दिखाई देता है । परन्तु गद्दाफ़ी वाले मामले में आपका आकलन सटीक नहीं है । वह भीड़ नहीं थी, विक्षुब्धों का वह समूह था, जिसने तिल-तिल कर उस मनहूस तानाशाह के हाथों एक आम नागरिक का सामान्य अधिकार तक छीन-छीन कर, तड़पा-तड़पा कर दशकों तक अपनी ऐयाशी के लिये शाही खज़ाना भरते देखा था । किसी दिन अपने देश के काले अंग्रेज़ जब इसी तरह जनता के हाथों पिटते रहम की भीख मांग रहे होंगे, खुद आपका दिल भी ज़रा भी नहीं पसीजेगा, बल्कि आपका जूता खुद बखुद पैर से निकल कर आपके हाथों में होगा, और आप उस समूह का हिस्सा बनकर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे होंगे । आभार !

के द्वारा:

आदरणीय अबोध जी, नमस्कार..बिलकुल सही बात कही है आपने ..मै आपकी बात से पूरी तरह से सहमत हूँ..इंसान जानवर से भी ज्यादा गिर चुका है ..मैंने बीते दिनों इन्टरनेट पर एक तस्वीर देखी मै दंग रह गया एक कुत्ता अपने साथी कुत्ते की लाश को जो सड़क पर पड़ी हुई थी उसे घसीट कर किनारे लाकर उसे चाटने लगा उसे जीवित करने की कोशिश करने लगा..और वही मनुष्य जो सिर्फ नाम का ही..., एक बच्ची सड़क किनारे दर्द से तड़प रही थी वही से ''नाम के मनुष्य " उसे नज़रंदाज़ करते हुए निकलते गए और बाद में उस बच्ची के ऊपर से ट्रक निकल गया और उसकी मौत हो गयी..बड़ा दुःख होता है जब कभी ऐसे दृश्य सामने आजाते है...सही कहा आपने "हम सब केवल नाम के ही …………………. पर हम सब हैं अन्दर से जानवर , वहशी जानवर .''... ..साधुवाद..

के द्वारा: Paarth Dixit Paarth Dixit

अबोध जी सादर नमस्कार, आपको नहीं लगता की आप आदमी को जानवर कह कर उस जानवर की बेइज्जती कर रहे हैं. जो अपने सारे काम निश्चित दिनचर्या के अनुसार ही करता है. प्रातः सूर्योदय के साथ ही जागना, भूख लगने पर ही शिकार करना, अपनी जान का ख़तरा होने पर ही विरोध करना, सभी छोटे बड़े, जाति परजाति के जानवरों के साथ रहना, बच्चों को पूरा समय देना समाज के कायदे क़ानून समझाना. क्या ये सब हम इंसानों में देख पा रहे हैं? इंसान एक अलग प्रकार का जीव है उसका इन उपरोक्त बातों से कोई सम्बन्ध नहीं है.मानव एक पर्दाधारी जीव है.क्योकि उसने हर जगह परदा डालना सीख लिया है. पहले तन पर,फिर मन पर और अब आँखों पर.ये इश्वर की नायाब और अंतिम कृति है, इसीलिए भगवान् ने अन्य जीव बनाने के बाद जो कुछ बचा सब इसमें डाल दिया, जो इसके पहले बनाए किसी जीव में डालने की हिम्मत खुद भगवान् भी ना कर सका. फिरभी आपने बहुत अच्छा लिखा है क्योंकि ये मानव भी कभी कभी जानवरों के दुर्गुण का प्रदर्शन भी करता है.साधुवाद.

के द्वारा: akraktale akraktale

प्रिय अबोध जी ....सस्नेह नमस्कार ! प्रिय भरोदिया जी ...... नमस्कार ! आदरणीय अशोक जी .....सादर अभिवादन ! आप सभी को मेरी शुभकामनाये और मुबारकबाद दीपावली की सपरिवार बधाईयां और मुबारकबाद :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o आदरणीय अशोक जी , मेरी तीसरी आँख कह रही है है की अब मुझको पांच बजे उठ जाया करना चाहिए ..... सुबह की ताजा प्राणवायु और पक्षियो का कलरव +चुस्ती फुर्ती +सेहत और तंदरुस्ती यह सब मुझको मिल कर एक औसत बिहारी के मुकाबले में वास्तव में बेहतर पंजाबी बना देगा ....हाहा हा हा हा ************************************************************************************************* मैं माइक्रोसॉफ्ट के आउटलुक में मेल की सैटिंग देख रहा थी की तभी इत्तेफाक से मुझको इन पीलिया के मरीजों का दीदार हुआ ..... इनके सहारे ही भारी भीड़ में मैं अपना कमेन्ट खोज लेता हूँ ..... एक बार फिर से आप सभी स्नेही सज्जनो +साथियो को सपरिवार दीपावली की मुबारकबाद

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